अमेरिका के लिए 2012 शायद अच्छा नहीं रहेगा. घरेलू और विदेशी दोनों मोर्चों पर आसार ठीक नहीं हैं. नए साल में उसे अपना नया राष्ट्रपति चुनना है और उसकी सबसे बड़ी चुनौती अपने आर्थिक दबदबे को फिर से कायम करने की होगी.
04 जनवरी 2012: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
28 दिसम्बर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
नए साल की पहली किरण के साथ अमेरिकावासी परेशान करने वाली आशंकाओं के साथ जगेंगे. सन् 2012 उनके लिए शायद ही अच्छी खबर लाने वाला है. विदेशी मोर्चे पर अमेरिका खतरों से मुकाबिल है. वह अफगानिस्तान की एक दशक लंबी लड़ाई से निकलने की कोशिश कर रहा है. तालिबान के हारने और राजनैतिक समाधान निकलने की गुंजाइश बहुत कम है. अमेरिका के सामने दूसरा मुश्किल काम पाकिस्तान के साथ अपने बिगड़ते रिश्तों को सुधारना है. वह पाकिस्तान की संस्थाओं, उसकी आंतरिक सुरक्षा और अर्थव्यवस्था में लगातार गिरावट से भी चिंतित है. नीतिगत मामलों में पाकिस्तान परेशानी का सबब बन गया है. अमेरिका समझ नहीं पा रहा है कि उसे अपनी मौजूदा स्थिति बनाए रखनी चाहिए, या सरकार और फौजी प्रतिष्ठान के साथ रहने की वास्तविकताओं के अनुरूप अपनी नीतियों में बदलाव लाना चाहिए. दरअसल, पाकिस्तान सरकार और फौजी प्रतिष्ठान दोनों ही अमेरिकी उद्देश्यों का समर्थन और विरोध एक साथ करते हैं. अमेरिकी दुविधा में रहते-रहते तंग आ चुके हैं और उनका धीरज चूक गया है.
21 दिसम्बर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
अमेरिका को आतंक के लगातार खतरे से भी निपटना है. नए साल में इस खतरे के कम होने की संभावना नहीं है. यह बात दीगर है कि हाल में कुछ कुख्यात आतंकवादियों को खत्म करने में कामयाबी मिली है. अमेरिका और ईरान में पिछले 30 वर्षों से टकराव चला आ रहा है. अमेरिका को इस टकराव के नतीजों से भी निपटना है. खतरा यही है कि ईरान के मौलवियों और अमेरिका के नेताओं के गणित या गलत फैसले के कारण उनमें भयंकर युद्ध शुरू हो सकता है जिसके नतीजे इस क्षेत्र और दुनिया के लिए घातक होंगे. उन मुद्दों का कोई समाधान नहीं दिख रहा है जिनसे इन दोनों के बीच टकराव को टालने में मदद मिले. उधर, इज्राएल के नेता अमेरिका को उकसाने में लगे हैं.
वर्ष 2012 अरब जागरण का नया अध्याय भी लिखेगा और संभवतः हमें बता सकव्गा कि नई अरब व्यवस्था में इस्लामी राजनीतिक शक्तियों, अरब फौजी प्रतिष्ठानों और सिविल सोसाइटी में से किसका प्रभुत्व रहेगा. साथ ही, क्षेत्र का राजनीतिक नक्शा फिर से खींचा जा रहा है और तेल की ऊंची कीमत बनी रहेगी. इससे पूरी दुनिया में महंगाई बढ़ेगी और लोगों की जेब पर बोझ पड़ेगा.
14 दिसंबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
07 दिसंबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
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चीनी शक्ति में बढ़ोतरी और चीन की आर्थिक नीतियां नए साल में भी अमेरिका को परेशान करती रहेंगी. अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में इन मुद्दों को पहले ही जगह मिल चुकी है. दरअसल, चीन प्रमुख विश्व शक्ति के रूप में उभरा है और दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की राह पर है. भारत की तरह, अमेरिका को भी चीन के साथ अच्छे संबंध बनाने की जरूरत है. भारत की तरह, हम भी इन सवालों से जूझ रहे हैं कि एक सहकारी विश्व व्यवस्था बनाने या संकीर्ण राष्ट्रीय हित पर जोर देने या दोनों के लिए चीन अपनी शक्ति का किस तरह इस्तेमाल करेगा. वर्ष 2012 शायद इन सवालों का संतोषजनक उत्तर नहीं दे सकव्गा.
