लोकसभा से आज ‘नेशनल मेडिकल कमीशन विधेयक-2019’ यानी (एनएमसी बिल-2019) को मंजूरी मिल गई है. दरअसल यह विधेयक 63 साल पुराने मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI) की जगह लेगा. इस विधेयक के कुछ प्रावधानों को लेकर डॉक्टरों ने विरोध जताया है. खासतौर पर ब्रिज कोर्स के जरिए आयुर्वेद और होम्योपैथ के डॉक्टरों को कम्यूनिटी हेल्थ वर्कर की तरह एलोपैथ की प्रेक्टिस करने का हक देने पर डॉक्टर आग-बबूला हैं. उनका कहना है कि सरकार का यह कदम झोलाछाप डॉक्टरों की फौज तैयार करने वाला है. उधर सुबह से ही प्रदर्शन कर रहे ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (एम्स) के डॉक्टर धरने के लिए निर्माण भवन पहुंच गए हैं. इंडियन मेडिकल एसोसिएशन पहले ही विरोध जता चुकी है.
…तो ‘नीम-हकीम’ भी करेंगे इलाज!
विरोध करने वाले डॉक्टरों के अनुसार एनएमसी विधेयक-2019 की धारा 32 नीम-हकीम बनाने का रास्ता है. दरअसल विधेयक के मुताबिक आयुर्वेद या होम्योपैथी, आयुष मंत्रालय के तहत आने वाली किसी भी पद्धति के डॉक्टर एक ट्रेनिंग लेने के बाद कम्यूनिटी हेल्थ वर्कर की तरह प्रेक्टिस कर सकेंगे. दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन (डीएमए) के अध्यक्ष डॉक्टर गिरीश त्यागी के मुताबिक भी यह ‘झोलाछाप डॉक्टरों’ को बढ़ावा देने का जरिया बनेगा. डीएमए के मुताबिक इस विधेयक में दूसरी धाराओं के चिकित्सकों के एलोपैथ में प्रेक्टिस करने का प्रावधान तो है लेकिन उस पर लगाम लगाने का प्रावधान नहीं है. जैसे अगर किसी आयुर्वेदिक चिकित्सक को कुछ खास तरह की एलोपैथ दवाइयां प्रिस्क्राइब करने का अधिकार इस विधेयक के जरिए मिलता है तो क्या गारंटी है कि वह अन्य दवाइयां नहीं प्रिस्क्राइब करेगा? दिल्ली के एम्स अस्पताल के सीनियर रेसिडेंट डॉक्टर विजय कुमार भी आयुर्वेद और होम्यौपैथी के डॉक्टरों को ब्रिज कोर्स करवाकर एलोपैथी की इजाजत देने पर पहले ही एतराज जता चुके हैं. उनका सवाल है कि जिन लोगों ने 4 साल लगाकर अपनी होम्योपैथी और आयुर्वेद की पढ़ाई की है, उन्हें बिर्ज कोर्स के जरिए एलोपैथ सिखाने की जगह उन्हें उसी विषय में रिसर्च करवानी चाहिए. उनके मुताबिक कुछ महीने या एक साल का कोर्स करने के बाद प्रेक्टिस करने वाले डॉक्टरों की वजह से मेडिकल नेगलिजेंस की घटनाएं भी बढ़ने की संभावना है." सवाल यह उठता है कि ब्रिज कोर्स करने वाले डॉक्टर बिना किसी परीक्षा को पास किए कैसे एलोपैथ की प्रेक्टिस शुरू कर सकते हैं?
...तो बढ़ेगी नौकरशाही!
दूसरा सबसे बड़ा एतराज यह है कि इसकी नियामक बॉडी में नामिनेटेड सदस्यों की संख्या के मुकाबले चुने हुए सदस्यों की संख्या बहुत कम है. इसे बढ़ाया जाना चाहिए. क्योंकि नॉमिनेटेड सदस्य नौकरशाही को बढ़ावा देंगे.
…तो बाकी की सीटों पर ‘योग्यता’ हो जाएगी दरकिनार!
इस विधेयक के मुताबिक मेडिकल कॉलेज के 50 फीसदी सीटों की फीस पर सरकार लगाम लगाएगी लेकिन उसके बाद की 50 फीसदी सीटों पर क्या फीस वसूली जाए इस पर सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा. पर सवाल उठता है कि बची हुई 50 फीसदी पर मेडिकल कॉलेज और भी मनमानी फीस वसूलेंगे, वह सरकार के दखल वाली सीटों की फीस भी इन बाकी की सीटों के जरिए वसूलने की कोशिश करेंगे. ऐसे में कॉलेज में दाखिला लेने के लिए ‘योग्यता’ से ज्यादा ‘पैसा’ मानक बन जाएगा.
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