भारत औऱ चीन ने सोमवार 6 जुलाई को पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के टकराव वाले स्थानों से सेना को पीछे हटाने की घोषणा की. 6 जुलाई को भारतीय सेना के अधिकारियों ने कहा कि चीनी सेना (पीएलए) ने टेंट और ढांचे पेट्रोल पोस्ट 14 हटा लिए हैं और 1 किलोमीटर पीछे चली गई है. पीपी 14 वही जगह है जहां 15 जून को खूनी संघर्ष हुआ था जिसमें 20 भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे और नामालूम संख्या में चीनी सैनिक मारे गए थे. सेना का कहना है कि गलवान घाटी के उत्तर में दो अन्य स्थानों जहां हॉट स्प्रिंग और गोग्रा में पीएलए ने मई में घुसपैठ की थी वहां से भी गाड़ियां पीछे हट चुकी हैं.
तनाव घटाने की ये प्रक्रिया राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल की चीनी विदेश मंत्री वांग यी से रविवार शाम हुई बातचीत के बीच दो घंटे की बातचीत के कुछ घंटों बाद शुरू हुई. इस बातचीत का ब्योरा सोमवार दोपहर को जारी हुआ और बताया गया कि दोनों पक्ष एलएसी पर पूर्ण रूप से तनाव घटाने पर सहमत हुए हैं. इससे वर्ष 1962 के बाद से अब तक के सबसे बड़े सैन्य टकराव के शांत होने की उम्मीदें बढ़ीं. अगले कुछ दिनों तक भारतीय सैनिकों को चीनी सेना के सचमुच पीछे हटने की जांच के लिए तनाव वाली जगहों पर जाकर सत्यापन करना होगा. 15 जून का झगड़ा तब हुआ जब 16 बिहार रेजीमेंट की पेट्रोल पार्टी कर्नल संतोष बाबू के नेतृत्व में, 6 जून को कॉर्प्स कमांडर की बैठक में जमावड़ा घटाने पर बनी सहमति का भौतिक सत्यापन करने गए थे.
महत्वपूर्ण यह है कि दोनों ही पक्षों ने तनाव घटाने के लिए कोई समयसीमा तय नहीं की है और इसे अंधेरे में रखा है. भारत ने पूर्वी लद्दाख से लगती 900 किलोमीटर की एलएसी पर चीन से सेना पीछे हटाकर 5 मई से पहले की स्थिति बहाल करने की मांग की है. माना जा रहा है कि चीनी सेना ने घुसपैठ के प्रयास किए हैं.
सेना की उत्तरी कमान के पूर्व कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल डी.एस. हुडा कहते हैं, “ऐसा नहीं है जैसे कि दोनों पक्ष इससे पहले तनाव घटाने पर सहमत नहीं हुए.” दरअसल वे 6 जून को भारतीय और चीनी कॉर्प्स कमांडर के बीच पहली बैठक का हवाला दे रहे थे जिसमें दोनों पक्ष तनाव घटाने पर सहमत हुए थे. हुडा का कहना है, “हमारे लिए इंतजार करना बेहतर रहेगा.”
दोनों पक्षों से जारी बयानों को बारीकी से देखा जाए तो कई विरोधाभास दिख रहे हैं. रणनीतिक मामलों के विश्लेषक ब्रह्म चेलानी ने ट्वीट किया है, “भारत का जोर देना कि दोनों पक्ष लाइन ऑफ कंट्रोल का सख्ती से पालन करेंगे और यथास्थिति में किसी भी तरह के बदलाव की एकतरफा कार्रवाई नहीं करेंगे-यह बात चीन के वक्तव्य से गायब है.”
विदेश मंत्रालय के वक्तव्य में कहा गया है कि वांग और डोवाल दोनों इस बात पर सहमत हुए कि एलएसी पर तनाव घटाने के लिए सैनिकों के पीछे हटने की प्रक्रिया जल्द से जल्द पूरी करना आवश्यक है ताकि भारत चीन सीमा पर शांति औऱ तनावरहित माहौल बने. और, “वे इस बात पर भी सहमत हुए कि दोनों पक्ष एलएसी पर तनाव घटाने की प्रक्रिया को तेजी से पूरा करेंगे.” साथ ही भारत चीन सीमा के इलाकों में चरणबद्ध तरीके से तनाव घटाया जाएगा. यहां तनाव घटाना (डिएस्केलेशन), जल्द से जल्द (अर्लिएस्ट) और तेजी से (एक्सपेडिशियसली) शब्द चीनी वक्तव्य से नदारद थे.
