अगर क्रिकेटर मैच फिक्सिंग में शामिल हैं तो उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा होना चाहिए? 22 साल के ऋषि श्रॉफ को लगता है कि होना चाहिए. बंगलुरू का यह युवक इस बात से परेशान है कि क्रिकेटरों को मात्र प्रतिबंध और जुर्माना लगाकर छोड़ दिया जा रहा है और उसने एक विस्तृत रिसर्च पेपर लिखा है, जिसमें भारतीय दंड संहिता की उन धाराओं की सूची बनाई गई है, जिनके तहत उन पर आपराधिक मामला चलाया जा सकता है.
और चूंकि कई क्रिकेटर सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों और बैंकों के कर्मचारी भी हैं, इसलिए उसका तर्क यह भी है कि उन पर 1986 के भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत सरकारी अधिकारियों के रूप में भी मुकदमा चलाया जा सकता है.
यह उन 60 रिसर्च पेपर्स में से मात्र एक होगा, जो श्रॉफ को नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (एनएलएसआइयू), बंगलुरू से पांच साल की इंटीग्रेटेड बीए, एलएलएम डिग्री हासिल करने के पहले लिखने होंगे. इनमें से हरेक रिसर्च पेपर प्रकाशन योग्य होना चाहिए. कोई आश्चर्य की बात नहीं कि यह रेजिडेंशियल स्कूल इंडिया टुडे-नीलसन के सालाना सर्वेक्षण में, सबसे अच्छे लॉ कॉलेजों की सूची में रिकॉर्ड 11वीं बार सबसे ऊपर आया है.
कैंपस में मौजूद सारे 400 छात्रों को हर डेढ़ महीने में एक परीक्षा देनी होती है. कोर्स की पढ़ाई के 60 अंक होते हैं, और 35 अंक रिसर्च प्रोजेक्ट पेपर और उसके बचाव में दिए गए वाइवा के, और 5 अंक हाजिरी के लिए मिलते हैं. जोर प्रोजेक्ट वर्क पर होता है, और हर विषय के चार रिसर्च पेपर होते हैं.
केरल के रहने वाले अंतिम वर्ष के 23 वर्षीय छात्र कृ ष्ण प्रसाद कहते हैं, ''विषय काफी लचीले हैं. पाठ्यक्रम आपको वह करने देता है, जो आप करना चाहते हैं. जब मैंने ज्वाइन किया था, तब मुझे नहीं पता था कि कानूनी शिक्षा क्या होती है, लेकिन मैंने पाया कि मुझे कानून वास्तव में पसंद है. लेकिन यदि आप दूसरी चीजें करना चाहते हैं, तो यहां हमारे पास स्ट्रॉबेरी फील्ड्स हैं और एक सालाना रॉक फेस्टिवल होता है.''
वे आगे की पढ़ाई के लिए ऑक्सफोर्ड जाने की तैयारी कर रहे हैं और वापस भारत लौटने से पहले कॉमर्शियल लॉ करना चाहते हैं. उनके आठ रिसर्च पेपर पहले ही प्रकाशित हो चुके हैं, इनमें से एक ऑक्सफोर्ड के स्टेचूट लॉ रिव्यू में छपा है, जिसका विषय था, 'हाउस ऑफ लॉर्ड्स के किसी निर्णय का भारतीय संसदीय और न्यायिक प्रणाली पर अनुप्रयोग'.
दिल्ली की रहने वाली 23 साल की अंतिम वर्ष की छात्रा वृंदा भंडारी भी रोड्स स्कॉलरशिप लेकर ऑक्सफोर्ड की राह पर हैं. वे कहती हैं, ''मुझे नहीं लगता कि दूसरे कॉलेजों में छात्रों के लिए प्रोजेक्ट गाइड्स होते हैं, या रिसर्च के विभिन्न केंद्र होते हैं, जो यहां हमारे लिए उपलब्ध हैं. मैंने कैंपस में सामाजिक बहिष्कार और सामाजिक समावेशी नीति केंद्र में काम किया है, जहां जाति, समानता, अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति की समस्याओं का अध्ययन करते हैं.''
हालांकि उनका इरादा दिल्ली लौटने के बाद एकेडमिक्स या मुकदमेबाजी करने का है, लेकिन उनका फोकस न्याय मिलने, अदालतें कैसे काम करती हैं, और साथ ही देरी की समस्याओं पर होगा. भंडारी कहती हैं, ''मैं किसी फर्म में काम करना नहीं चाहती हूं, मैं जो कु छ भी करूंगी, वह मानव अधिकारों से संबंधित होगा.''
