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इंसाफ के इंतजार में पिया की दुत्कारी दुलहनिया

राष्ट्रीय महिला आयोग को विदेशों में बसे पतियों की ओर से त्याग दी गई पत्नियों की एक न एक शिकायत हर रोज मिल रही है. क्या इन पीड़ितों को कभी इंसाफ मिल पाएगा?

रेखा सोहल
रेखा सोहल
अपडेटेड 28 फ़रवरी , 2012

सरबजीत कौर अब 40 साल की हैं. जब 2002 में उनसे एक साल बड़े जालंधर के एक कॉलेज लेक्चरर गुरप्रीत बल के साथ उनका विवाह हुआ था तब उन्होंने सोचा था कि उनका जीवनसाथी मिल गया है. लेकिन यह परी-कथा उस समय अचानक समाप्त हो गई, जब दिसंबर 2003 में गुरप्रीत बल बिना बताए अचानक ब्रिटेन के लिए रवाना हो गए. सरबजीत उस समय प्रसव के बाद से अपने मायके में थीं. अगस्त, 2003 में उनकी बच्ची हरप्रीत कौर का जन्म हुआ था. जब सरबजीत ने दोबारा अपनी ससुराल जाने की कोशिश की तो उन्हें लौटा दिया गया.

2004 में उन्होंने बल के खिलाफ परित्याग करने का मामला दर्ज कराया. मार्च, 2011 में सरबजीत अपनी फरियाद जालंधर के क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय में ले गईं, जिसके आधार पर बल का भारतीय पासपोर्ट रद्द कर दिया गया. सरबजीत कहती हैं कि बल अब अवैध ढंग से ब्रिटेन में रह रहा है. वे कहती हैं, ‘मैं मामला सुलझने की सारी उम्मीदें खो चुकी हूं.’

सरबजीत उन सैकड़ों महिलाओं में शुमार हैं, जिन्हें विदेशों में बसे उनके पतियों ने छोड़ दिया है. 24 सितंबर, 2009 से 30 नवंबर, 2011 तक राष्ट्रीय महिला आयोग ने इस तरह की 796 शिकायतें दर्ज की हैं. यानी आयोग के पास रोजाना एक नई शिकायत पहुंच रही है. इन मामलों को देखने के लिए आयोग ने अप्रवासी भारतीय (एनआरआइ) प्रकोष्ठ बनाया है.

पंजाब के खनौरा गांव की 38 वर्षीया गुरमीत कौर का विवाह 22 नवंबर, 2000 को एक एनआरआइ के साथ हुआ था. उनका पति मंजीत सिंह यह वादा करके विदेश चला गया कि वह उन्हें आव्रजन के कागजात भेज देगा. लेकिन यह वादा उसने कभी नहीं निभाया. बाद में गुरमीत को पता चला कि मंजीत की शादी हो गई है और उसका एक बेटा भी है. गुस्से से भरी गुरमीत कहती हैं, ‘यही नहीं, वह एनआरआइ नहीं था, वह सिओल में अकुशल मजदूर है.’

राष्ट्रीय महिला आयोग और ओवरसीज भारतीय मामलों के मंत्रालय की ओर से संयुक्त रूप से तैयार किए गए बैकग्राउंड नोट के अनुसार यह पाया गया है कि महिलाओं को उनके पति या तो जबरन वापस भगा देते हैं या दहेज की मांग के लिए बंधक बनाकर रख लेते हैं. ऐसे भी कई मामले हैं, जिनमें पीड़ित महिलाओं के विदेश पहुंचने पर उन्हें लेने हवाई अड्डे कोई नहीं पहुंचा. अगर ये महिलाएं अपने बच्चों के साथ लौटीं, तो उनमें से कुछ पर अपहरण के आरोप लगा दिए गए. नोट कहता है कि कई पीड़ित महिलाओं ने पाया कि उनके पति या तो विदेश में पहले ही विवाह कर चुके थे, या उन्होंने अपनी नौकरी और अपने आव्रजन की स्थिति के बारे में गलत जानकारी दी थी.

आयोग का नोट यह भी कहता है कि कुछ पतियों ने एकपक्षीय तलाक लेने के लिए विदेशों के उदार कानूनों का लाभ उठाया, ताकि उन्हें भारत में छोड़ दी गई पत्नियों को गुजारा भत्ता न देना पड़े. महिला आयोग को अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, थाइलैंड और संयुक्त अरब अमीरात सहित कई देशों से इस आशय की कई शिकायतें मिली हैं कि भारतीय महिलाओं को वहां समुचित आव्रजन कागजों के बिना त्याग दिया गया.

