झारखंड सचिवालय के एक कमरे में बैठते हैं मुख्यमंत्री के सुरक्षा सलाहकार डॉ. डी.एन. गौतम. इन दिनों उनकी मेज पर फाइलें लगभग गायब-सी हैं. यह समझने की भूल न करें कि उन्होंने फाइलें निबटा ली हैं. मेज इसलिए खाली है क्योंकि अब उनके पास फाइलें आनी बंद हो गई हैं. 1974 बैच के आइपीएस अधिकारी और बिहार पुलिस के पूर्व डीजीपी गौतम ने 29 फरवरी को पद छोड़ने की घोषणा कर दी है. उन्हें पिछले साल जनवरी में झारखंड के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने बड़ी धूमधाम के साथ अपना सुरक्षा सलाहकार नियुक्त किया था.
झारखंड पुलिस के रवैए से आहत गौतम ने कुछ ही दिन पहले कहा था कि राज्य के पुलिस अधिकारी गैर-जिम्मेदाराना बात करते हैं. अपने वरीय अधिकारियों की बात नहीं मानते और बेहतर पुलिसिंग और पुलिस ढांचे के विकास में उनकी कोई रुचि नहीं है. उन्होंने मुख्यमंत्री को इस्तीफे का पत्र सौंप दिया है जो इस्तीफा कम, शिकायत का पुलिंदा अधिक है.
लगभग झल्लाने वाले अंदाज में गौतम कोई भी टिप्पणी करने से मना कर देते हैं, ‘जिस दिन पद से इस्तीफा दूंगा उस दिन बाकायदा बोलूंगा कि यहां क्या हो रहा है और मैं क्या करना चाहता हूं.’ मुंडा भी उन्हें मनाने की कोशिश करते नहीं दिखते क्योंकि उनकी विदाई से पहले मुंडा ने विदाई संदेश दे दिया. मुंडा कहते हैं, ‘किसी के चले जाने से रिश्ते खत्म नहीं होते.’ उनकी कुछ शिकायतें जायज हैं. जैसे पुलिस के पास लगभग 14,553 लंबित मामलों का अंबार लगा है.
वरीय पुलिस अधिकारियों का ऑपरेशन से दूर रहना और पुलिस में ढांचागत सुधार के मामलों पर पुलिस विभाग का सुस्त और टालू रवैया. कई मायनों में गौतम ने सुरक्षा सलाहकार के तौर पर मिले अधिकार को गलत समझा. एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी बताते हैं, ‘वे ईमानदार और सक्षम अधिकारी रहे हैं. बिहार में उन्हें मीडिया में छाए रहने का शौक था और यही आदत उन्हें यहां भी है.
पुलिस को गाली देकर आप सुर्खियों में तो आ ही सकते हैं. वे सुपर डीजीपी बनने की कोशिश कर रहे थे. उन्हें मुख्यमंत्री का सुरक्षा सलाहकार नियुक्त किया गया था, न कि पुलिस का. उनका काम सुझाव देना और उस पर अमल करवाना था लेकिन वह माइक्रो लेवल पर जा कर मीटिंग करने लगे जो आइजी और एडीजी के अधिकार क्षेत्र में आता है.’ यह मात्र संयोग नहीं है जिसकी पुलिस मुख्यालय में चर्चा भी होती है, कि झारखंड राज्य महिला आयोग की मुखिया हेमलता एस. मोहन मूलतः उत्तर प्रदेश के निवासी गौतम की समधिन हैं.
गौतम की नियुक्ति के दौरान राजनैतिक हलकों में यह चर्चा उठी थी कि इस नियुक्ति के पीछे राजनैतिक कारण हैं, न कि उनकी बेहतर प्रशासनिक क्षमता. गौतम के भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी के साथ अच्छे संबंध बताए जाते हैं. हालांकि वे इसे बेसिर-पैर की चर्चा मानते हैं.
इस घटनाक्रम के दो दिन बाद ही झारखंड विकास मोर्चा के मुखिया बाबूलाल मरांडी का उनसे मिलने पहुंच जाना कई चर्चाओं को जन्म दे रहा है. गौतम राजनीति में आने की तो नहीं सोच रहे? उम्मीद है, आने वाले दिनों में रोचक खुलासे होंगे.

