scorecardresearch

झारखंड: किसी काम न आता खून

नियंत्रक और महालेखाकार की रिपोर्ट में रक्त का जमना, रक्तदान से पहले दाता के रक्त की समुचित जांच न करना और अवधि से अधिक समय तक रक्त रखने को बताया बर्बादी का कारण

अपडेटेड 10 सितंबर , 2011

झारखंड में ऐसे लोगों की बड़ी संख्या है जो एनीमिया के शिकार हैं, ऐसे में राज्‍य के राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (रिम्स) में बेशकीमती रक्त का बेकार चले जाना एक गंभीर मसला बनता जा रहा है. पिछले दिनों भारत के नियंत्रक और महालेखाकार ने रिम्स को लेकर सौंपे गए 25 पृष्ठों के प्रतिवेदन में खुलासा किया कि 2006 से 2009 के बीच रक्त की 699 यूनिट बर्बाद हो गईं. रिपोर्ट के मुताबिक,''176 यूनिट रक्त जमने, 35 यूनिट रक्त 35 दिन के भीतर उपयोग में न आने और 488 यूनिट रक्त संग्रहण से पहले जरूरी जांच नहीं किए जाने से बेकार हो गया.''

रिम्स में हो रही कई अन्य कारगुजारियों का भी खुलासा रिपोर्ट से होता है. मसलन, मरीजों को घटिया किस्म की दवा देना, उनके खाने में कटौती, एंबुलेंस का इस्तेमाल मरीजों को ढोने में कम डॉक्टरों को लाने और ले जाने में अधिक होना और स्वास्थ्य सेवा को बेहतर बनाने के लिए उपलब्ध फंड का प्रयोग न होना.

हालांकि रिपोर्ट से भन्नाए रिम्स प्रशासन ने इस रिपोर्ट पर सवालिया निशान लगाया है. रिम्स के प्रशासक तुलसी महतो कहते हैं, ''अगर आप रक्त की बर्बादी का औसत निकालें तो यह एक प्रतिशत के करीब है जो बहुत अधिक नहीं है. हमारे पास रक्त के संरक्षण के लिए उचित तकनीक मौजूद है और पूरी सावधानी बरतते हैं. इसमें लापरवाही की कहीं कोई बात नहीं, जिस लापरवाही की बात रिपोर्ट में कही गई है. ऐसी कोई तकनीक नहीं है जिससे रक्त को 35 दिनों से अधिक तक बचाया जा सके.''

रिम्स का दावा है कि वह 4,000 यूनिट प्रति माह के हिसाब से हर साल तकरीबन 48,000 यूनिट ब्लड इकट्ठा करता है. ऐसे में खून की बर्बादी की रिपोर्ट को बढ़ा-चढ़ा कर देखने की जरूरत नहीं है. रिम्स के ब्लड बैंक के प्रभारी डॉ. आर.के. श्रीवास्तव कहते हैं, ''यह कोई इतनी बड़ी बर्बादी नहीं है, जिस से माथे पर चिंता की लकीर खींच लें. खून को जरूरत के हिसाब से दिया जाता है, जिस मरीज को जिस ब्लड ग्रुप की जरूरत होगी, उसे हम वही ब्लड ग्रुप देंगे न कि कोई अन्य. ऐसे में अगर कोई खास ग्रुप का खून 35 दिन तक इस्तेमाल नहीं होता है तो उसका बर्बाद होना लाजमी है, जिसमें हम या आप कुछ नहीं कर सकते.'' श्रीवास्तव यह दावा भी करते हैं कि भारत या विश्व के किसी भी अस्पताल के ब्लड बैंक

की तुलना में रिम्स में खून की बर्बाद की दर काफी कम है.

रिपोर्ट की बातें रिम्स प्रशासन की पेशानी पर बल लाने के लिए काफी हैं. इनमें खास यह कि रक्त संग्रहण से पहले जरूरी जांच नहीं करने से 488 यूनिट रक्त बेकार हो गया. यानी रक्तदान से पहले रक्तदाता के खून की समुचित जांच नहीं की गई कि कहीं उसे तपेदिक, एचआइवी, सिफलिस, मलेरिया जैसी बीमारी तो नहीं है.

श्रीवास्तव कहते हैं, ''रक्त के एक नमूने की जांच में कम-से-कम डेढ़ से दो घंटे का समय लगता है. जब आप रक्तदान शिविर चला रहे हों तो किसी को इतने घंटे रोककर नहीं रख सकते. हम झारखंड के कई हिस्सों में नियमित रूप से रक्तदान शिविर चलाते हैं, ऐसा करना संभव नहीं है. हम बाद में रक्त के उन नमूनों की जांच करते हैं और संक्रमित पाए जाने पर उसे हटा देते हैं.'' तत्काल रक्त परीक्षण न करने के पीछे रिम्स प्रशासक नाको के दिशा-निर्देशों का भी हवाला देते हैं लेकिन ये दिशा-निर्देश क्या हैं शायद रिम्स को भी पता नहीं.

उधर, झारखंड महालेखाकार कार्यालय के एक पदाधिकारी ने कहा, ''हमें नहीं पता कि वे किस वैज्ञानिक भाषा में खून की बर्बादी को कमतर कर बता रहे हैं. हम तो वही कह रहे हैं जो कागजात रिम्स ने हमें उपलब्ध करवाए, न एक यूनिट कम न अधिक. हमने अपनी भाषा में रिपोर्ट दी, आप उसे अपनी भाषा में गलत ठहराएं. आप सिर्फ इतना ही कर सकते हैं.''

झारखंड, जहां लगभग 42 अधिकृत ब्लड बैंक हैं, को हर साल 1.90 लाख यूनिट रक्त की कमी से जूझ्ना पड़ता है जबकि यह 1.10 लाख यूनिट से अधिक रक्त नहीं जुटा पाता है. रिम्स और महालेखाकार में खींचतान के बीच राज्‍य के स्वास्थ्य मंत्री हेमलाल मुर्मू पूरे मामले पर गौर करने का आश्वासन देते हैं.

मुर्मू कहते हैं, ''रक्त की हरेक बूंद कीमती है और इसकी हिफाजत होनी चाहिए. इस दिशा में कार्रवाई होगी.'' रक्त का इस तरह बर्बाद होना ही मसला नहीं है. रिम्स परिसर से बाहर अवैध ब्लड बैंक चल रहे हैं. अक्सर मरीजों की शिकायत रही है कि उन्हें रक्त नहीं मिलता और मजबूरन उन्हें बाहर से रक्त खरीदना पड़ता है.

Advertisement
Advertisement