इंडिया टुडे को भेजे गए एक लिखित पत्र में महिला आयोग के विधि अधिकारी नीरज रावत ने बताया कि प्राप्त शिकायतों के आधार पर दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब इस अपराध से सबसे ज्‍यादा प्रभावित हैं. हालांकि वैश्विक अर्थव्यवस्था में अस्थिरता और अच्छा वेतन पाने वाले योग्य युवकों के आसानी से मिल जाने के कारण एनआरआइ दूल्हे की ललक हाल के वर्षों में थोड़ी कम हुई है, लेकिन अब भी कुछ लोग चाहते हैं कि उनकी बेटियां विदेश में बस जाएं. पंजाब पुलिस में एनआरआइ मामलों की महानिरीक्षक 44 वर्षीया गुरप्रीत कौर देव कहती हैं, ‘ऐसा कोई प्रस्ताव हाथ से छूटने न देने की उत्सुकता में परिवारवाले उन साधारण सावधानियों की भी अनदेखी कर देते हैं, जो शादी करने के परंपरागत तरीकों में बरती जाती हैं.’

पंजाब में पिछले तीन वर्षों में विदेशों में बसे पतियों के खिलाफ अपनी पत्नियों को छोड़ देने के 159 आपराधिक मामले दर्ज किए गए हैं. पंजाब एवं हरियाणा हाइकोर्ट में ऐसी कई दुलहनों की ओर से मुकदमा लड़ चुकीं चंडीगढ़ की 42 वर्षीया वकील दलजीत कौर कहती हैं कि लंबे अरसे से पंजाबी पश्चिम से मुग्ध रहे हैं और इसी कारण वे विदेशों में बसे दूल्हों के लिए लालायित रहते हैं. वे कहती हैं, ‘इसके अलावा विभाजित होती जोत के कारण कई परिवारों की खेती से आमदनी घट गई है. विदेशों में बसे लोगों की सफलता के किस्सों के कारण वे विदेशों में रिश्ते के लिए लालायित रहते हैं.’

पंजाब की इन पीड़ितों (जिन्हें उनके पति ने त्याग दिया) की लड़ाई लड़ने वाले पूर्व केंद्रीय समाज कल्याण मंत्री बलवंत सिंह रामूवालिया का मानना है कि राज्‍य में पिछले दो दशकों में 15,000 से ज्‍यादा महिलाओं को उनके विदेश में बसे पतियों ने छोड़ा है. 68 वर्षीय बुजुर्ग रामूवालिया कहते हैं, ‘विदेशों में बसे पति मामलों को लंबे से लंबा खींचकर महिलाओं को थका देने की रणनीति अपनाते हैं.’

इन पीड़ितों के मामलों की देखरेख के लिए जालंधर के क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय ने मार्च 2011 में महिला प्रकोष्ठ बनाया. 1967 के पासपोर्ट अधिनियम के कानूनी प्रावधानों को प्रयोग में लाया जा रहा है, ताकि उन लोगों के पासपोर्ट रद्द या बरामद किए जा सकें, जिन्होंने अपनी वैवाहिक स्थिति के बारे में गलत जानकारी दी है या जिनके खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे हैं. अब तक 50 से ज्‍यादा मामलों में पासपोर्ट रद्द करने के आदेश हो चुके हैं. लेकिन ऐसा आदेश तभी दिया जाता है, जब पीड़ित महिलाएं विवाह का सबूत पेश करती हैं, जो ऐसे मामलों में बहुत ही कम उपलब्ध हो पाता है.

कुछ मामलों में महिला आयोग को भी सफलता मिली है. गुरप्रीत कौर को जब उनके पति ने भारत में छोड़ दिया, तो आयोग ने उन्हें नया पासपोर्ट जारी करवाया. आयोग ने ब्रिटिश अदालतों में उनका मुकदमा लड़ने के लिए एक गैर-सरकारी संगठन की भी व्यवस्था की है. पैनल न्यूजीलैंड में सुनयना देवी का मामला भी देख रहा है. उन्हें उनके घर से तब सुरक्षित निकाला गया था, जब उनके पति ने उन्हें विक्षिप्त घोषित करवा दिया था.

'सफलताएं' जहां कम हैं, और कभी-कभार ही मिलती हैं, वहीं इन पीड़ितों की भारी संख्या से संकेत मिलता है कि लापता पतियों की धर-पकड़ के लिए कानून में अब भी संशोधन की जरूरत है. ज्‍यादातर पति कानूनी खामियों का लाभ उठाकर ही लापता हो पाते हैं.

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