scorecardresearch

आंदोलन की जड़ में ऊपरी कमाई

लखीमपुर खीरी में यदि प्रमाणपत्र बनवाने में मिलने वाला ऊपरी पैसा विवाद की वजह, तो बुंदेलखंड में ओवरलोडिंग और गुंडा टैक्स पर रार.

अपडेटेड 10 सितंबर , 2011

भ्रष्टाचार के खिलाफ अण्णा हजारे के आंदोलन को भले ही पूरे देश में जबरदस्त समर्थन मिला हो, लेकिन देश की दूसरी हकीकत यह है कि एक बड़ा तबका न सिर्फ रिश्वत को जायज मानता है, बल्कि इस पर कब्जा करने के लिए आंदोलन और खूनी संघर्ष तक के लिए तैयार है.

हाल ही में उत्तर प्रदेश में दो ऐसी बड़ी घटनाएं सामने आईं, जिनमें रिश्वत या कालेधन पर कब्जा जमाने के लिए अलग-अलग गुटों में लामबंदी हुई, आंदोलन हुए और नौबत खूनी संघर्ष तक जा पहुंची.

लखीमपुर खीरी में लेखपाल और वकीलों के बीच हुए खूनी संघर्ष की जड़ में खास बात यही थी कि जाति प्रमाणपत्र या इस तरह के दस्तावेज बनवाने में होने वाली ऊपरी कमाई पर पहला हक किसका है. इस मुद्दे को लेकर वकील और लेखपालों ने ऐसी लामबंदी दिखाई दी कि नौबत दो वकीलों की हत्या तक पहुंच गई और प्रदेश भर में वकील हड़ताल पर चले गए.

ऐसी ही दूसरी घटना बुंदेलखंड इलाके में अवैध खनन को लेकर हुई. यहां ग्रेनाइट और अन्य तरह के खनन से जुड़े ठेकेदारों ने अगस्त के अंत में सीधी मांग उठार्ई कि या तो उन्हें गुंडा टैक्स से मुक्ति मिले या फिर ओवरलोडिंग की खुली छूट दी जाए. इस मामले ने इतना तूल पकड़ा कि झांसी, ललितपुर, महोबा और बांदा जिलों में 300 क्रेशर मालिक हड़ताल पर चले गए.

लखीमपुर खीरी का वाकया कुछ यूं थाः 29 अगस्त को मुहम्मदी तहसील कार्यालय में अधिवक्ता श्यामबाबू का मुंशी सुशील जाति प्रमाणपत्र बनवाने के लिए लेखपाल आदिअंतर अवस्थी के पास गया था.

श्यामबाबू का आरोप है कि प्रमाणपत्र बनवाने के एवज में लेखपाल ने पैसे की मांग की. वहीं, अवस्थी का आरोप है कि उन्होंने जांच करने के बाद ही प्रमाणपत्र जारी करने की बात कही थी, जबकि वकील तुरंत प्रमाणपत्र बनवाने का दबाव डाल रहे थे. इसी वजह से विवाद बढ़ गया और दोनों पक्षों में जमकर मारपीट हुई.

आरोप है कि वकीलों ने तहसीलदार के कमरे में ही लेखपाल की जमकर पिटाई कर दी. दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के खिलाफ मुकदमे भी दर्ज करा दिए. इसके बाद स्थानीय स्तर पर अविक्ता संघ और लेखपाल संघ में तलवारें खिंच गईं. लेखपाल संघ ने मारपीट के आरोपी वकीलों की गिरफ्तारी की मांग को लेकर हड़ताल की घोषणा कर दी, तो अधिवक्ताओं ने भी न्यायिक काम न करने का निर्णय लिया. दोनों पक्ष एक-दूसरे पर कार्रवाई की मांग को लेकर अड़ गए. 

2 सितंबर तक यह क्रम चलता रहा. 3 सितंबर की दोपहर लेखपाल तहसील स्थित अपने संघ में बैठक कर रहे थे कि उधर से गुजर रहे वकीलों से उनकी झ्ड़प हो गई. विवाद बढ़ने पर लेखपालों ने रायफल से वकीलों पर फायरिंग कर दी.

इस घटना में अधिवक्ता प्रदीप दीक्षित और मुकुल तिवारी की मौके पर मौत हो गई तथा अधिवक्ता रहीस अहमद, आनंद गुप्ता, राजेश सिंह और जितेंद्र वर्मा घायल हो गए. गर्दन में गोली लगने के कारण रहीस अहमद की हालत गंभीर थी. उन्हें लखनऊ के ट्रॉमा सेंटर भेज दिया गया. इस घटना ने पूरे प्रदेश में भूचाल ला दिया. प्रदेश भर के वकीलों और राजस्व कर्मचारियों में तलवारें खिंच गईं. सभी तहसीलों में कामकाज बंद कर दिया गया. उत्तर प्रदेश लेखपाल संघ और उत्तर प्रदेश बार एसोसिएशन ने हड़ताल की घोषणा कर दी.

