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खेतीः मिजोरम और असम रहे सबसे आगे

आइजोल के 64 बरस के एक किसान कापजेला सी. को उनकी खेती की छह बीघा जमीन से सिर्फ 1,500 किलो धान की पैदावार मिलती थी. पिछले दो साल से उनकी धान की उपज 3,000 किलोग्राम हो गई है.

तरुण गोगोई
तरुण गोगोई
अपडेटेड 5 नवंबर , 2011

मिजोरमः भूमि सुधार से सुधरी खेती
आइजोल के 64 बरस के एक किसान कापजेला सी. को उनकी खेती की छह बीघा जमीन से सिर्फ 1,500 किलो धान की पैदावार मिलती थी. पिछले दो साल से उनकी धान की उपज 3,000 किलोग्राम हो गई है.

इस साल उन्होंने शीतकाल की खेती का भी सफल प्रयोग कर डाला, महज आधे बीघा में खेती करके उन्होंने 2,000 किलो बंदगोभी और 400 किलो प्याज उगा ली. 2012 में उनकी योजना सर्दियों में पूरे खेत में प्याज उगाने की है.

कापजेला कहते हैं, ''बाकी लोगों की तरह मैं भी झूम खेती करता था. सरकारी अधिकारियों ने पिछले साल मुझे सीढ़ीदार खेती करने के लिए राजी किया, जिससे मिट्टी के संरक्षण और उसकी उर्वरता बनाए रखने में मदद मिलती है. इससे वन्य भूमि की भी हिफाजत होती है. मैं अब जिम्मेदार किसान हूं.''

2009 में शुरू की गई कृषि और संबंधित क्षेत्रों के लिए मिजोरम की अग्रणी नई भूमि प्रयोग नीति (एनएलयूपी) ने कापजेला जैसे किसानों की जिंदगी को बदल कर रख दिया.

चूंकि राज्‍य पानी की कमी का सामना करता है, इस वजह से किसानों को पानी बचाने के ढांचे बनाने के लिए रकम दी जाती है और ड्रिप या माइक्रो स्प्रिंकलर के जरिए सिंचाई की सुविधा मुफ्त दी जाती है.

कापजेला कहते हैं, ''मुझे किसी बात की चिंता नहीं करनी पड़ती. मुझे यहां तक कि बिना बुझ चूना तक मिला है, जिसका इस्तेमाल खेत की अम्लीयता कम करने के लिए किया जाता है.''

झूम खेती वाले इलाकों के लिए एनएलयूपी के तहत सरकार का वाटरशेड विकास कार्यक्रम किसानों को झूम के बजाए धान की खेती (वेट राइस कल्टीवेशन-डब्लूआरसी) या सीढ़ीदार खेती के लिए प्रोत्साहित करता है.

साथ ही उन लोगों को 1 लाख रु. की मदद भी देता है, जिनकी आमदनी का सिर्फ एक ही जरिया-खेती है. 2010 से 2011 के बीच सरकार ने 75 फीसदी सब्सिडी पर 350 पॉवर टिलर्स बांटे हैं और 2 लाख रु. तक की मदद के साथ 50 ट्रैक्टर भी वितरित किए.

 और इस सारी कवायद के नतीजे नजर आ रहे हैं. झूम खेती के तहत आने वाला क्षेत्र 2007 में 44,947 हेक्टेयर से घटकर 2011 में 28,735 हेक्टेयर रह गया है.

डब्लूआरसी क्षेत्र 2007 में 9,594 हेक्टेयर से बढ़कर 2011 में 12,130 हेक्टेयर हो गया है. राज्‍य ने इस साल 52,000 मीट्रिक टन चावल की पैदावार ली, जो 2010-11 की पैदावार से 10 फीसदी ज्‍यादा है तो कृषि मंत्री एच. लियानसैलोवा और ज्‍यादा उपज लेने के लिए जोर लगा रहे हैं. वे कहते हैं, ''

अभी भी राज्‍य में जहां 60 फीसदी जनसंख्या खेती पर ही गुजर-बसर करती है, चावल के कुल उत्पादन और कुल मांग में 75 फीसदी का अंतर है. हमें इस अंतर में अच्छी-खासी कमी लानी होगी.''