हर साल सौ फीसदी प्लेसमेंट होता है और एनएलएसआइयू के ज्यादातर पूर्व छात्र कॉर्पोरेट वकील हैं. कैंपस में होने वाली भर्ती से छात्र को कम से कम 1 लाख रु. प्रति माह का वेतन मिल जाता है, जबकि ब्रिटेन स्थित कई प्रमुख लॉ फर्मों ने, जिन्हें 'मैजिक सर्कल' फर्म कहा जाता है, इस साल तक 2.2 लाख रु. प्रति माह तक के वेतन की पेशकश पर भर्तियां की हैं.
लेकिन कई पूर्व छात्र गैर-सरकारी संगठनों में बिखर गए हैं, कु छ भारतीय प्रशासनिक सेवा में पहुंच गए हैं और कई सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों की सहायता के लिए निःशुल्क काम कर रहे हैं.
2008 में ग्रेजुएशन करने वाली 26 साल की अनीशा गोपी ने दो साल तक कॉर्पोरेट लॉ फर्म में काम किया, लेकिन वह उन्हें पसंद नहीं था. अपने पुराने कॉलेज लीगल एड क्लिनिक में काम करने के लिए लौटने से पहले उन्होंने मुंबई में मजलिस नाम के एक गैर-सरकारी संगठन के साथ काम किया जो पीड़ित महिलाओं के लिए काम करता है. वे बताती हैं, ''यह एनएलएसआइयू छात्रों को कु छ कर दिखाने के लिए बहुत मौके देता है. चाहे वह पाठ्येतर हो या संगठनात्मक गतिविधि. वहां बहुत सारी चीजों से हमारा वास्ता पड़ा, क्योंकि लॉ स्कूल में उम्दा दिमाग वाले पहुंचते हैं.''
2008 में ग्रेजुएशन करने वाले एक अन्य छात्र हैं 27 साल के साइरस दारलोंग दिएंगदोह, जो असम-मेघालय काडर के लिए चुने गए आइएएस प्रशिक्षु हैं. उनका कहना है, ''हमारे पाठ्यक्रम में राजनीतिशास्त्र, इतिहास, अर्थशास्त्र थे. समाज के मसलों को समझने के लिए हमने केस स्टडीज की. इससे हमें यह समझने में मदद मिली कि समस्या क्या है और कानून में इसे कैसे देखा जाता है. वर्कशॉप्स और कॉन्फ्रेंसेज से कानून को सामाजिक बदलाव के एक उपकरण के तौर पर समझने का मौका मिला. यह सही मायने में अधिकार संपन्न बनाने की बात है.''
कैंपस के सबसे पुराने रिसर्च सेंटरों में से एक है, सेंटर फॉर चाइल्ड ऐंड लॉ. इसकी प्रमुख हैं 36 साल की नीतू शर्मा. इसका एक केंद्र बिडाडी में है, जहां छात्र गांव के बच्चों, उनके शिक्षकों के साथ काम करते हैं, और पढ़ाई छोड़ने वाले बच्चों को वापस मुख्यधारा में ले आते हैं. शर्मा कहती हैं, ''एनएलएसआइयू के छात्र अपने आप पहल करते हैं, हमारे पास आते हैं और हमारे साथ रिसर्च का काम करते हैं.
फिलहाल हम मिड-डे मील योजना पर काम कर रहे हैं और इसकी तुलना बाल सुधार घरों में परोसे जाने वाले भोजन से कर रहे हैं. सुधार गृहों के भोजन के कोई मानदंड नहीं होते. हम अपने निष्कर्ष और अपनी सिफारिशों को क्रियान्वयन के लिए कर्नाटक सरकार को सौपेंगे.''
दूसरे शोध केंद्र पर्यावरण के मुद्दे, मानव अधिकार, चिकित्सा में कानून और नैतिकता, बौद्धिक संपदा अधिकार और संसाधनों का प्रबंधन देखते हैं. जब सामाजिक उत्थान के लिए प्रतिबद्धता इस तरह की हो, तो वाइस-चांसलर आर. वेंकट राव को अपने कैंपस में चल रहे उन प्रोजेक्ट वर्क्स और पाठ्येतर गतिविधियों पर गर्व होना पूरी तरह जायज ही है, जो उनके छात्रों को भीड़ से अलग कर देती हैं. वे कहते हैं, ''हम पाठ्यक्रम को कवर नहीं करते, हम उसकी परतें खोलते हैं.''