लेकिन इस घटना की असली वजह पर गौर करें तो पता चलता है कि सारा काम ईमानदारी से हो रहा होता तो वकील और लेखपाल में झ्गड़े का सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि जाति प्रमाणपत्र जारी करने के लिए कोई सरकारी फीस नहीं लगती है. लेकिन मुफ्त में बनने वाले इसी प्रमाणपत्र को जारी कराने के एवज में 50 से 200 रु. तक देने पड़ते हैं. अगर कोई व्यक्ति वकील के माध्यम से इसे बनवाता है तो यही पैसा वकील की फीस के रूप में देना पड़ता है, जबकि कोई व्यक्ति सीधे सरकारी महकमे से काम कराता है तो पैसा भीतर देना पड़ता है.

तहसील में रोजाना 200 के करीब जाति प्रमाणपत्र बनते हैं और किसी सरकारी भर्ती प्रक्रिया के पहले यह आंकड़ा 1,000 तक  पहुंच जाता है. ऐसे में वकील और लेखपाल दोनों वर्ग चाहते हैं कि प्रमाणपत्र सीधे उनके माध्यम से बनें और अपने इसी 'हक' के लिए वे किसी भी अंजाम तक जाने को तैयार हो जाते हैं. तहसील में जाति प्रमाणपत्र के अलावा आय प्रमाणपत्र और निवास प्रमाणपत्र के लिए भी इसी तरह का खेल चलता है.

जहां तक इस घटना का सवाल है तो हालात ऐसा हिंसक मोड़ नहीं लेते अगर प्रशासन परिसर में तैनात पीएसी को घटना वाले दिन यानी 3 सितंबर की सुबह हटा नहीं लेता. हालांकि जिलाधिकारी हृषिकेश भास्कर इस तर्क को सही नहीं मानते. लेकिन अधिकारियों के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं है कि आखिर किसके आदेश से तहसील परिसर से फोर्स को हटाया गया? यही नहीं, मुहम्मदी के कोतवाल योगेंद्र सिंह पर एक माह पहले भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे थे.

लेकिन उन पर लाइनहाजिरी की कार्रवाई तब जाकर हुई जब दो वकीलों की जान चली गई. लखीमपुर में तैनात एक तहसीलदार बताते हैं कि शाहजहांपुर सीमा से लगी तहसील मुहम्मदी में शुरू से ही वकीलों का दबदबा रहा है. वकीलों ने यहां पर कई बार अधिकारियों व तहसील कर्मियों से मारपीट और अभद्रता की है.

मामले में अब तक एसडीएम हरीराम और तहसीलदार आर.सी. शर्मा सहित 35 लोगों के खिलाफ नामजद रिपोर्ट दर्ज की गई. इनमें एसडीएम, तहसीलदार और लेखपाल अवस्थी के फरार मित्र मजीउल्ला को छोड़ शेष सभी 32 लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया. घटना के बाद लखनऊ समेत प्रदेश के सभी जिलों में वकीलों ने प्रदर्शन किया तो लेखपालों के समर्थन में संग्रह अमीन समेत अन्य राजस्व कर्मचारी भी कूद पड़े. कलेक्ट्रेट के अलावा सभी तहसील कार्यालयों में ताले लटके रहे.

उत्तर प्रदेश बार काउंसिल के सदस्य अजय कुमार शुक्ल ने बताया कि कोई भी वकील किसी भी लेखपाल का मुकदमा नहीं लड़ेगा. उन्होंने मृत अधिवक्ताओं के परिजनों को 50-50 लाख रु. मुआवजा देने की मांग भी की.
 

कैसे भड़का गुस्सा
मुहम्मदी तहसील में जाति प्रमाणपत्र बनवाने को लेकर 29 अगस्त को वकील और लेखपाल में तीखी झ्ड़प हुई.
विवाद गहराने के बावजूद 3 सितंबर की सुबह तहसील से पीएसी हटा ली गई और उसी दिन बाद में दो वकीलों की हत्या हुई.
हत्याकांड में 35 लोग नामजद हैं, इनमें से 32 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है. वकीलों ने इनका केस लड़ने से मना कर दिया है.
बुंदेलखंड इलाके के क्रेशर मालिक ओवर लोडिंग पर सख्ती और गुंडा टैक्स से खफा.
मांगें न माने जाने तक इलाके के 300 से अधिक क्रेशरों में काम ठप.

