पिछले साल सितंबर में गंगोत्री क्षेत्र में भारी हिमपात में लापता हुए पश्चिम बंगाल के पथारोही दल के आठ सदस्यों के शव दस महीने बाद इस जुलाई माह में एक पर्वतारोही को ग्लेशियर के नीचे दबे एक टेंट में दिखे. इन शवों को दो हफ्ते तक चले एक बड़े रिकवरी अभियान के बाद 21 जुलाई को उत्तरकाशी लाया गया.
हावड़ा माउंटेनियरिंग ऐंड ट्रेकर्स एसोसिएशन के 17 सदस्यों के इस दल ने गंगोत्री से बद्रीनाथ की पैदल यात्रा गोमुख से शुरू की थी, जो कालिंदी दर्रे से होकर गुजरती है. सुदिप्तो मित्रा जो इस दल के उप-नेता थे बताते हैं, ''दो सदस्यों की सेहत खराब होने पर मुझे वापस जाना पड़ा. हम नौ सदस्य तीसरे पड़ाव से ही गंगोत्री लौट आए जबकि दल के नेता एन. प्रसाद राव समेत आगे बढ़े सात लोग लापता हो गए.''
राज्य सरकार के अधिकारी और हिमालय सपोर्ट टीम के समन्वयक प्रसन्नजीत सामंत कहते हैं, ''किसी तरह इन पर्वतारोहियों का पता लग सके इसलिए हम गंगोत्री जाने वाले बंगाल के पर्वतारोहियों के लगातार संपर्क में थे.'' हुआ भी ऐसा ही. बासुकीताल क्षेत्र में बर्फ के नीचे एक टैंट में लापता पर्वतारोहियों के शव बंगाल के पर्वतारोही आनिंद मुखर्जी ने ही देखे.
पिछले कुछ सालों से कालिंदी की यात्रा पर हादसे बढ़ते जा रहे हैं. पर्वतारोहण पर जाने वाले दल उत्तरकाशी से भारवाहक और गाइड ले जाते हैं. दुर्घटनाओं के कारणों में अप्रशिक्षित कर्मी और अपर्याप्त सुविधाएं मुख्य हैं. 2008 में भी कालिंदी दर्रे और अरवा ताल के बीच पांच भारवाहकों की मौत हो गई थी. इन कर्मियों को तैनात करने वाली कंपनी या तो जिम्मेदारी लेने से मना कर देती है या लापता हो जाती है.
रॉबिन बनर्जी कहते हैं, ''इस दल को जिस कंपनी ने सपोर्ट किया था वह लापता है. टूर कंपनी पंजीकृत भी नहीं थी फिर जिला प्रशासन ने कंपनी को इस टूर में सहयोग करने की इजाजत क्यों दी.'' व्यवस्था ठीक करने का बीड़ा उत्तरकाशी के प्रशिक्षित पर्वतारोहियों ने उठाया है, इसके लिए उन्होंने गढ़वाल हिमालय ट्रैकिंग एवं माउंटेशियरिंग एसोसिएशन बनाई है.
एसोशिएशन के सचिव अवधेश भट्ट बताते हैं, ''हम प्रशासन को योग्य कंपनियों की सूची बना कर दे रहे हैं और अनुरोध कर रहे हैं कि इस सूची में शामिल कंपनियों द्वारा भेजे जाने वाले टूर के आवेदनों पर ही विचार किया जाए.''

