आदिग्राम उपाख्यान
कुणाल सिंह
भारतीय ज्ञानपीठ, लोदी रोड,
नई दिल्ली-03,
कीमतः 200 रु.
कुशल किस्सागो भी, व्यंजक भीः कुणाल सिंह
आधुनिक युग में पूरी दुनिया में आर्थिक और राजनैतिक प्रक्रिया की दो मुख्य पद्धतियां रही हैं: पूंजीवादी और मार्क्सवादी. पूंजीवादी प्रणाली व्यापक जनसमुदाय की बजाए कुछ लोगों के हित लाभ में होती है. दूसरी ओर मार्क्सवादी पद्धति सर्वहारा के साथ अपनी पक्षधरता व्यक्त करती है. पर निकट अतीत में अखिल वैश्विक स्तर पर, शासन-प्रणाली के विकल्प के रूप में वह विफल रही है. यह परेशान करने वाला प्रश्न है कि व्यापक जनसमुदाय से पक्षधरता घोषित करने वाली प्रणाली से आम जन विलग क्यों हो रहा है. कुणाल सिंह का यह उपन्यास इसी प्रक्रिया को समझ्ने का प्रयास है.
यह तात्कालिकता के भीतर की ऐतिहासिकता को पकड़ता है. उपन्यास के केंद्र में पं. बंगाल के सत्ता परिवर्तन की आहटें हैं. भारत में पश्चिम बंगाल वाम प्रयोग का सबसे सफल केंद्र रहा है. यहां भूमि सुधार का सफल कार्यक्रम चला, सशक्त ट्रेड यूनियन आंदोलन विकसित हुआ. अब वाम वहां संकटग्रस्त है. इस उपन्यास में जिस चिंता और उसके कारण की अभिव्यक्ति हुई है वह एक विशेष राज्य से संदर्भित है, पर उसमें वैश्विक परिघटना की अनुगूंज है. वाम राजनीति ने किस प्रकार पूंजीवादी मॉडल के संक्रमण और साजिश, और खुद के सर्विस मैनुअल में सरोकार के ह्रास के कारण जनसमर्थन खोया, यह उपन्यास इसी प्रक्रिया की तलाश करता है.
क्राइसिस की पहचान यहां दो स्तरों पर की गई है. एक ओर सत्ता शासन के लंबे दौर में चलता रहा फरेब है, तो दूसरी ओर वर्तमान को पढ़ने में चूक. आदिग्राम की जनता एक बार 1967 में सीपीटी कंपनी द्वारा छली जा चुकी है, जिसमें उनकी जमीन चली गई और नौकरी के वादे पूरे नहीं हुए. अब जब वहां एक कंपनी केमिकल हब बैठाना चाहती है और उसके लिए जमीन अधिग्रहण होना है तो जनपक्षधरता की बात करने वाली सत्ता पूंजीवादी शक्तियों के अंध समर्थन में उतर आई है. उपन्यास इस ओर ध्यान खींचता है कि गड़बड़ी वाम विचारधारा में नहीं बल्कि उसकी कार्यप्रणाली में आए अंतर से उपजी है. कारण ऐतिहासिक भी है और तात्कालिक भी. आम जन को सर्वाधिक महत्व देने वाली वाम सत्ता वह अहमियत काडर को देने लगी. कार्यप्रणाली और उद्देश्य के स्तर पर यह चूक लंबे समय से चलती रही. सर्वहारा अंधेरे में ही रहा.
धुर पिछड़ेपन में जीते आदिग्राम के लोग नहीं जानते कि उनके मातवर पंचानन हाल्दार किस आधार पर राशन की पुर्जी बनाते और कैसे कमीबेशी करते हैं. एक दिन वे पाते हैं कि हाल्दार, विधायक रासबिहारी घोष, सांसद माखनाद और पार्टी के जोनल सेक्रेटरी पिनाकी दासगुप्त उनकी जमीन की बेदखली की प्रक्रिया में शामिल हैं. इस नापाक गठबंधन को जब लोग पहचानते हैं, उनका विरोध फूट पड़ता है. वे उग्र वाम की ओर मुड़ते हैं.
इसके साथ ही उपन्यास केंद्र की विकास नीति, नौकरशाही की जनविरोधी साजिशाना कार्यप्रणाली, पूंजीवादी व्यापारिक प्रक्रिया की मानव विरोधी रीति-नीति और इन सबके बीच से उग्र वाम के उभार की प्रक्रिया को सामने लाता है. विडंबना है कि वहां भी प्रतिरोधी आंदोलन अंजाम तक नहीं पहुंच पाता. एक समय तक तो वे प्रतिरोध को गति देते हैं, फिर पीछे हट जाते हैं. दूसरी ओर सत्तांकाक्षी विरोधी पार्टी इसे अवसर के रूप में देखती है, और इस प्रकार वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो जाती है. किसानों की सामूहिक हत्या होती है. वास्तविक प्रश्न इन सबके बीच खो जाता है.
आदिग्राम उपाख्यान वस्तु और अभिव्यक्ति दोनों ही दृष्टि से विशिष्ट है. इसमें बाघा और दक्खिना चोर है पर दोनों में पीढ़ी और मानदंड का अंतर है. बाघा चोर होने के बावजूद चोरी को धत्कर्म मानता है, पर बार-बार रंग बदलने वाला, चोरी से स्मगलिंग, जमाखोरी के रास्ते एसपीओ में शामिल होने वाला दक्खिना सब कुछ डंके की चोट पर करता है. वह कहता है ''...आज जब दिन-दहाड़े आसानी से चोरी की जा सकती है तो रात में नींद खराब करने की क्या जरूरत?''
उपन्यास का महत्वपूर्ण पक्ष इसका शिल्प भी है. इसमें गजब की किस्सागोई और व्यंजकता है. अभिधा और रूपकत्व की एक-दूसरे में आवाजाही है. भाषा के खिलंदड़ेपन का प्रयोग समाज के मि.जाज को पढ़ने और विद्रूपता पर व्यंग्य के लिए हुआ है-''...तराजू से माप तौल किया जाता है. निष्कर्ष निकाला जाता है कि पृथ्वी पर चार किले शहर हैं, डेढ़ किलो देश. एक क्विंटल मरद मानुख और एक मन औरतें...एकाध दर्जन रुलाई और छटांक भर हंसी.'' उपन्यास के रचाव, भाषा-रूप, और वाक्य विन्यास के माध्यम से समाज विशेष के सांस्कृतिक पक्ष को सामने लाया गया है.

