झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा के लिए 2012 आसान नहीं. बिरसा मुंडा केंद्रीय कारा में बंद कोड़ा को डराने के लिए इतना ही काफी हैः आयकर विभाग ने उन्हें 3,300 करोड़ रु. की गैर-कानूनी संपत्ति पर 1,200 करोड़ रु. बतौर टैक्स जमा कराने की नोटिस दी है.
झारखंड हाइकोर्ट ने उनकी स्वास्थ्य जांच सेना के डॉक्टरों से करवाई. इससे राजेंद्र आयुर्वेदिक संस्थान (रिम्स) के सुविधासंपन्न कॉटेज में जमे रहने या बेहतर इलाज का हवाला देकर दिल्ली के एम्स जाने की उनकी कोशिशों को झटका पहुंचा है.
बुरी खबर का मातम मनाने के लिए जेल में बंद उनके पूर्व काबीना सहयोगी भानु प्रताप शाही, कमलेश कुमार सिंह और कोड़ा के कारोबारी मित्र विजय जोशी भी शामिल हैं.
इनकी स्वास्थ्य जांच का आदेश भी चीफ जस्टिस आर.के. मेरठिया और डी.एन. उपाध्याय की खंडपीठ ने दे दिया. दुर्गा ओरांव की हस्तक्षेप याचिका पर आदेश देते हुए खंडपीठ ने कहा कि अगर इन अभियुक्तों का स्वास्थ्य सही है तो इन्हें तुरंत रिम्स से जेल भेजा जाए. इस मामले पर 10 जनवरी को अगली सुनवाई होनी है.
कोर्ट ने इनकी मेडिकल रिपोर्ट सौंपने के साथ-साथ रिम्स और जेल प्रशासन को भी नोटिस जारी कर जानना चाहा है कि आखिर ये किस गंभीर और लाइलाज बीमारी से ग्रस्त हैं.
सेना के मेडिकल परीक्षण के तुरंत बाद कमलेश को छोड़ इन तीनों को जेल भेज दिया गया है. जेल वापसी कम हंगामेदार नहीं रही. भानुप्रताप ने कविता वाले पैंफ्लेट वितरित कर गुस्से का इजहार कियाः रोने भी न देंगे, हंसने भी न देंगे, जीने भी न देंगे, मरने भी न देंगे, तुम्हारी नाइंसाफी को बताने भी न देंगे, क्योंकि तुम निर्दलीय हो.
सूत्र बताते हैं कि मेडिकल जांच के दौरान भारी-भरकम शरीर वाले कमलेश को तो राहत मिली. अन्य तीनों के बारे में टीम ने कहा कि ये कोई इतने गंभीर बीमार नहीं हैं जिसके लिए इन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़े.
दुर्गा ओरांव आरोप लगाते हैं, ''ये प्रभावशाली लोग रिम्स में इलाज के बहाने अपने खिलाफ कव्स को मैनेज करने की कोशिश करते हैं. सबको पता है कि रिम्स में इलाज करा रहे जोशी विचाराधीन कैदी होते हुए भी बाहर घूमने जाते थे.''
सिगरेट के शौकीन विजय जोशी को दमे के तथाकथित दौरे के बाद 29 नवंबर को रिम्स के आइसीयू में भर्ती कराया गया था. सितंबर माह में जेल में हाथापाई की एक घटना में अपने दाएं हाथ की कोहनी तुड़वा बैठे कोड़ा को सर्जरी के लिए रिम्स लाया गया था.
वहां उन्हें डॉक्टर एल.के. मांझी की देख-रेख में रखा गया. मजेदार यह कि मांझी जैसे अनुभवी डॉक्टर की देख रेख के बावजूद उन्होंने एम्स के डॉ. कृष्ण कांत मिश्र से अपना ऑपरेशन कराने की जिद की.
रिम्स के निदेशक डॉ. तुलसी महतो इस विवाद पर कुछ भी कहने से कन्नी काट जाते हैं. रिम्स के एक वरिष्ठ डॉक्टर इन वीआइपी रोगियों को चलती-फिरती मुसीबत करार देते हैं.
वे कहते हैं, ''रिम्स के मेडिकल बोर्ड ने कई बार जेल प्रशासन को लिखा है कि कोड़ा और शाही को बेहतर इलाज के लिए एम्स भेजा जाए. जेल प्रशासन बहाने बनाता रहता है. इन्हें हमारे सिर पर रख छोड़ा है.''
कोड़ा और शाही अक्सर गले में सरवाइकल कॉलर लगाते हैं. शाही की रीढ़ की हड्डी में सी5 और सी6 नस के दबने की तकलीफ है. रिम्स के अधीक्षक एस.के. चौधरी कहते हैं, ''शाही का ऑपरेशन से इलाज हो सकता है. उन्हें एम्स भेजने की अनुशंसा की गई है.''
शाही पिछले साल 24 सितंबर को भर्ती हुए थे. सूत्रों के अनुसार, कोड़ा ने तो बतौर रोगी जेल प्रशासन से एम्स भेजे जाने की अनुमति तक हासिल कर ली है.
ओरांव के वकील राजीव कुमार बताते हैं, ''लगता नहीं है कि ये इतने बीमार हैं वरना जेल प्रशासन इन्हें वापस जेल क्यों बुलाता. यह सब रिम्स और जेल प्रशासन की मिलीभगत से हो रहा है. इनकी बीमारी का झूठा दस्तावेज बनाया गया.''
दूसरी ओर, जेल प्रशासन अपना पल्ला झड़ता दिख रहा है. यहां 14 डॉक्टरों के स्वीकृत पदों के उलट सिर्फ तीन डॉक्टर हैं. जेल आइजी विजय कुमार सिंह तर्क देते हैं, ''कोई कैदी स्वास्थ्य संबंधी गंभीर शिकायत करता है तो हम रिम्स या फिर कहीं और भेजते हैं. कौन कितना बीमार है, यह बताना डॉक्टर का काम है.''
लगता है, बीमारी का बहाना बनाकर इन सुविधाभोगी वीआइपी कैदियों की शामत आ गई है.

