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नीतीश कुमार: शीर्ष पर बैठा अधीर अगुआ

राज्‍य के एक आइएएस अधिकारी उस समय कुछ ज्‍यादा ही बातूनी हो गए जब उन्हें बैठक में योजना आयोग के अधिकारियों से रूबरू होने का मौका मिला. उन्होंने बिहार के विकास की बातें शुरू कर दीं.

अपडेटेड 1 मई , 2011

राज्‍य के एक आइएएस अधिकारी उस समय कुछ ज्‍यादा ही बातूनी हो गए जब उन्हें बैठक में योजना आयोग के अधिकारियों से रूबरू होने का मौका मिला. उन्होंने बिहार के विकास की बातें शुरू कर दीं. उनके भाषण के मिनट भर बाद ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उनकी बात को बड़ी ही विनम्रता से बीच में ही काट दिया ''यहां इन बातों की चर्चा की जरूरत नहीं है.''

नीतीश ने कमान संभालते हुए कहा, ''ये विभाग में नए हैं और इन्हें ज्‍यादा जानकारी नहीं है. जमीनी हकीकत कुछ और ही है. बिहार को गंभीर सूखे से जूझ्ना पड़ रहा है.'' कमरे में बैठे  लोगों तक उनका संदेश पहुंच गया. मकसद बिहार की सफलता की दास्तान का गुणगान करना नहीं बल्कि कोष की जरूरत जाहिर करना था.

अगले दो घंटे तक योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया के साथ चली बैठक में मुख्यमंत्री के साथ मौजूद सचिवों को बोलने कामौका कम ही मिला और लगभग सारी बातचीत मुख्यमंत्री ने खुद ही की-उन्होंने स्पष्ट रूप से बताया कि उन्हें और कोष की जरूरत क्यों है.

नीतीश का प्रस्तुतीकरण तथ्यों और आंकड़ों से भरपूर था; उन्होंने सहजता और स्पष्टता से लेकिन बोर्डरूम में मौजूद अन्य लोगों के मुकाबले मंद स्वर में नीति संबंधी पहलों और गतिरोधों का विस्तृत ब्यौरा दिया, फिर भी अपने आग्रह पर जोर देने और अपनी बात विश्वसनीय ढंग से रखने में सफल भी रहे. 15 फरवरी को नई दिल्ली में हुई बैठक के लगभग तुरंत बाद अहलूवालिया ने बिहार की वार्षिक योजना में 20 फीसदी की वृद्धि करते हुए इसे 24,000 करोड़ रु. कर दिया.

नवंबर 2010 के विधानसभा चुनाव में जबरदस्त जीत दर्ज करके लगातार दूसरी बार सत्ता में लौटे नीतीश लगता है, अपने पहले कार्यकाल में नजरअंदाज की गई बात-अगर उन्हें अपने वादों पर खरा उतरना है तो उन्हें अफसरशाहों में भी खुद जैसे सोच का संचार करना होगा-का महत्व बखूबी समझ गए हैं.  पहले नीतीश नीतियोंयोजनाओं के अमल में पिछड़ने वालों को बर्दाश्त  करते रहे थे. उनके पहलेकार्यकाल में अफसरशाहों के खिलाफ खूब शिकायतें आई थीं. दूसरे कार्यकाल में, उन्होंने तय कर लिया कि अब बस बहुत हो गया.

इसी महीने में नीतीश ने अफसरशाहों के लिए समय सीमा तय करने के वास्ते कई घोषणाएं कीं. मसलनः अब बाबुओं से फाइल को तीन दिन में निपटाने के लिए कहा गया है अन्यथा उन्हें सजा भुगतनी होगी. नई व्यवस्था 25 अप्रैल से प्रभावी हो गई है और यह सभी सरकारी कर्मचारियों-ऑफिस असिस्टेंट से लेकर विभाग प्रमुख तक-पर लागू होगी. इसी तरह, विभाग प्रमुखों को चेताया गया है कि वे सरकारी अधिकारियों को बिना तैनाती के प्रतीक्षा सूची में न बनाए रखें. 

नीतीश को उनके नए कदमों ने ही राष्ट्रीय स्तर पर एक आदर्श बना दिया है. 4 अप्रैल को केंद्रीय कार्मिक मंत्रालय ने आदेश दिए थे कि सभी आइएएस अधिकारियों और ग्रुप हुए' के केंद्रीय सेवा के अन्य अधिकारियों को अपने वार्षिक संपत्ति रिटर्न के बारे में जानकारी सार्वजनिक करनी होगी-यह कदम जाहिर तौर पर बिहार के फरवरी में उठाए कदम से प्रेरित था.

लेकिन, यह पहला मौका नहीं है जब बाकी देश ने नीतीशकी पहल का अनुकरण किया. महिलाओं के लिए पंचायतों और अन्य शहरी निकायों में 50 फीसदी आरक्षण लागू करने का केंद्र सरकार का फैसला, बिहार के इस संदर्भ में मिसाल कायम करने के बाद लिया गया था. सूचना के अधिकार (आरटीआइ) कानून के आवेदकों के लिए कॉल सेंटर और विशेष सहायक पुलिस का गठन उनके कुछ अन्य फैसले हैं, जिन्हें दोहराया गया है.