असम: धान से लहलहाया राज्‍य
वर्षों के ठहराव के बाद असम में चावल की पैदावार में बढ़ोतरी हुई है. यह पैदावार 2006-07 में 1,349 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से 2010-11 में बढ़कर 1,969 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गई.

2010-11 में राज्‍य में कुल अनाज उत्पादन जहां 52.31 लाख मीट्रिक टन था, वहीं चावल की पैदावार 50.86 लाख मीट्रिक टन थी, जो 2009-10 के इसी आंकड़े की तुलना में 15.4 फीसदी ज्‍यादा थी. इससे सारे चावल पैदा करने वाले राज्‍यों की सूची में राज्‍य की रैंक बढ़कर 8वीं हो गई.

मुख्यमंत्री तरुण गोगोई यह कहकर बिल्कुल निशाने पर तीर साधते हैं कि, ''मुझे इस बात की परवाह नहीं है कि उद्योगपति असम में आकर कारखाने लगाते हैं या नहीं, लेकिन मैं चाहता हूं कि किसान और ज्‍यादा उद्यमशील बनें.''

मार्च, 2011 में गरीब किसानों को मच्छरदानियां और कंबल बांटने के गोगोई के फैसले की विपक्ष ने चुनावी हथकंडा कहते हुए आलोचना की थी, लेकिन गोगोई इसे जायज ठहराते हैं.

वे कहते हैं, ''किसी भी और बीमारी की तुलना में गरीब किसान मलेरिया और जुकाम से ज्‍यादा पीड़ित होते हैं. अगर किसी का स्वास्थ्य ही ठीक नहीं है, तो वह उत्पादक कैसे हो सकता है? यह क्षमता पैदा करने के रक्षात्मक उपाय हैं. ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बदलने के लिए आपको बड़ी योजनाएं नहीं बल्कि छोटे-छोटे कदमों की जरूरत है.''

बारपेटा जिले के भालागुरी के एक किसान बिपुल चौधरी को सरकार से सस्ती दरों पर बीज और ट्रैक्टर पर 30 प्रतिशत सब्सिडी मिलती है. उनकी मिल्कियत वाले पांच बीघे के खेत में चावल की संकर नस्ल ने पैदावार को 1,500 किलोग्राम से बढ़ाकर इस साल 2,500 किलोग्राम कर दिया है.

चौधरी कहते हैं, ''पहले मुझे जमीन की सिंचाई करने के लिए पानी के पंप किराए पर लेने होते थे. डीजल के बढ़ते दामों को देखते हुए खेती करना लगभग नामुमकिन हो गया था.'' ट्रैक्टर आने के बाद से उन्होंने अपने खेत की सिंचाई के बारे में चिंता करना छोड़ दिया है.

गोगोई इसे मानवीय दखल कहते हैं और इसे राज्‍य में बढ़ी हुई खेती की पैदावार का श्रेय देते हैं. वे कहते हैं, ''ऐसा नहीं है कि खेती का कुल रकबा बढ़ गया हो. अच्छी क्वालिटी के बीजों, खाद, कीटनाशकों, खेती के उपकरणों और तकनीकी जानकारी की बेहतर उपलब्धता-सभी की राज्‍य में उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने में भूमिका रही है.''

लेकिन नौकरशाही एक बाधा बनी हुई है. चौधरी शिकायत करते हैं, ''सरकारी मदद आती है, लेकिन इसके लिए संबंधित विभागों के अफसरों के कई चक्कर लगाने होते हैं.''

सरकार ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन-चावल, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना और अलग-अलग सिंचाई तथा यांत्रिकीकरण (मैकनाइजेशन) कार्यक्रमों जैसी कई योजनाएं शुरू की हैं.मुख्यमंत्री ने कृषि मंत्री नीलमणि सेन डेका को आज तक घोषित तमाम योजनाओं पर अमल की देखरेख करने को कहा है.

सन्‌ 2010-11 में सभी राज्‍यों में खाद्यान्न के क्षेत्र में (द्वितीय श्रेणी) सर्वश्रेष्ठ कामकाज के लिए जुलाई, 2011 में असम को केंद्र से 2 करोड़ रु. का पुरस्कार मिला था. गोगोई सरकार ने इस रकम का इस्तेमाल कृषि मंत्रालय के कार्यालयों का मूलभूत ढांचा संवारने में करने का फैसला किया है.

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