राव खुद मानव अधिकार कानूनों के विशेषज्ञ हैं. वे बताते हैं, ''मुझे लगता है कि हमारा सबसे अच्छा काम दोपहर में होता है. नियमित कक्षाएं डेढ़ बजे खत्म हो जाती हैं और दोपहर में सेमिनार और वर्कशॉप्स होते हैं. छात्रों के साथ संवाद के लिए हम लोक जीवन से लोगों, न्यायाधीशों, आइएएस अफसरों और अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों को आमंत्रित करते हैं. 60 से अधिक सेमिनार होते हैं, हमने बौद्धिक संपदा अधिकार, पेटेंट, कॉपीराइट कानून, सरोगेसी, जैव विविधता जैसे क्षेत्रों को पाठ्यक्रम में जोड़ा है. हमारा उद्देश्य बौद्धिक तौर पर सतर्क, पेशेवर लिहाज से सक्षम और सामाजिक रूप से प्रासंगिक शिक्षा देना है.''
चाहे कर्नाटक में अवैध खनन घोटाले की गहराई का पर्दाफाश करने वाले न्यायाधीश संतोष हेगड़े हों, या चीन विशेषज्ञ जयदेव रानाडे, कई विशेषज्ञ छात्रों के साथ चर्चा के लिए एनएलएसआइयू आते हैं. स्वाभाविक रूप से, इस विश्वविद्यालय में पाठ्यक्रमों के लिए फीस बहुत ऊंची है. स्नातक स्तर पर सालाना एक लाख रु. से अधिक की लागत आती है, लेकिन जरूरतमंदों के लिए छात्रवृत्तियां और वित्तीय सहायता भी बहुतायत में है.
राव कहते हैं, ''हर साल आठ से 10 छात्रों को वित्तीय सहायता प्राप्त होती है. इस वर्ष, हमारी टीमों ने गरीब पृष्ठभूमि के एक व्यक्ति की पहचान की और उसे प्रवेश परीक्षा की सलाह दी और उसे दाखिला दिलवाया. हम उसकी शिक्षा के पूरे खर्च का भुगतान कर रहे हैं, और हमारी योजना ऐसे अन्य योग्य उम्मीदवारों की पहचान करने के लिए गांवों तक जाने की है.''
अब चुनौती शीर्ष पर पहुंचने की नहीं है, बल्कि शीर्ष पर बने रहने की है. वाइस-चांसलर कहते हैं, ''हमारे छात्रों को लीक से हट कर विचारों और नए तरीकों पर फोकस करने, पाठ्यक्रम और पाठ्येत्तर गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है. हम चाहते हैं कि सब अपने काम का आनंद लें. 14 राष्ट्रीय लॉ स्कूलों के परिवार में सबसे बड़े होने के नाते, हमारा काम कानूनी सुधारों की अगली पीढ़ी तक छलांग लगाने, ज्यादा जवाबदेह कानूनी शिक्षा देने का है, जिसमें फोकस सामाजिक जिम्मेदारी पर होगा.''
एनएलएसआइयू के ठीक पीछे है दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) की फैकल्टी ऑफ लॉ, जिसका उत्कृ ष्टता का नौ दशक लंबा रिकॉर्ड है. डीयू की शुरुआत 1924 में हुई थी और यह उत्कृष्ट अनुसंधान सुविधाओं, दुनियाभर के और चोटी के शिक्षा विद्वानों के विजिटिंग फेलो होने के लिए जाना जाता है. यह इस साल रैंकिंग में दो नंबर पर है, जो 2011 में चौथे स्थान से ऊपर है.
तीसरा स्थान पिछले साल के टॉपर-नेशनल एकेडमी ऑफ लीगल स्टडीज ऐंड रिसर्च (नलसर), हैदराबाद का है, यानी वह संस्था जिसे एनएलएसआइयू की फैकल्टी अपना मानस पुत्र समझती है. गुणवत्ता और उपलब्ध सुविधाओं के मामले में, इन दोनों के बीच उन्नीस कोई नहीं है. लेकिन इनके बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा है, जिससे शिक्षा में गुणवत्ता पैदा होती है.

