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निकाय चुनाव: मुंह की खाने वालों को एक मौका और

विधानसभा चुनावों में हार के बाद निकाय चुनावों को भाजपा और कांग्रेस दूसरे राजनैतिक अवसर के रूप में देख रही हैं.

यूपी निकाय चुनाव
यूपी निकाय चुनाव
अपडेटेड 5 जून , 2012

यह कुछ वैसा ही है जैसे परीक्षा में फेल किसी छात्र को एक और मौका मिल जाए. उत्तर प्रदेश के स्थानीय निकाय चुनावों में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस कुछ इसी मनोदशा के साथ मैदान में उतर रही हैं. बीते विधानसभा चुनाव में क्रमशः तीसरे और चौथे नंबर से संतोष करने वाली भाजपा और कांग्रेस ने इन चुनावों में पूरे दमखम के साथ उतरने की तैयारी की है.

चूंकि प्रदेश की दो मुख्य पार्टियां सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी (सपा) और मुख्य विपक्षी दल बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सीधे तौर पर चुनाव मैदान में नहीं हैं, ऐसे में यह चुनाव मुख्य रूप से भाजपा, कांग्रेस और कुछ छोटी पार्टियों के बीच सिमटता दिख रहा है.

एक साल से लटक रहे स्थानीय निकाय चुनाव की अधिसूचना जारी होते ही भाजपा और कांग्रेस के कार्यालयों में मजमा जुटने लगा. 24 जून से 7 जुलाई तक चार चरणों में प्रदेश के 12 नगर निगम, 184 नगरपालिका परिषदों और 404 नगर पंचायतों में होने वाले चुनावों के लिए इन दोनों पार्टियों में ही सबसे ज्यादा सक्रियता दिखाई दे रही है. हालांकि इनमें सबसे ज्यादा दांव भाजपा का ही लगा है. 20 करोड़ की आबादी वाले उत्तर प्रदेश की 22 फीसदी जनता शहरी इलाकों में रहती है, जहां बीते निकाय चुनाव तक भाजपा का दबदबा रहा है.

2006 के निकाय चुनावों में भाजपा ने 12 नगर निगमों में से आठ पर अपना परचम लहराया था. भाजपा से उम्मीदें हैं, लेकिन उसकी समस्या अब भी वही है, जो विधानसभा चुनाव के समय थी. पार्टी के वरिष्ठ नेता बताते हैं कि एक बार फिर हारे हुए विधायक अपने समर्थकों को टिकट दिलवाने की होड़ में लग गए हैं.

लखनऊ में यह होड़ सबसे ज्यादा है. पिछले 20 वर्ष के दौरान पहली बार लखनऊ के शहरी इलाकों में भाजपा ने खराब प्रदर्शन किया. इस बार इन इलाकों से भाजपा के पास केवल एक ही विधायक है, जबकि पहले यह संख्या चार या इससे अधिक होती थी. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी बताते हैं कि पार्षद, अध्यक्ष और मेयर के लिए जिला और महानगर कमेटी से ही तीन नाम मंगाए जाएंगे. इनमें से किसी एक का चयन प्रदेश मुख्यालय में होगा. वाजपेयी कहते हैं, ''कोई नाम प्रदेश स्तर से जोड़ा नहीं जाएगा.''

दूसरी ओर कांग्रेस के सामने भी चुनौतियां कम नहीं हैं. विधानसभा चुनाव में दूसरी पार्टियों से आए उम्मीदवारों को खासी तवज्‍जो दी गई थी और इसे ही हार का कारण भी माना गया. लेकिन इस चुनाव में कांग्रेस फिर इसी गलती को दोहराने के मूड में है. विधानसभा चुनाव में हार के बाद संगठनात्मक स्तर पर कोई परिवर्तन नहीं किया गया है.

प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी पहले ही केंद्रीय नेतृत्व को इस्तीफे की पेशकश कर चुकी हैं. पार्टी के एक बड़े नेता बताते हैं कि निकाय चुनावों में पार्टी किसी भी उम्मीदवार को आर्थिक मदद नहीं देगी.