चीनी विदेश मंत्रालय की तरफ से जारी वक्तव्य में सिर्फ डिसएंगेजमेंट शब्द का इस्तेमाल किया गया और वह भी 389 शब्दों के वक्तव्य की आखिरी लाइन में. चीनी विदेश मंत्रालय ने, ‘मोर्चे के सैनिकों को शीघ्रातिशीघ्र (एज सून एज पॉसिबल) पीछे हटाने’ की बात कही है. लेह में तैनात 14 कॉर्प्स के पूर्व जीओसी लेफ्टिनेंट जनरल राकेश शर्मा कहते हैं, “शीघ्रातिशीघ्र ही बयान में मियाद का एकमात्र सूचक है. दोनों ही वक्तव्य समयसीमा तय करने से बचे हैं जो कि सबसे महत्वपूर्ण नकारात्मक बात है.” इसका सीधा मतलब ये निकलता है कि सैनिक सीमा पर कुछ हफ्तों या कुछ महीनों तक तैनात रह सकते हैं. विश्लेषकों का कहना है कि चीनी बयान में पूरे घटनाक्रम के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराया गया है, इस बात का जिक्र किए बगैर कि पीएलए ने मई में सीमा पर एक सोची समझी रणनीति के तहत सैन्य योजना शुरू की. भारतीय सेना ने तो उतनी ही संख्या में तैनाती (मिरर डिप्लायमेंट) कर इसका जवाब दिया.
चीनी वक्तव्य में कहा गया है, ‘भारत चीन सीमा पर पश्चिमी सेक्टर में गलवान घाटी में सही या गलत जो कुछ भी हुआ वह एकदम स्पष्ट है. चीन सीमावर्ती इलाकों में शांति स्थापित करने के साथ अपनी भौगोलिक संप्रभुता की दृढ़ता से रक्षा करेगा.'
15 जुलाई 1962 से प्रकाशित एक अखबार की बैनर हेडलाइन, जिसमें पीछे हटने पर लगी हेडलाइन भारतीय सोशल मीडिया में छाई रहीं जैसे- चीनी सैनिक गलवान पोस्ट से हटे, भारतीय जवानों ने अद्वितीय साहस दिखाया, दिल्ली की चेतावनी का असर दिखा. ये अक्तूबर 1962 में चीन के साथ हुई युद्ध को याद करते हुए भारतीय राजनीतिक और सैन्य प्रतिष्ठान के लिए आत्मसंतोष वाली बात थी. 10 जुलाई 1962 को पीएलए घाटी में स्थापित एक भारतीय चौकी तक आ गई थी लेकिन बाद में इसे वापस बुला लिया गया था. इससे दिल्ली में यह संदेश गया कि विवादित सीमाओं पर छोटी सैन्य चौकियां स्थापित करने की नीति काम कर रही है. पत्रकार नेविली मैक्सवेल ने 1970 की अपनी किताब ‘इंडियाज चाइना वार’ में इस घटना का जिक्र किया है: 'चीन के गलवान पोस्ट पर आने की घटना 11 जुलाई को प्रकाशित हुई जिसमें कहा गया कि चीन उकसावे की कार्रवाई के तहत भारतीय क्षेत्र में घुसा. बाद में जब चीन के भारतीय चौकी को कोई नुक्सान न करने और राजनीतिक धमकी न देने की बात को मीडिया और राजनीतिक गलियारों में जोरदार सराहना मिली.'
20 अक्तूबर 1962 को गलवान घाटी में चीनियों के घुस आने के बाद 33 भारतीय सैनिकों की शहादत हुई थी. करीब छह दशक बाद भारत ये सबक ले चुका है और सावधानी से हालात का भौतिक सत्यापन कर रहा है.
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