बिहार में सड़कों, शिक्षा और स्वास्थ्य के ह्नेत्र में बड़ा बदलाव देखने को मिला है. महिलाओं के लिए उनके सकारात्मक कदम और महादलित केंद्रित नीतियों सरीखे सामाजिक प्रयासों के नतीजे भी सामने आए हैं. इन सब ने उनके कद में और इजाफा कर दिया है, लेकिन नीतीश आसानी से संतुष्ट होने वाले नहीं.

अपने मौजूदा कार्यकाल में नीतीश साफ तौर पर अपनी गलतियों से सबक लेते नजर आते हैं. सिर्फ दो साल पहले ही फरवरी 2009 में उन्होंने एक जनसभा में मंच से ही अफसरशाहों से अपने मोबाइल नंबर सबको देने के लिए कहा था, ताकि आम आदमी की सरकार के शीर्ष अधिकारियों तक सीधी पहुंच हो सके. इसका उलटा ही नतीजादेखने को मिला, तत्कालीन मुख्य सचिव आर.जे.एम. पिल्लै सरीखे अधिकारियों के फोन की घंटी बजना ही बंद नहीं हो रही थी-कुछ तो उन्हें तड़के 4 बजे फोन करके यह देख रहे थे कि वे जवाब देते भी हैं या नहीं.

फोन नंबरों के साथ ही इस कदम पर जल्द ही पानी डाल दिया गया. इसके स्थान पर, उन्होंने सेवा का अधिकार कानून लागू किया जो लोगों को समय सीमा के तहत सेवा मुहैया कराएगा. नीतीश का जवाबदेह प्रशासन का विचार अब भी नहीं बदला है, लेकिन अब उनके तरीके अधिक यथार्थवादी और कम शब्दाडंबरपूर्ण हो गए हैं.

साफ तौर पर, नीतीश कुमार प्रतीकात्मकता पर वास्तविकता को तरजीह दे रहे हैं. उनका यह बदलाव धीमा लेकिन प्रभावी है. बतौर एक राजनीतिक वे जनता की मर्जी के मुताबिक काम करना बंद नहीं कर सकते लेकिन वे साफ तौर पर समझ गए हैं कि सिर्फ बोलने से ही कुछ नहीं होने वाला.

शासन को संवारने के लिए अनगिनत विचारों की आमद के साथ ही, उन्हें यह भी पता है कि उन पर अमल किस तरह होगा. एक वरिष्ठ आइएएस अधिकारी बताते हैं, ''नीतीश को विभागों केबारे में उनके सचिवों से ज्‍यादा जानकारी है. पॉवर प्वाइंट प्रजेंटेशन के बीच में, वे आपसे कह सकते हैं कि पिछली स्लाइड पर जाएं और उनके सवालों का जवाब दें. वे यह भी जानते हैं कि किस लंबित परियोजना के लिए किस संयुक्त सचिव को दिल्ली में फोन करना चाहिए.

और तो और, वे बहुत तेज दिमाग हैं और आप उन्हें झंसा नहीं दे सकते.'' इससे यह बात साफ हो जाती है कि अपने दूसरे कार्यकाल में मुख्यमंत्री कुछ नाखुश क्यों दिखाई देते हैं. वे शायद इसलिए बेचैन हैं क्योंकि उनके सभी विचारों को अभी तक जमीनी स्तर पर योजनाओं में तब्दील नहीं किया गया है.

मुख्यमंत्री अपने नाम पहले ही कई अच्छे काम दर्ज करा चुके हैं. स्थानीय ह्नेत्र विकास कोष (लोकल एरिया डेवलपमेंट फंडएलएडी) को समाप्त कर विधायी बर्बादी पर अंकुश लगाने से लेकर सेवा का अधिकार कानून पेश करने तथा सभी सरकारी अधिकारियों और मंत्रियों की परिसंपत्तियों को सार्वजनिक करने के कदम के साथ ही नीतीश ने राष्ट्रीय मंच की ओर रुख करने की उम्मीद से पहले अपना घर दुरुस्त  करने का काम शुरू कर दियाहै.

नीतीश कुमार की सबसे बड़ी समस्या नकारात्मक बातों की लंबी फेहरिस्त रही है जो उपलब्धियों के बावजूद बिहार को पीछे धकेलने में लगी हुई हैं. उदाहरण के लिए, बेशक राज्‍य ने 200405 से 201011 में 10.93 फीसदी की वृद्धि, जो देश में सबसे अधिक वृद्धि दरों में से एक है, दर्ज की है, फिर भी इसकी प्रति व्यक्ति आय सबसे कम है, साथ ही इसकी 54.4 फीसदी जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे रहती है.

