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...और शुरू हो गया बैलेंस शीट वाले बजटों का दौर

बजट में उपभोक्ता गुणांक सिफर रहने वाला है और चुनावी राजनीति नीतिगत मुद्दों पर प्रभावी साबित होगी.

अरुण जेटली पेश करेंगे आम बजट
अरुण जेटली पेश करेंगे आम बजट

नरेंद्र मोदी सरकार के आखिरी पूर्ण बजट को लेकर रोमांचित होने जैसा कुछ भी नहीं है. असल में, 2018 का बजट, हमें देश में ऐसे बजटों के युग में ले जाएगा, जिसमें बजट को लेकर कोई उत्साह नहीं होगा. हो सकता है मेरी यह बात थोड़ी विचित्र लग रही हो क्योंकि 1 फरवरी को आने वाले बजट को लेकर कयासों का दौर चल पड़ा है.

तथ्य यह है कि बजट में उपभोक्ता गुणांक सिफर रहने वाला है और चुनावी राजनीति नीतिगत मुद्दों पर प्रभावी साबित होगी, ऐसे में 1 फरवरी को देखने वाली बात सिर्फ अरूण जेटली का राजकोषीय अंकगणित ही होगा. आइए, इससे पहले कि हम बजट के दिन फुग्गों पर इतराने लगें, कुछ तथ्यों पर निगाह डाल लेते हैं.

उपभोक्ताओं के लिए सिफर

अभी तक लोग बजट का इंतजार करते थे क्योंकि बाकी चीजों के साथ ही एक्साइज और सेवाकर में बदलाव लाए जाते थे. दिलचस्प है कि अप्रत्यक्ष करों में सालाना सुधारों की पुरानी परंपरा के उलट, अब, जीएसटी काउंसिल हर महीने एक मिनी बजट लेकर आ रही है.

जीएसटी के बाद, बजट में कस्टम ड्यूटी और आय़कर में बदलाव के बेहद सीमित संभावनाएं ही बची रह गई हैं. बहरहाल, सरकार के लिए राजस्व उगाही के स्रोत सूखते जा रहे हैं, ऐसे में आयकरदाताओं के लिए बजट में कोई बड़ी छूट मिलने की संभावना भी धूमिल ही दिख रही है.

चूंकि, जीएसटी ने राज्यों से कर लगाने का अधिकार ले लिया है, इसलिए राज्यों के बजट भी बैलेंस शीट दाखिल करने की कसरत के सिवा कुछ और नहीं रहेंगे. बहरहाल, विश्लेषकों और सार्वजनिक वित्त के उत्साहियों के लिए, जीएसटी के बाद राजस्व हासिल करने का ढांचा और राज्यों के साथ इसका बंटवारा अगले बजटों की नई सामग्री होगी.

सरकार का खजाना

हर बजट में, जब वित्त मंत्री बड़े आवंटनों की घोषणा करते थे तो उनके सुर तेज हो जाते थे, और बाकी के सदस्य मेज थपथपाकर इसका स्वागत करते थे. लेकिन इस साल सरकार के पास ऐसी घोषणाओं के लिए कुछ खास नही हैं.

सरकार जीएसटी के राजस्व में आई कमी और जीएसटी की वजह से राज्यों को दिए जाने वाले मुआवजे की वजह से थोड़ी मितव्ययी होने की कोशिश में है. सरकार को असल में अपने खर्चों में कटौती करने के लिए बाध्य होना पड़ा है, जिसमें बेहद जरूरी पूंजी में कटौती भी शामिल है.

राजकोषीय घाटे में कमी लाने के लिए अगस्त-सितंबर 2017 में यह कटौती देखने को मिली थी. बजट तैयार करने की प्रक्रिया के दौरान आ रही रिपोर्ट्स बता रही हैं कि 2018-19 में रेलवे को दिए जाने वाले आवंटन में 27 फीसदी की कमी की जा सकती है.

निजी निवेश और उपभोग में आई कमी से जूझ रही अर्थव्यवस्था के लिए सरकारी खर्चे आखिरी उम्मीद की तरह थे और इनमें आई कमी बुरी खबर है.वित्तीय प्रबंधन की बात करें तो राज्य सरकारों के बजट पर भी इसके दुष्प्रभाव दिखेंगे. घाटे से उबरने के लिए राज्यों ने पहले ही पूंजीगत खर्चों की रफ्तार घटा दी है. 2018-19 के वित्त वर्ष में 17 राज्यों ने अपनी पूंजीगत खर्चों में 10-25 फीसदी तक की कमी की है.

बिग नंबर

इस बजट में उपभोक्ताओं के लिए कुछ भी नहीं है. ऐसे में बजटीय घाटा ही सबसे दिलचस्प आंकड़ा साबित होगा. जेटली ने अब तक इस मोर्चे को कामयाबी से थामे रखा है. फिर भी, अपने आखिरी बजट में राजकोषीय गिरावट अपर्याप्त जीएसटी राजस्व उगाही, भारतीय रिज़र्व बैंक से मिले अपर्याप्त लाभांश और उम्मीद से कम रहे जीडीपी विकास दर की वजह से जोर-शोर से दिखेंगे.

पिछले साल के बजट के साथ जारी किए गए अर्धवार्षिक वित्तीय नीति में सरकार ने कहा कि वित्त वर्ष 2018 के लिए वित्तीय घाटे को जीडीपी के 3.2 फीसदी और वित्त वर्ष 2019 के लिए 3 फीसद तक लाने का लक्ष्य है. लेकिन विनिवेश के लक्ष्य (725 अरब रु. के लक्ष्य की तुलना में अब तक 543 अरब रु.) के हैरतनाक प्रदर्शन के बाद भी सरकार को वित्त वर्ष 2018 में 10 से 30 बीपीएस तक वित्तीय घाटा उठाना पड़ सकता है.

घाटे में इस खतरनाक बढ़ोतरी को थामने के लिए सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को अतिरिक्त लाभांश देने के लिए राजी करने की कोशिश में है. सरकार वित्त वर्ष 2018 और 2019 के लिए अपने विनिवेश लक्ष्यों को और बढ़ा सकती है. ऐसे में, मौजूदा वर्ष के लक्ष्य-725 अरब- को पाया जा सकेगा बल्कि इसी स्रोत से अगले साल के लक्ष्य भी पूरने की कोशिश की जाएगी.

वित्त वर्ष 2019 के संदर्भ में, सरकार का लक्ष्य 3.2 फीसदी वित्तीय घाटे का रहने वाला है, जबकि पहले यह 3 फीसद रहने वाला था. आखिर चुनावी वर्ष में इसके खर्चे बढ़ेंगे.

इस बजट से लोगों को उम्मीद थी कि मोदी सरकार 2019 के लिए चुनावी अभियान में जुटने से पहले जोरदार घोषणाएं करेगी. बहरहाल, 2018 का बजट नए युग के बजटों का हरावल बजट होगा--ये बजट ऐसे होंगे जो लोगों की बजाय अर्थशास्त्रियों के लिए महत्वपूर्ण होंगे.

(अंशुमान तिवारी इंडिया टुडे हिंदी के संपादक हैं.)

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