अरुण शौरी की नई किताब ड.ज ही नो अ मदर्स हार्ट? हाउ सफरिंग रिफ्यूट्स रिलीजंस आपके सामने विकल्प रखती है. आप स्वांग रच सकते हैं कि इसका वजूद नहीं है, या आप कष्ट भोग सकते हैं. हम किस्मत के आगे कायर होते हैं, खासकर वे खुशनसीब लोग जो सामान्य हालात में लहराते फिरते हैं; हम संवेदनशीलता को उदासीनता की चादर से ढक देते हैं.
शौरी अस्तित्ववाद के एक सवाल से इसी ओढ़ी हुई उदासीनता के सुरक्षा कवच को तार-तार कर देते हैं: अन्याय का ईश्वर कौन है? कौन ऐसे जीन का निर्माण करता है जो गड्डमड्ड होकर एक मासूम की जिंदगी हमेशा के लिए विकृत बना देता है? बड़ी संख्या में लोगों के लिए काल बनने वाले भूकंप या सूनामी से दुनिया को कौन तहस-नहस करता है? मौत जिंदगी का कानून है; अचानक आई मौत, या तिल-तिल मौत, निर्दयता, क्रूरता, अंतहीन दर्द, जिंदगी बर्बाद करने वाली लंबी बीमारी का क्या तुक है?
शौरी अपनी मुसीबत को दरकिनार करते हुए अपनी पत्नी अनीता की व्यथा के नजरिए से कलम चलाते हैं. उनकी खूबसूरती एक छोटा तथ्य हैः यह किताब आंशिक रूप से उनके चरित्र, हिम्मत और सबसे बढ़कर उनके प्यार की दास्तान है और इन सबको दुर्भाग्य ने त्रस्त कर रखा है.
उनका एक स्पास्टिक बेटा अदित है, जो अब 35 साल का हो गया है लेकिन समय से परे जिंदगी जी रहा है. बच्चे और माता-पिता के बीच लगाव की कोई सीमा नहीं होती, उनके बीच लगभग आध्यात्मिक, प्यार होता है; और अगर इसकी कीमत किसी बाहरी व्यक्ति के बूते के बाहर होती है तो अरुण, अनीता और अदित के दिल किस हद तक बुझ चुके होंगे?
अदित के अंग असहाय हैं; लेकिन उसके अरमान हैं, वह जिंदादिल इंसान है. लिहाजा, अगर आप में हिम्मत है तो शौरी के गुस्से का जवाब दीजिएः ''वह (अदित) सबसे प्यार करता है. परिवार के सभी लोग उससे प्यार करते हैं. उसकी नानी, मालती शुक्ला, उसकी जिंदगी हुआ करती थीं. वह हमारी जिंदगी है. और...ईश्वर इस असहाय, मजबूर बच्चे पर मुसीबतों का पहाड़ तोड़ना बंद नहीं करता.'' और फिर अनीता पार्किंसंस का शिकार हो जाती हैं.
हर धर्म को मालूम है कि उसे उन बेजा बातों की कोई वजह बतानी होगी जो इस जिंदगी में सृष्टि के निर्माण के समय से सीखे, जज्ब किए गए तर्क को तार-तार करते रहे हैं. ईसाइयत मानती है कि यह दुनिया अपराध और दंड का नतीजा है. आदम और हौवा ने ईश्वर की नाफरमानी की, जन्नत से निकाले गए और उन्होंने इस स्वेच्छाचारी दुनिया को पाला-पोसा. लेकिन जो अपराध या गुनाह नहीं किया गया उसकी सजा देने के लिए जिम्मेदार कौन है? आदम ने असली मासूमियत से असली गुनाह करने के अपने घातक कदम से हम सबको अभिशप्त कर दिया.
लेकिन क्या ईश्वर ने इंसानी जिंदगी के लिए इस तर्क को खारिज कर दिया है? गुनहगार लोगों को हंसते हुए जिंदगी बसर करने का वरदान क्यों मिल जाता है? आदम की औलाद ने दोजख के डर से गुनाह करने से कब गुरेज किया है? कौन-सा मत दुनिया में एक मासूम के लिए दोजख की बात करता है?
इस्लाम अनंतकाल में इंसाफ का वादा करता है, जब अल्लाह जिंदगी से मौत तक फैली इन नाइंसाफियों को दूर करेगा. केवल नास्तिक ही मौत में यकीन करते हैं; मुसलमान के लिए मौत जिंदगी की निरंतरता में एक ठहराव भर है. मौत के बारे में .कुरान की आयत बहुत सीधी-सी हैः हम अल्लाह के पास से आते हैं, अल्लाह के पास चले जाते हैं. लेकिन क्या कोई उग्र सुधारवादी रूह कयामत के दिन शायद खुद से एक या दो सवाल पूछेगी? मुल्ला ने उसे अल्लाह से डरने के लिए कहा है, सूफी ने उससे दैवीयता को गले लगाने के लिए कहा हैः स्पास्टिक को क्या करना चाहिए?
हिंदू दर्शन थोड़ा और पेचीदा है. यह पीड़ा को चक्रीय मानता है, इसका जवाब शुद्धीकरण में निहित बताता है. यहां तक कि खलनायक की भी आत्मा खलनायकी से मुक्ति का प्रयास करती है. जब कृष्ण सुदर्शन चक्र से धूर्त शिशुपाल का सिर धड़ से अलग करते हैं तो शिशुपाल की आत्मा कृष्ण के पांव गिर पड़ती है-''क्योंकि भगवान के दुश्मन भी पूरी तरह उनके बारे में सोचते हुए मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं.''
इस पहेली का इंसानी जवाब विरोधाभास में उलझा है. शौरी 1934 में बिहार के भूकंप के शिकार लोगों पर महात्मा गांधी के अभ्यारोपण के बारे में बताते हैं. उस भूकंप में 30 फुट चौड़ी दरारें पड़ गईं थीं जिनमें से चार हाथी आराम से समा सकते थे.
गांधी के जीवनी लेखक डी.जी. तेंडुलकर ने बिहार पर महात्मा गांधी के हवाले से लिखा हैः ''मैं पूरी-सभ्य और असभ्य-दुनिया के साथ यह मानता हूं कि आपदाएं...मानवजाति के पापों की सजा देनेके लिए आने आती हैं...मैं अस्पृश्यता को ऐसा गंभीर पाप मानता हूं जिसके लिए दैवीय दंड मिलना चाहिए'' (हरिजन, 2 फरवरी, 1934). लेकिन भूकंप की कोई वर्ण व्यवस्था नहीं होती. उसने दलितों को भी नहीं बख्शा.
शौरी का ईश्वर जुए की मेज का मालिक है, उसे उन लोगों की परवाह नहीं है जिन्हें जुए का चक्र घुमाने के बाद खराब नंबर की वजह से विपत्ति झेलनी पड़ती है.

