देश की आर्थिक राजधानी कही जाने वाली मुंबई और यूपी में आर्थिक गतिविधियों के एक बड़े केंद्र कानपुर में कोरोना वायरस का व्यवहार भी कमोवेश एक जैसा दिखाई पड़ रहा है. जिस तरह मुंबई में कोरोना वायरस ने बेहद घातक रूप धारण कर रखा है वैसी की मारक क्षमता कानपुर में भी दिखाई दे रही है. इसके डॉक्टरों और विशेषज्ञों को भी हैरत में डाल दिया है. पहले से ही सांस, गुर्दे की बीमारी या हाइपरटेंशन पीड़ितों को यह वायरस 24 घंटे में इतना गंभीर कर देता है कि आइसीयू में भर्ती करने की जरूरत पड़ जाती है.
कानपुर के गणेश शंकर विद्यार्थी मेमोरियल (जीएसवीएम) मेडिकल कॉलेज के कोविड आइसीयू में भर्ती 10 ऐसे संक्रमितों की पिछले दिनों मौत हो गई, जिन्हें दो दिन भी इलाज का मौका नहीं मिला. मरने वालों की उम्र भी अधिक नहीं थी. अब 30-40 घंटे के अंदर संक्रमितों की मौत की संख्या बढ़ रही है. इससे मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों के साथ स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी भी परेशान हैं.
डॉक्टरों का कहना है कि कोमार्विडिटी से मरीजों की इस तरह मौत मुंबई में अधिक हो रही है. इसलिए आशंका यह जताई जा रही है कि मुंबई से आए संक्रमितों से दूसरों को हुआ संक्रमण कहीं अधिक गंभीर तो नहीं है. इसका पता लगाने के लिए कांटैक्ट ट्रेसिंग की जा रही है.
आइसोलेशन सेंटरों में लेवल-1 और लेवल-2 के मरीजों की सघन स्क्रीनिंग हो रही है. किसी मरीज को थोड़ी भी परेशानी दिख रही है तो उसके इलाज का मैनजमेंट बदला जा रहा है. कानपुर के सीएमओ डॉ. अशोक शुक्ला के मुताबिक, लेवल-3 यानी अति गंभीर मरीजों की जान बचाना सबसे बड़ी चुनौती है. कानपुर के एक स्वयंसेवी अमित मिश्र बताते हैं कि शहर में मुंबई से आए लोगों की सही तरीके से स्क्रीनिंग नहीं हो पाई. यही वजह है कि बीमारी ने कानपुर में वही रूप ले रखा है जैसा कि मुंबई में है. इसके अलावा कानपुर में बड़ी संख्या में उद्योग धंधे शुरू हो जाने के कारण भी मजदूरों का आवागमन तेज हुआ है. इससे भी बीमारी बढ़ी है. वहीं दूसरी ओर कोरोना संक्रमित गंभीर रोगियों के शरीर में खून के थक्के बन रहे हैं. यह नया लक्षण सामने आ रहा है. डॉक्टरों ने इसे माइक्रोथ्रम्बोसिस कहा है.
कानपुर मेडिकल कॉलेज के कोविड आइसीयू इंचार्ज डॉ. आनंद कुमार का कहना है कि माइक्रोथ्रमबोसिस में यह पता नहीं चल पाता है कि खून के थक्के कहां कहां बने होंगे. डॉ. आनंद कुमार के मुताबिक, आईसीयू में वेंटीलेटर से जब मरीजों को सपोर्ट नहीं मिलता है तो एकमात्र हथहयार स्टेरॉयड है, जिसे तीन से पांच दिन तक चलाने की संस्तुति है. कई मरीजों को स्टेरायड देकर वेंटीलेटर से बाहर किया गया है, मगर कुछ घंटे बाद हालत दोबारा उसी तरह हो गई. फिर भी स्टेरायड से इलाज में कुछ मौका मिल जाता है. स्वास्थ्य विभाग ने भी कानपुर में कोरोना संक्रमित सभी मरीजों के लक्षणों का अध्ययन करने के लिए इनकी विस्तृत रिपोर्ट मेडिकल कॉलेज से मांगी है. इससे यह पता लगाया जाएगा कि कोरोना वायरस के बदलते रूप के अनुसार इलाज की तैयारी कैसी होनी चाहिए.
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