30 नवंबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
वैश्विक परिदृश्य में देखें तो नए साल में प्रगति की संभावना नहीं दिखती. विश्व व्यापार और पर्यावरण के मुद्दों पर सहमति दूर की कौड़ी बनी हुई है. हकीकत यह है कि पर्यावरण को नुकसान से बचाने का उत्साह अब धीमा पड़ता जा रहा है. उत्तर अमेरिका और यूरोप मंदी की मार झेल रहे हैं. इसलिए पर्यावरण को बचाने में आने वाली लागत को उठाने के लिए ये दोनों महाद्वीप तैयार नहीं हैं.
यूरोप और उत्तर अमेरिका की सरकारें वैश्विक और घरेलू चुनौतियों का सामना नहीं कर पा रही हैं. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को सुलझाने या घरेलू समस्याओं का सामना करने का उनका राजनैतिक संकल्प कमजोर पड़ता जा रहा है. अमेरिका में चुनाव लड़ने का इच्छुक हर उम्मीदवार जानता है कि राष्ट्रपति पद पर बैठना कांटों का ताज पहनना है. वहीं, यूरोप में राज कौशल दांव पर है और रणनीतियां मायावी साबित हो रही हैं.
लेकिन अमेरिकावासी 2012 में जिस सबसे महत्वपूर्ण सवाल का सामना करने जा रहे हैं, वह है अर्थव्यवस्था. यह सवाल तीन रूप में हमारे सामने आता है. पहला, अमेरिकावासियों को हर हाल में अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था, पांच वर्षों की मंदी, निकट भविष्य में नवीकृत विकास की कम संभावना और जो लोग अपना रोजगार खो चुके हैं या रोजगार खोज रहे हैं, उनकी दयनीय स्थिति सुधारनी होगी. आर्थिक मार के कारण हमारे कई महत्वपूर्ण संस्थान कमजोर हो रहे हैं. शैक्षिक संस्थान इसकी मिसाल हैं जिन्हें पर्याप्त फंड नहीं मिल पा रहा है. एक के बाद एक संस्था इस मद में अपना बजट घटाती जा रही है.
23 नवंबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे16 नवंबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
हम एक ऐसे दशक का सामना कर रहे हैं जो अर्थव्यवस्था और अपना रोजगार गंवा चुके कई अमेरिकियों के लिए अशुभ साबित हो सकता है. इस गंभीर स्थिति से निपटने के तरीकों, खासतौर पर सरकार की भूमिका के बारे में अमेरिका के सियासी नेताओं के बीच कोई सहमति नहीं बन पा रही है. ओबामा ने अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए जो प्रस्ताव दिए हैं, वे हमारी राष्ट्रीय विधायिका और सीनेट में धक्के खा रहे हैं.
हमारी कांग्रेस के सदस्यों में इस बात पर मतभेद रहे हैं कि बजट घाटे, सरकार के राजस्व और खर्च की जरूरतों को कैसे संभाला जाए. अमेरिका की राजनीति पहले से अधिक बंटी हुई है. इस बात की उम्मीद नहीं दिखती कि राष्ट्रपति चुनाव से सारे मतभेद खत्म हो जाएंगे और नए राष्ट्रपति को चुनौतियों से निपटने के लिए स्पष्ट जनादेश मिलेगा.
दूसरा, सभी अमेरिकियों को यह बात समझ लेनी चाहिए कि हमारी अर्थव्यवस्था का विकास और हमारी भावी समृद्धि अपनी सामाजिक और भौतिक बुनियादी संरचना पर निर्भर करती है. हमें हर हाल में सूचना टेक्नोलॉजी के इस युग में निवेश करना चाहिए, अपने परिवहन नेटवर्क को बहाल करना चाहिए, ऊर्जा के नए मॉडल विकसित करने चाहिए और अपनी शिक्षा तथा स्वास्थ्य व्यवस्था दुरुस्त करनी चाहिए. हमने अभी तक यह फैसला नहीं किया है कि राष्ट्र निवेश के लिए वित्त की व्यवस्था कैसे करेगा. और न ही यह तय किया है कि पुनर्निर्माण के काम के लिए सरकारी और प्राइवेट सेक्टरों की क्या भूमिकाएं होंगी.