इसी तरह, पिछले पांच साल में बिहार में त्वरित सुनवाई व्यवस्था के कारण 57,341 अपराधियों को दोषी सिद्ध किया जा चुका है, लेकिन इनमें से कई अपराधी जमानत हासिल कर चुके हैं; संभवतः इसीलिए अपराध और संज्ञानात्मक अपराधों की दर अब भी बढ़ रही है. एक बार फिर, निवेश बढ़ रहा है लेकिन बिहार को बिजली की 45 फीसदी कमी की मार भी झेलनी पड़ रही है.

वे कोशिश चाहे जितनी कर रहे हों, नीतीश को कई लोग ''कुछ तो किया है'' मुख्यमंत्री के तौर पर देखते हैं-यह विशेषण पिछले साल उनके लिए जीत का पैगाम तो लाया लेकिन संपूर्णता का एहसास नहीं ला सका. बेहतरीन कोशिशों के बाद भी नीतीश कुमार ने जो वादे किए और जिन पर अमल किया उसमें अब भी बड़ा अंतर मौजूद है.

लेकिन उनके सब्र का बांध टूटने लगा है यह स्पष्ट हुआ पिछले माह एक जनसभा के दौरान जब उन्होंने अफसरशाही की अड़ंगेबाजी पर खीज जताई. नाराजगी का सार्वजनिक रूप से प्रदर्शन विनम्र नीतीश के लिए पूरी तरह अप्रत्याशित है और स्थापित परंपरा के खिलाफ भी.

राजनीतिक और अफसरशाह निजी तौर पर एकदूसरे को कोसते रहते हैं लेकिन उनके बीच  यह मौन सहमति मानी जाती है कि वे इन बातों को कभी भी सार्वजनिक तौर पर जाहिर नहीं करेंगे. मुख्यमंत्री की झल्‍लाहट उन अधिकारियों के प्रति उनकी हताशा का संकेत है जो ''उनके  सोच के साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चल पा रहे हैं.''

नीतीश कुमार का यह कहना कि वे कई रात इस चिंता के साथ सोते हैं कि कहीं कोई जनकल्याणकारी योजना लालफीताशाही की भेंट तो नहीं चढ़ गई-उनका एक नया पहलू सामने लाती है. ऐसा इसलिए क्योंकि अतीत में नीतीश कुमार को पार्टी कार्यकर्ताओं से ज्‍यादा अफसरशाहों पर ज्‍यादा यकीनरखने वाला माना जाता रहा है. लेकिन अब वे नकेल भी कसने को पूरी तरह तैयार दिखते हैं. वे जानते हैं कि देर होना कई बार अंधेर होने जैसा होता है.

कुल मिलाकर देखें तो नीतीश कुमार की टीम ने अच्छा प्रदर्शन किया है. बिहार सड़क निर्माण विभाग के सचिव प्रत्यय अमृत अकेले  आइएएस अधिकारी हैं जिन्हें वैयक्तिक श्रेणी में लोक प्रशासन में प्रधानमंत्री विशिष्टता पुरस्कार से  नवाजा गया है. उनकी इस उपलब्धि को बिहार के नवजागरण के साथ ही जोड़ कर देखा जा सकता है.

सिर्फ अफसरशाह ही नीतीश के सफाई अभियान का हिस्सा नहीं हैं. ग्रामीण कार्य मंत्री भीम सिंह को भी उस समय करारा जवाब मिला जब वे पार्टी के एक कार्यक्रम के नाम पर ''जनता का दरबार'' से खिसकने की कोशिश कर रहे थे. उनसे कहा गया, ''अपनी सीट पर ही बैठे रहें और दरबार खत्म होने तक सीट पर ही रहें.'' एक अन्य मंत्री की उस समय खिंचाई हुई जब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की बैठक के दौरान महिला विधायक ने उन पर एक इंजीनियर का पक्ष लेने का आरोप लगाया.

नीतीश कुमार जानते हैं कि जब तक व्यवस्था साफसुथरी नहीं होगी वे अच्छा  प्रदर्शन नहीं कर सकेंगे. वे चाहते हैं कि विधायक और अफसरशाह दोनों ही उनके विचारों पर अमल करें. नीतीश यहां से कहां जा सकते हैं? ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं कि बिहार तो उनकी भविष्य की योजनाओं के लिए प्रयोग का स्थान है. भाजपा के साथ संबंधों के बावजूद उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि कायम है, जिस कारण राजग उनकी छवि का इस्तेमाल अगले लोकसभा चुनावों में और अधिक दलों को आकर्षित करने के लिए कर सकता है.

लेकिन यह असामान्य जल्दबाजी क्यों? 60 वर्ष की उम्र में नीतीश जानते हैं कि उनके आगे बढ़ने के लिए यही सही समय है. इसके अलावा, उनकी उच्च रेटिंग के कारण ही कई लोग मानते हैं कि 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के पुनर्जीवित होने के प्रयासों की राह में सबसे बड़ी चुनौती भी वे ही हैं.

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