द्रमुक के वयोवृद्ध नेता के. करुणानिधि को भरोसा था कि कि उनकी बेटी कनिमोलि आखिर रिहा कर दी जाएंगी. सीबीआइ ने सार्वजनिक रूप से कह दिया था कि आरोपपत्र दाखिल किया जा चुका है, इसलिए वह जमानत का विरोध नहीं करेगी.
करुणानिधि का कुटुंब 3 नवंबर को सुबह दिल्ली की पटियाला हाउस अदालत में इस भरोसे के साथ पहुंचा कि वे कनिमोलि को घर ले जाएंगे. कानून और तर्क दोनों ही संकेत दे रहे थे कि उन्हें जेल में रखने का अब कोई कारण नहीं है. पर विशेष न्यायाधीश ओ.पी. सैनी ने उन्हें वापस तिहाड़ जेल भेज दिया.
उन्होंने इसकी विचित्र वजह दी. कनिमोलि जेल की सलाखों के पीछे रहेंगी क्योंकि वे दौलतमंद हैं और वहां सुरक्षित रहेंगी. न्याय व्यवस्था से जुड़ा समुदाय हैरान है. फैसले के खिलाफ हाइकोर्ट में अपील तो होगी, पर इससे एक बार फिर विचाराधीन कैदियों के अधिकारों पर उग्र बहस छिड़ गई है.
दोष साबित होने तक क्या वे निर्दोष हैं, या निर्दोष साबित होने तक दोषी हैं? वरिष्ठ वकील के.टी.एस. तुलसी का कहना है कि देश में अपराध सिद्ध करने की दर इतनी खराब है, अदालतें जमानत देने से इनकार कर रही हैं, दोषी साबित किए बिना सजा के तौर पर जेल में बंद किया जा रहा है.
बकौल सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील होमी रनीना, ''न्यायाधीश ने अनावश्यक रूप से कड़ा रुख अपनाया है. मुकदमा 11 नवंबर को शुरू होने वाला है. वे सबूतों से छेड़छाड़ नहीं करने वाले हैं, न तो अभी और न व्यक्तिगत रूप से .''
सैनी ने चार अन्य लोगों -कलैग्नार टीवी के प्रमुख शरद कुमार, बॉलीवुड के प्रोड्यूसर करीम मोरानी, कुसेगांव फल और सब्जियों के निदेशक आसिफ बलवा और राजीव अग्रवाल के साथ कनिमोलि-की जमानत अर्जी खारिज कर दी.
सैनी ने कहा, ''बार-बार कहा गया है कि ये वजहें आरोपी को जमानत देने का अच्छा आधार हैं. मैंने इन निवेदनों पर सावधानी से और उत्सुकतापूर्वक सोच-विचार किया है. किसी विशेष मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में ये कारण उचित तर्क हो सकते हैं लेकिन कुछ मामलों में ऐसा नहीं हो सकता.''
आइपीसी के (क्रिमिनल ब्रीच ऑफ ट्रस्ट) के अधिक गंभीर अनुच्छेद 409 के अंतर्गत आरोप तय करते हुए उन्होंने यह बात कही. इसमें अधिकतम सजा उम्रकैद हो सकती है.
22 अक्तूबर को सैनी के आदेश में कहा गया है, ''ऐसे अपराधों में शामिल लोग, खास तौर से वे जो अपने किए गए अपराध का फायदा उठाते हैं, किसी तरह की विलासिता के हकदार नहीं हैं और उनके प्रति किसी तरह की सहानुभूति न सिर्फ पूरी तरह अनुपयुक्त होगी बल्कि समाज के व्यापक हित के खिलाफ भी होगी.अदालत यह तथ्य नहीं भूल सकती कि ऐसे अपराध निजी लाभ के लिए शांत और सुनियोजित तरीके से अंजाम दिए जाते हैं. अगर कोई व्यक्ति जानता है कि सार्वजनिक धन का भारी मात्रा में गबन करके वह कुछ महीने जेल में बिताने के बाद जमानत पर आ सकता है.''
आदेश का भाव यही बताता है कि फिलहाल कोई दया नहीं बरती जाएगी.
2 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति जी.एस. सिंघवी और न्यायमूर्ति एच.एल. दत्तू की पीठ ने 2जी के अन्य आरोपियों यूनिटेक के प्रमोटर संजय चंद्रा, डीबी रियल्टी के विनोद गोयनका और हरी नायर, रिलायंस टेलीकॉम के सुरेंद्र पिपारा और गौतम दोषी की जमानत याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रखा था.
यह फैसला कभी भी आ सकता है. 2जी मुकदमा सैनी की अदालत में 11 नवंबर को शुरू होगा.