निकट भविष्य में ठोस पुनर्निवेश के बिना दीर्घकालिक विकास हासिल करना और मुकाबले में टिके रहने की क्षमता में सुधार लाना मुश्किल है. अमेरिकी जीवन की गुणवत्ता की बात ही छोड़ दीजिए. कर्ज सस्ता होने और निर्माण क्षेत्र में रोजगार घटने के कारण अमेरिका के पास अपनी बुनियादी संरचना में निवेश के लिए अवसर हैं और यह उसका उत्तरदायित्व भी है. फ्रैंकलिन रूजवेल्ट ने अमेरिकियों को पाठ पढ़ाया था कि अर्थव्यवस्था में आई मंदी को राष्ट्र के भविष्य में निवेश के जरिए ही खत्म किया जा सकता है.
9 नवंबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे2 नवंबर 201: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
तीसरा, विश्व व्यवस्था के प्रति अमेरिका की एक जिम्मेदारी है. जब समय यूरोजोन संकट की ओर बढ़ रहा है, हमें याद दिलाया जाता है कि हमारी वित्तीय व्यवस्था यूरोप के बैंकों और सरकारी अर्थव्यवस्था से बंधी है. यह बदले में यूरोपीय आर्थिक प्रदर्शन, वैश्विक विकास और समृद्धि के लिए प्रेरित करती है. जी-20 के सम्मेलनों में निष्क्रिय होकर बैठना और नेताओं को हूट करना बुद्धिमत्तापूर्ण विकल्प नहीं है.
संकट से निपटने के लिए यूरोप में संस्थागत सुधार, यूरोपीय सरकारी वित्त व्यवस्थाओं की गतिशीलता, यूरोपीय सेंट्रल बैंक की सख्त कार्रवाई और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सहायता के बीच नाजुक संतुलन और विकास रणनीति का होना जरूरी है. वर्ष 2012 दस्तक दे चुका है, लेकिन संकट से उबरने की कोई रणनीति नहीं बन पाई है. काम बड़ा और जटिल है लेकिन यह यूरोप के भविष्य और विश्व अर्थव्यवस्था के लिए बहुत महत्वपूर्ण है. इसी से अमेरिका और भारत के विकास की उम्मीदें भी जुड़ी हैं.
दुख की बात है कि अमेरिकी राष्ट्रपति पद के लिए चलाए जा रहे अभियान में महत्वपूर्ण मुद्दों पर गंभीर चर्चा नहीं की जा रही है. दरअसल, हम जो बहस देख रहे हैं, वह सतही है और नवंबर में हमारे सामने जो विकल्प आएंगे वे संतोषजनक नहीं होंगे. बिल क्लिंटन ने 1992 में अपने चुनाव प्रचार के दौरान कहा था कि जॉर्ज एच.डब्लू. बुश से मुकाबला अर्थव्यवस्था को लेकर है. उस समय क्लिंटन का पूर्वानुमान सही था. सच तो यह है कि आज यह पहले से भी कहीं अधिक सच है.
आर्थिक समृद्धि की बहाली से अमेरिका की शक्ति और विश्व मामलों को प्रभावित करने की उसकी क्षमता बढ़ेगी. साथ ही, उसके राष्ट्रीय हित भी पूरे होंगे. आर्थिक शक्ति के बिना देश-विदेश में अमेरिका की बात का कोई मूल्य नहीं होगा. और आर्थिक शक्ति के बिना अमेरिका भारत सहित अपने मित्रों के लिए उपयोगी साझेदार नहीं रहेगा. सो, वर्ष 2012 की सबसे बड़ी चुनौती अर्थव्यवस्था है.
फ्रेंक विज्नर भारत में अमेरिकी राजदूत रह चुके हैं.

