कक्षा 11 की राजनीति विज्ञान की किताब में मौजूद शंकर के कार्टून पर हुए विवाद का एक नतीजा यह हो सकता है कि तमाम किताबों को और उस समूची प्रक्रिया को ही वापस ले लिया जाए जिसके तहत पिछले कुछ बरसों में एनसीईआरटी जैसी स्वायत्त संस्था ने कुछ बेहतरीन स्कूली पाठ्य-पुस्तकें तैयार की थीं. यह कदम विनाशकारी होगा.
संसद में इस मसले पर जिस कदर होड़ मची, जिसमें कांग्रेस समेत निर्विवाद रूप से सभी पार्टियों के सांसद यूपीए सरकार पर बरस पड़े, यह सोचना असंभव है कि मानव संसाधन मंत्री माफी मांगने और तमाम किताबों को वापस लेकर जांच के आदेश देने के अलावा भी कोई और कदम तत्काल उठा सकते थे. उन्होंने वही किया. एक दिन बाद सुहास पलशिकर के दफ्तर पर हमले ने निश्चित तौर पर सरकार के इस कदम को और मजबूती दी होगी. भारत की राजनीति में दलित वोट बैंक इतनी ताकत रखता है कि कोई भी राजनैतिक पार्टी या सरकार उसे नाराज करके वापस सत्ता में आने का ख्वाब नहीं देख सकती; और इस मामले में तो वे आक्रोशित थे. सांसदों की प्रतिक्रिया अपेक्षित ही रही.
दलितों पर ऐतिहासिक अन्याय और दलित चेतना पर उसके प्रभावों के प्रति हमें हमेशा संवेदनशील रहना चाहिए, लेकिन आश्चर्यजनक यह रहा कि कुछ प्रख्यात दलित बुद्धिजीवी तक दावा करते नजर आए कि आंबेडकर दलितों के मसीहा थे, लिहाजा उनकी मानहानि या अपमान की कोई भी संदिग्ध हरकत तक बर्दाश्त नहीं की जाएगी और उसकी सजा मिलेगी. आंबेडकर को इस तरह देवत्व का दर्जा देना उनकी राजनैतिक प्रासंगिकता को ही हाशिए पर डाल देगा जो अपने आप में दलित हितों के खिलाफ होगा. यह बात सांसद और नेता न सही, दलित बुद्धिजीवी और अकादमिक लोग तो समझते ही होंगे. जिस शख्स ने बुद्ध के भौतिकवादी-तर्कवादी फलसफे को दलितों की सैद्धांतिक मशाल में तब्दील किया, उसे इस तरह भगवान बनाया जाना विडंबना से कम नहीं.
संसद की स्थापना का साठवां साल उस संविधान का उत्सव मनाने का एक मौका भी है जिसने हमारी संसद, न्यायपालिका और कार्यपालिका की स्थापना को संभव किया और जिसमें आंबेडकर की भूमिका केंद्रीय थी. कार्टून विवाद में भेड़चाल की जो संस्कृति उभरकर सामने आई है, वैसी ही स्थितियों से निपटने के लिए राज्य की यह संरचना बनाई गई है. इनमें से एक संरचना न्यायपालिका को अब उसकी भूमिका निभाने देनी चाहिए, अन्यथा इस देश में हम अपनी आंखों के सामने न्याय का मखौल उड़ता हुआ देखेंगे.
बहरहाल, आक्रोशित सांसदों और कुछ दलित बुद्धिजीवियों की इस राय से हर कोई इत्तेफाक नहीं रखता कि 1949 में बना यह कार्टून अपमानजनक है, जिसे खुद आंबेडकर ने भी देखा था. यदि इस पर अपमानजनक होने और मानहानि करने के आरोप लगते हैं, तो इसे न्यायपालिका के समक्ष जाना चाहिए जैसा कि मानहानि के मामलों के साथ आम तौर पर होता है.
भारतीय संविधान में न्याय के तत्व इस बात की पुष्टि करते हैं कि सिर्फ भावनात्मक या आक्रोश वाली दलीलें स्वीकार करने की बजाए सरकार ऐसे मामले कानून की अदालत के सामने ले जाए जिससे तय हो सके कि पाठ के साथ शामिल किया गया यह कार्टून वास्तव में मानहानि करता भी है या नहीं. दीवानी, फौजदारी या मानहानि के मामलों में अपराध और दंड का फैसला सांसद और मीडिया नहीं करते, यह काम अदालतों का है और इससे अलग कोई भी हरकत हमारी न्याय व्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचाएगी.
इससे भी ज्यादा खतरनाक यह होगा यदि सरकार सारी पुस्तकों को वापस ले लेती है, या फिर 2005 में राष्ट्रीय पाठ्यचर्या ढांचे को मंजूर किए जाने के बाद 2006 से किताबें लिखे जाने की प्रक्रिया को ही अमान्य करार देती है. एनसीईआरटी की इस पहल से पहली बार ऐसा हुआ था कि कुछ रचनात्मक और नवाचारी लोगों ने स्कूली बच्चों के लिए इतनी बेहतर पाठ्य सामग्री तैयार करने का काम किया, कुछ सर्वश्रेष्ठ मेधाओं ने इस काम के लिए सहर्ष स्वैच्छिक सेवा दी थी. इन किताबों का मसौदा एक निगरानी समिति ने देखा था, जो औपचारिक ही था.
मैंने कक्षा 3 की गणित की किताब के समूचे मसौदे को खारिज करने की सिफारिश की थी, जिसे बेहद कम समय में काफी उत्साह के साथ तैयार किया गया था. कई अन्य उदाहरण थे जहां किताबों के मसौदे में बदलाव किए गए, कुछ सामग्री हटाई गई और अनुपयुक्त पाए जाने पर दोबारा लिखी गई. इसमें यह ध्यान रखा गया था कि कोई ऐसी सामग्री न हो जो समाज के किसी खास तबके के लिए अपमानजनक हो, उसकी 'भावनाओं को आहत करती हो,' चूंकि यह रुझान देश में तेजी से बढ़ता जा रहा है. इसके कारण लेखकों और निगरानी समिति के बीच झड़पें भी हुईं, लेकिन बगैर कोई निजी दुश्मनी पाले पूरी प्रक्रिया सर्वश्रेष्ठ अकादमिक भावना के साथ पूरी की गई.
प्रोफेसर थोराट के नेतृत्व में एक और कमेटी द्वारा समीक्षा किए जाने में कोई हर्ज नहीं, लेकिन ऐसा करते वक्त बगैर किसी तर्क के सभी कार्टूनों और चित्रों को एक झटके में साफ कर देने की मंशा नहीं होनी चाहिए, खासकर इस नजरिए से कि हम एक बार फिर अतीत की उबाऊ, अरुचिकर और शिक्षाशास्त्र के लिहाज से अपुष्ट पुस्तकों के दौर में लौट जाएं.
विनोद रैना एनसीईआरटी की पाठ्य-पुस्तकों की निगरानी समिति के सदस्य थे.

