नाव न बांधो ऐसी ठौर
दिनेश पाठक
परमेश्वरी प्रकाशन,
दिल्ली-92,
कीमतः 315 रु.
कुछ छूटा-साः दिनेश पाठक
कथाकार दिनेश पाठक का यह दूसरा उपन्यास है. और हिंदी में एक लंबे अरसे बाद प्रेम को केंद्र में रखकर कोई उपन्यास सामने आया है. छुटपुट तरीके से प्रेम संबंधों को लेकर इस बीच कई उपन्यास आए लेकिन नाव न बांधो ऐसी ठौर उनसे थोड़ा अलग इन अर्थों में है कि इसमें प्रेम और प्रेम के रंग पूरी शिद्दत के साथ घुले-मिले हैं.
वैसे कहीं-कहीं कोरी भावुकता की वजह से प्रेम का यह रंग फीका और धूसर भी दिखाई पड़ता है. भाषा के साथ कुछ अटपटे प्रयोग भी हैं. सबसे ज्यादा खटकने वाली बात है कथा के साथ ट्रीटमेंट.
कहानी वर्तमान से शुरू होती है और पाठकों को फ्लैशबैक में ले जाती है, फिर बड़े ही अटपटे ढंग से कथा का अंत हो जाता है. कथा फिर वर्तमान में लौटकर नहीं आती. पाठकों के सामने यह सवाल रह जाता है कि दीपांकर और शाल्मली लंबे समय बाद मिलते हैं तो प्रेम के वे रंग उनके भीतर किस तरह से घुलते हैं जिसे पीछे छोड़कर जीवन की डगर पर दोनों आगे निकल गए थे.
शायद इसी अंत की वजह से एक तिश्नगी का एहसास यह उपन्यास पढ़कर होता है. बरसों बाद शाल्मली और दीपांकर जिस तरह मिलते हैं और उनके अंदर जो भाव पनपते हैं, उसे बस छूकर ही गुजर गए हैं दिनेश पाठक. उस मुलाकात से कथा की कड़ियां जुड़ती हैं, यह सही है लेकिन कथा की कड़ियां जुड़ते हुए जहां खत्म होती हैं, वह कथा का अंत नहीं हो सकता.
नाव न बांधो ऐसी ठौर प्रेम का वह शाश्वत एहसास है जो हर आदमी के भीतर किसी न किसी रूप में मौजूद रहता है. शाल्मली और दीपांकर पेशे से प्राध्यापक हैं और दोनों के बीच एक समानता है. दोनों का सरोकार साहित्य से है. दीपांकर का जुड़ाव हिंदी साहित्य से तो शाल्मली का अंग्रेजी साहित्य से. दोनों में एक आत्मीय रिश्ता पनपता है. पहल शाल्मली की तरफ से होती है. इसकी वजह है. साहित्य से अनुराग रखने वाली शाल्मली के जीवन में कहीं एक अधूरेपन का एहसास है और यही अधूरापन उसे दीपांकर के पास ले आता है. पति के पास शाल्मली की भावनाओं को समझ्ने-जानने का समय नहीं है. वह अपने व्यवसाय में इस कदर उलझा हुआ है कि शाल्मली उसके साथ रहकर भी नहीं रहती.
दीपांकर भी शादीशुदा हैं और भरापूरा परिवार है. पत्नी हर सुख-दुख में साझीदार है. उन दोनों के बीच किसी 'तीसरे' क ा प्रवेश पूरी तरह वर्जित है. लेकिन शाल्मली इसे तोड़ती हुई दीपांकर के जीवन में सेंध लगाने में कामयाब हो जाती है. उसका यह प्रेम देह की भूख मिटाने के लिए नहीं है.
दीपांकर का सामीप्य पाकर वह अपने भीतर उतरते सुख को कतरा-कतरा महसूस करना चाहती है, जो उसे पति या घरवालों से नहीं मिल पाया है. वह नहीं जानती कि इस प्रेम का अंजाम क्या होगा, फिर भी दीपांकर को चाहती है. कुछ दूर साथ चलने के बाद दीपांकर को इस बात का एहसास होता है कि वह घर-परिवार के साथ ठीक नहीं कर रहा. खुद को संयमित कर वह परिवार के पास लौट जाता है.
हिंदी साहित्य में वैसे शाल्मली जैसे ढेरों स्त्री किरदार मिल जाएंगे. सो, बहुतों को उपन्यास पढ़ते हुए कई चेहरे इसमें दिखाई दे सकते हैं. कथा की शुरुआत भी साहित्य की राजनीति और साहित्यकारों की उठापटक के जिक्र भर से हुई है. पाठक इसे बहुत विस्तार नहीं देते. बीच-बीच में शिक्षा जगत में फैली अराजकता, सत्ता और व्यवस्था की सड़ांध पर भी वे सरसरी तौर पर कलम चलाते हैं लेकिन कथा के मूल में प्रेम ही है. कुछ भावुक क्षणों में भी उन्होंने अपने पात्रों को भटकाया नहीं है. भूमंडलीकरण के दौर में जब प्रेम जैसे शब्द 'वैलेंटाइन डे' तक सिमट कर रह गए हों तब ऐसे में यह उपन्यास हमें प्रेम के रंग में भिगोता भी है और डुबोता भी है.