ऐसे में पार्टी के सामने खासकर मेयर पद के लिए सबसे बड़ा संकट ऐसे उम्मीदवारों का है, जो जिताऊ हों और चुनाव का खर्च स्वयं वहन करें. कांग्रेस ने उम्मीदवारों के चयन का अधिकार जिला शहर कांग्रेस कमेटियों को सौंप दिया है. पार्टी किस आधार पर बेहतर प्रदर्शन की आस लगाए है? इसके जवाब में रीता कहती हैं, ''प्रदेश में सपा सरकार कानून व्यवस्था जैसे मसलों में नाकाम साबित हो चुकी है. इसका फायदा कांग्रेस को ही मिलेगा.'' लेकिन हाल में हुई पेट्रोल की कीमत बढ़ाने से शहरी इलाकों में कांग्रेस के प्रति आक्रोश बढ़ाया है.

स्थानीय निकाय चुनावों में भले ही छोटे दलों की दाल न गली हो, लेकिन इस बार फिर रालोद, अपना दल, पीस पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी जैसे दल ताल ठोंकने को तैयार खड़े हैं. स्थानीय निकाय चुनावों में सभी पार्टियों के शहरी सीटों से जीते विधायकों की भी परीक्षा होगी. शहरी विधायकों की संख्या के हिसाब से सपा अव्वल है. पार्टी के 224 विधायकों में से 45 शहरी क्षेत्रों से चुनकर आए हैं.

विधानसभा सदस्यों की संख्या के हिसाब से बसपा भले ही प्रदेश में दूसरे नंबर की पार्टी हो, लेकिन इसके शहरी विधायकों की संख्या भाजपा से कम है. भाजपा के कुल 47 विधायकों में से 27 शहरी सीटों से चुनकर आए हैं तो 80 विधायकों वाली बसपा के पास केवल 18 विधायक शहरी क्षेत्रों से हैं. कांग्रेस और राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) के पास क्रमशः 9 और 2 शहरी विधायक हैं.

हालांकि बीते विधानसभा चुनाव में सपा ने शहरी सीटों पर काफी अच्छा प्रदर्शन किया था. इसके बावजूद पार्टी लोकसभा चुनावों से पहले कोई चुनाव लड़कर अपनी ऊर्जा नष्ट नहीं होने देना चाहती. लेकिन सपा ने अपने कार्यकर्ताओं को बतौर निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव लड़ने की अनुमति दे दी है, लेकिन कोई भी पार्टी का चिन्ह नहीं इस्तेमाल कर सकेगा. सपा के प्रदेश प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी बताते हैं, ''निकाय चुनाव लड़ने वाले किसी भी सपा कार्यकर्ता को पार्टी को जानकारी देने की जरूरत नहीं है.''

सपा की तरह बसपा भी निकाय चुनावों को परोक्ष रूप से लड़ेगी. 2006 में हुए चुनावों का बसपा ने बहिष्कार किया था और मायावती ने इस बार भी निकाय चुनाव न लड़ने का फैसला किया था. पिछले 10 वर्षों में बसपा ने शहरी इलाकों में भी अपना आधार बनाया है. ऐसे में मायावती के फैसले से शहरी इलाकों में बसपा कार्यकर्ताओं को खासी निराशा हुई थी. इसलिए इस बार लोकसभा चुनाव के मद्देनजर संगठन को बनाए रखने की गरज से आखिरकार मायावती को अपना फैसला बदलना पड़ा.

बसपा कार्यकर्ता भी अब निकाय चुनाव तो लड़ेंगे, लेकिन पार्टी इन्हें अपना चुनाव चिन्ह नहीं देगी और न ही ये मायावती या कांशीराम के चित्र का प्रयोग कर सकेंगे.

भाजपा के वरिष्ठ नेता विजय बहादुर पाठक कहते हैं कि सपा और बसपा का शहरी इलाकों में कभी कोई जनाधार नहीं रहा और निकाय चुनाव में फजीहत से बचने के लिए ये दोनों पार्टियां परोक्ष रूप से ही इसे लड़ रही हैं.

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