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झारखंड में विधानसभा नहीं, टकसाल!

राजद अध्यक्ष गिरिनाथ सिंह झारखंड विधानसभा को टकसाल कहते हैं. उनका मानना है कि इसे सिर्फ बजट पास करने के लिए बुलाया जाता है. उनकी बात में दम है.

झारखंड विधानसभा के बाहर प्रदर्शन
झारखंड विधानसभा के बाहर प्रदर्शन
अपडेटेड 2 जनवरी , 2012

राजद अध्यक्ष गिरिनाथ सिंह झारखंड विधानसभा को टकसाल कहते हैं. उनका मानना है कि इसे सिर्फ बजट पास करने के लिए बुलाया जाता है. उनकी बात में दम है. वह इसलिए क्योंकि 19 से 23 दिसंबर तक चलने वाले शीतकालीन सत्र में भी न तो झारखंड की किसी मूल समस्या पर चर्चा हुई, न ही गरीब आदिवासी जनता के हित का कोई काम.
एक काम हुआ, वह यह कि सरकार ने 1,189 करोड़ रु. का अनुपूरक बजट पेश किया और पारित करवाया. झारखंड विकास मोर्चा (झाविमो) के विधायक प्रदीप यादव इस विडंबना की ओर कुछ इस तरह इशारा करते हैं, ''नवंबर माह तक सरकार मूल बजट का सिर्फ 17 प्रतिशत ही खर्च कर पाई है. 34 में से छह विभागों का खर्च शून्य है.''
नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र प्रसाद सिंह कहते हैं, ''सरकार मूल बजट का महज 25 प्रतिशत ही खर्च कर पाई है.'' इससे पहले भी एक अनुपूरक बजट मानसून सत्र में पारित करवाया गया था. यह 835 करोड़  रु. का था. इस सत्र में पारित अनुपूरक बजट के बाद बजट राशि 35,145 करोड़ रु. की हो गई है. विपक्ष के मुताबिक यह सब मार्च तक लूट की तैयारी है. वित्त मंत्री हेमंत सोरेन इस आरोप को निराधार बताते हैं, ''हमने पिछली बार भी लूट पर अंकुश लगाया था. आगे भी लगाएंगे. लेकिन विपक्षी सदस्यों को भरोसा नहीं है.''
यही नहीं, शीतकालीन सत्र के पांच दिनों में से साढे़ तीन दिन विपक्ष ने इस बात के विरोध में सदन की कार्यवाही नहीं चलने दी कि सरकार लौह अयस्क राज्‍य के बाहर बेचने का अपना फैसला वापस ले. मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने सदन में यह घोषणा भी की कि सरकार इस फैसले पर पुनर्विचार करेगी. लेकिन सत्र खत्म होने के तुरंत बाद कैबिनेट की बैठक बुलाकर सरकार ने अपने पिछले फैसले पर मुहर लगवा ली. गौर फरमाने पर यह भी पता चलता है कि 12 साल पहले सीपीए के तहत यह तय हुआ था कि जिन राज्‍यों में विधायकों की संख्या 100 से कम होगी, उन राज्‍यों में भी साल में विधानसभा की कम-से-कम 50 बैठकें बुलाई जाएं. अलग राज्‍य के गठन के शुरुआती दो-तीन साल इस पर अमल हुआ. बाद में किसी भी साल औसतन 30 बैठकें भी नहीं 'ईं. इस साल सदन मुश्किल से 23 दिन तक चला.
पिछले 11 साल में लगभग सभी प्रमुख दलों की सरकारें रहीं. लेकिन 163.88 करोड़ रु. की धनराशि खर्च कर कुल 291 दिन ही विधानसभा की बैठकें हुईं. इनमें मूल काम तो बजट राशि को पारित कराना रहा. एक अन्य जरूरी काम विधायकों, मंत्रियों आदि के वेतन में आठ बार बढ़ोतरी संबंधी विधेयक पारित कराना था. आज झारखंड में हर विधायक को 75,000 रु. और मंत्री तथा विधानसभा अध्यक्ष को सवा लाख रु. का मासिक वेतन मिलता है.
विधानसभा भ्रष्टाचार के आरोपों से भी अछूती नहीं है. माले विधायक विनोद सिंह कहते हैं, ''विधानसभा के एकाध सचिव को छोड़कर लगभग सभी सचिवों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप रहे हैं.'' विधानसभा अध्यक्षों पर भी बेमतलब बहाली करने का आरोप लगता रहा है. इस संबंध में हाइकोर्ट में एक मामला भी चल रहा है. 82 सदस्यीय झारखंड विधानसभा के लिए लगभग 800 कर्मचारी हैं. विधानसभा किराए के भवन में चल रही है. आधुनिकीकरण के नाम पर ढाई करोड़ रु. खर्च किए गए हैं. इसके बाद भी हाल के सत्र में उसका माइक सिस्टम ही फव्ल हो गया.

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