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खरीद लो, झारखंड में बिकाऊ है राज्‍यसभा सीट

प्राथमिक जांच में चुनाव आयोग की झारखंड में राज्‍यसभा चुनाव के दौरान खरीद-फरोख्त की आशंकाओं की पुष्टि हुई. बताया जा रहा है कि जबरदस्त संपर्कों वाला एक उद्योगपति झारखंड के जरिए राज्‍यसभा तक पहुंचने की जुगत में लगा हुआ था.

अपडेटेड 15 अप्रैल , 2012

बात 30 मार्च की है. सुबह 6:30 बजे सिल्वर रंग की टोयोटा इनोवा रांची की सीमा पर पहुंची ही थी कि आयकर विभाग के गुप्तचरों की एक टोली ने उसे रोका और एक दिन पहले ही 200 रु. प्रति दिन की पगार पर रखे गए चालक ननकू राम को ब्रेक लगाने के लिए मजबूर कर दिया. तलाशी लेने पर गाड़ी की डिक्की से 2.15 करोड़ रु. की नकदी बरामद हुई और कुछ पर्चियां भी जिन पर कथित तौर पर झारखंड के कुछ विधायकों के नाम और मोबाइल नंबर लिखे हुए थे.

नकदी बरामद हुई राज्‍यसभा में झारखंड से रिक्त हुए दो स्थानों के लिए मतदान होने के डेढ़ घंटे पहले. आयकर अधिकारियों का मानना है कि ये पैसे 49 वर्षीय राजकुमार अग्रवाल के थे जो झारखंड से रिक्त सीट के लिए हो रहे राज्‍यसभा चुनाव (अब रद्द) में बतौर निर्दलीय उम्मीदवार मैदान में थे. नकदी लेकर चल रहा सुधांशु त्रिपाठी नाम का व्यक्ति उनके दामाद का कर्मचारी बताया जा रहा है. उससे उन बैगों को अग्रवाल के रांची स्थित एक कार कंपनी के शोरूम तक पहुंचाने के लिए कहा गया था.

राजकुमार अग्रवाल ने झारखंड में जबरदस्त प्रगति की है. कोई दो दशक पहले एक छोटी-सी हार्डवेयर शॉप से शुरुआत करने वाले राजकुमार आज झारखंड की सबसे प्रमुख व्यापारिक हस्तियों में से एक हैं. हालांकि जमशेदपुर के इस अरबपति ने, जो अपने बराबर के झारखंड के लगभग सभी नेताओं से संबंध रखने के लिए जाने जाते हैं, राज्‍यसभा पहुंचने के लिए पैसे का इस्तेमाल करने से इनकार किया है, फिर भी वे राज्‍यसभा के चुनाव के रद्द होने की देश की पहली घटना से जुड़े होने के कारण सुर्खियों में आ गए हैं.

झारखंड हाइकोर्ट ने चुनाव आयोग को राज्‍यसभा चुनाव में खरीद-फरोख्त की जांच सीबीआइ से कराने का निर्देश दिया है. राज्‍यसभा चुनाव के रद्द होने वाला पहला राज्‍य बनने का संदिग्ध रिकॉर्ड झारखंड पर सटीक बैठता है. फिलहाल राज्‍यसभा में झारखंड का प्रतिनिधित्व करने वाले चार सदस्यों में से दो रिलायंस से संबद्ध रहे परिमल नाथवानी और अल्केमिस्ट ग्रुप के मुखिया कंवर दीप सिंह हैं. 2008 में अहमदाबाद के निर्दलीय उम्मीदवार नाथवानी राज्‍यसभा के लिए चुन लिए गए. तब झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के अधिकृत उम्मीदवार किशोर लाल को महज 8 वोट ही मिले जबकि पार्टी के 17 विधायक थे. उससे पूर्व, जेएमएम के 11 विधायक पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार को अंगूठा दिखाकर नाथवानी की उम्मीदवारी का प्रस्ताव कर चुके थे.

2010 में भी जेएमएम प्रत्याशी कंवर दीप सिंह 32 वोटों से जीते जबकि भाजपा प्रत्याशी अजय मारू को सिर्फ 17 वोट ही मिले. जहां एक भाजपा विधायक वोट डालने नहीं आया, वहीं गठबंधन सहयोगी जेडी (यू) के दो विधायकों ने भी जेएमएम प्रत्याशी के पक्ष में वोट किया था. हालांकि यह बात दूसरी है कि राज्‍यसभा पहुंचने के बाद इस अरबपति सांसद ने सोरेन को धता बताते हुए तृणमूल कांग्रेस का दामन थाम लिया. आज कंवर दीप की अधिकृत राज्‍यसभा प्रोफाइल में उन्हें तृणमूल कांग्रेस का सांसद बताया जाता है. विडंबना ही है कि झारखंड में इस पार्टी का एक भी विधायक नहीं है जहां से कंवर दीप उच्च सदन में पहुंचे हैं.

रद्द हुए राज्‍यसभा चुनाव में जहां कांग्रेस, जेवीएम और जेएमएम ने अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे थे, वहीं दो निर्दलीय आर.के. अग्रवाल और कोलकाता के रियल एस्टेट डेवलपर पवन कुमार धूत भी ताल ठोंक रहे थे. इसमें खास पेच यह है कि धनी लोगों को सत्ता का आकर्षण और बेशुमार दौलत इस छोटे से राज्‍य तक खींच ले आती है, जहां अंतरात्मा की आवाज नहीं सुनने वाले विधायक उनकी विजय सुनिश्चित कर देते हैं.

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