उधर, बुंदेलखंड इलाके में स्टोन क्रेशर मालिकों और प्रशासन के बीच विवाद के चलते हफ्ते भर से इलाके के 300 से अधिक क्रेशर बंद पड़े हैं. यहां अगस्त के मध्य से विवाद शुरू हुआ, जब प्रशासन ने ट्रकों की ओवरलोडिंग पर सख्ती बढ़ा दी. इससे गुस्साए क्रेशर मालिकों ने शुरू में प्रशासन से मांग की कि या तो ओवरलोडिंग की इजाजत दी जाए या फिर उन पर लगने वाला गुंडा टैक्स बंद हो. मामला न सुलझ्ने पर झांसी, ललितपुर, महोबा, बांदा और चित्रकूट धाम जिलों की एसोसिएशन सहित इलाके की 7 एसोसिएशनें हड़ताल पर चली गईं और अण्णा टोपी पहनकर सड़कों पर उतर आईं. अगर दोनों पक्षों की ओर से लगाए जा रहे आरोप-प्रत्यारोप और आंदोलन के समय पर नजर डालें तो दोनों पक्ष कहीं-न-कहीं भ्रष्टाचार में लिप्त हैं. क्रेशर मालिक एसोसिएशन के पवन सरावगी का कहना है कि विक्रय प्रपत्र एमएम 11 की 50 रसीदों वाली एक प्रति जारी करने के एवज में उनसे 50,000 रु. गुंडा टैक्स के नाम पर वसूले जा रहे हैं, जो सरासर अन्याय है. क्रेशर मालिकों का दावा है कि खनन विभाग के दफ्तर में ही कुछ गुंडे सरेआम पैसा वसूलते हैं और उनके सिर पर बड़े लोगों का हाथ है. वैसे, झंसी के एडीएम उदयभान त्रिपाठी का कहना है, ''कोई गुंडा टैक्स नहीं वसूला जा रहा और एमएम 11 पत्रक आसानी से उपलब्ध करा दिए गए हैं.'' लेकिन पहले हो चुकी अवैध वसूली पर कार्रवाई के सवाल पर वे कन्नी काट गए.

क्रेशर मालिकों के घेराव से जूझ चुके झांसी के एसडीएम पी.के. श्रीवास्तव का कहना है, ''क्रेशर मालिक एक ही रसीद पर 3-4 ट्रकों को पार कराने की नाजायज मांग पर अड़े हैं. मामले की तह में जाने पर पता चला कि पहले एमएम 11 की 50 रसीदों के लिए खनन विभाग के अधिकारियों को 10,000 रु. रिश्वत देनी पड़ती थी और ओवरलोडिंग भी आराम से होती थी. लेकिन अब गुंडा टैक्स के रूप में 50,000 रु. तक लग रहे हैं.''

क्रेशर मालिक और खनन विभाग में क्या खिचड़ी पक रही है, इसका खुलासा भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की उत्तर प्रदेश राजस्व 2009-10 रिपोर्ट से होता है. रिपोर्ट के मुताबिक, खनिज जिलों में जिला कलेक्टरों को खनन के लिए 449 एनओसी जारी की गईं, लेकिन इन पट्टों से हुए खनन के लिए कोई ट्रांजिट शुल्क नहीं लिया गया.

इससे सरकार को 238.53 करोड़ रु. राजस्व का नुक्सान हुआ. लेकिन इस मिलीभगत के बावजूद एकतरफा गुंडा टैक्स बढ़ने और ओवरलोडिंग पर लगाम कसने से क्रेशर मालिक सड़कों पर उतरे, और जब उन्हें ओवरलोडिंग का रास्ता नहीं मिला तो उन्होंने गुंडा टैक्स के विरोध में आंदोलन छेड़ दिया. पूर्व मंत्री बाबूराम के पुत्र राकेश गुप्ता और पूर्र्व एमएलसी श्यामसुंदर यादव का समर्थन मिलने से क्रेशर मालिकों के आंदोलन को खासा बल मिला है.

लेकिन इन आंदोलनों ने एक बात साफ कर दी है कि मुद्दत से सरकारी धन की लूट-खसोट पर पल रहे समाज के एक तबके को यह लूट अपना मूलभूत अधिकार लगने लगी है. और इस अधिकार की रक्षा के लिए वे जान ले भी सकते हैं और जान दे भी सकते हैं. हालांकि पहली कोशिश यही होती है कि मामला अण्णा टोपी से ही सुलट जाए.
-साथ में संतोष पाठक, झांसी में

Advertisement
Advertisement