विश्वामित्र
ब्रजेश के. वर्मन
भारतीय ज्ञानपीठ,
लोदी रोड,
नई दिल्ली-03
कीमतः 550 रु.
अनुभवों की कथाः बृजेश बर्मन
हमेशा से ही एक चुनौती रहा है पौराणिक आख्यानों के 'बैकड्रॉप' पर लिखना. परंपरा से जुड़ी व्याख्याओं, पात्रों की सामाजिक हैसियत, उनका धार्मिक महत्व और सबसे महत्वपूर्ण उस पात्र विशेष के कालखंड का विशेष ध्यान रखना होता है. ऐसी कई चुनौतियों को स्वीकारते और अपने ऐतिहासिक-बोध का परिचय देते हुए ब्रजेश के. वर्मन विश्वामित्र के साथ उपस्थित हुए हैं. मानवीय संवेदना से शून्य हो चुकी पुलिस की नौकरी में रहकर भी ब्रजेश रचनात्मकता के लिए स्पेस निकाल लेते हैं, यह सुखद आश्चर्य है.
उपन्यास में मूलतः कोई कथा नहीं है. ब्रजेश ने अनुभूतियों को नहीं बल्कि अपने अनुभवों को कथा का आधार बनाया है और उसे बौद्धिक-विमर्शों के जरिये व्याख्यायित करने की कोशिश की है. वे अनुभूतियों के नहीं बल्कि अनुभवों के कथाकार हैं. उनके कुछ शब्द देखें, ''...जो व्यक्ति हृदय से कुटिल होता है, वह विजयी व्यक्ति के चरण को छूने वाला सबसे पहला प्राणी होता है...'' एक जगह वे कहते हैं, ''नगर की संस्कृति में शोषित को पता नहीं चलता किसने, कैसे उसे अपना शिकार बना लिया. शिकार के नियम प्रतिदिन बदलते रहते हैं...''
विश्वामित्र की एक विशेषता उसका प्रश्नोत्तर शैली में होना है. ब्रजेश ने यह शैली भी शायद पौराणिकी से ही ली है. विश्वामित्र-लक्ष्मण संवाद के जरिए वे तमाम मौजूदा सामाजिक समस्याओं को उठाते हैं. दलित, आदिवासी, स्त्री-विमर्श सबसे जूझ्ते दिखते हैं. बगैर किसी कथा-सूत्र के सिर्फ प्रश्नोत्तर और बौद्धिक-विमर्शों के सहारे विश्वामित्र जैसे विराट चरित्र को साध लेने की जिद वाले इस कथाकार के लिए यह कहना शायद पाठकों को चकित करेगा कि विश्वामित्र ब्रजेश वर्मन का पहला उपन्यास है.
उपन्यास के पात्र वैदिक काल के हैं लेकिन ब्रजेश के यहां वे आज के पात्रों में बदलकर आते हैं. इसके विश्वामित्र को देखकर बाबा नागार्जुन का दुखरन मास्टर याद आ जाता है. ब्रजेश के लक्ष्मण वाचाल हैं. मुमकिन है, यह उनकी मजबूरी रही हो क्योंकि राम तो परंपरा से सर्वज्ञानी हैं, ऐसे में वे विश्वामित्र से पूछते क्या? और ब्रजेश को ऐसे बहुत सारे प्रश्नों का समाधान देना था, जो उन्होंने विश्वामित्र के बहाने दिया है.
विश्वामित्र ऐसे लेखक की चिंता का दस्तावेज है जो देश, देश के विकास, देश की व्यवस्था को सुचारु बनाने और समाज में व्याप्त असमानता की गहरी खाई को पाटने के लिए सोचता है. लेखक कहता है, ''यह सिर्फ अयोध्या जैसे किसी एक राज्य का सवाल नहीं, प्रश्न पूरे भारत का है...'' या ''...युद्ध हमारी प्राथमिकता नहीं है....'' या फिर एक अन्य प्रसंग में वह कहता है, ''...आधे लोग विकास चाहते हैं और बाकी युद्ध. बिना युद्ध के विकास नहीं और कृषि हल-धारण किए बिना संभव नहीं. बिना धनुष-बाण को आराम दिए हल-धारण कैसे हो...''
ब्रजेश मिथकों का एक संसार रचते हैं, उसे व्याख्यायित करते हैं और उन मिथकों की पौराणिक व्याख्याओं को चुनौती देते हुए उनको मौजूदा समाज की समस्याओं से जोड़ देते हैं. वह अहिल्या-उद्धार प्रसंग हो, मेनका-प्रसंग या फिर इंद्र का प्रसंग, ब्रजेश मिथकीय अवधारणा में न फंस इसकी अपनी मौलिक व्याख्या करते हैं.

