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झारखंड: हिरासत में कैबिनेट

सत्ता में रहते हुए अपनी काली करतूतों के कारण न्यायिक हिरासत में भेजे गए पूर्व मंत्रियों की लगातार लंबी होती जा रही सूची में सबसे ताजा नाम भानुप्रताप शाही का जुड़ गया है.

अपडेटेड 15 अगस्त , 2011

मार्च, 2005 से लेकर जनवरी, 2009 के बीच झारखंड की चार सरकारों को बनाने और गिराने में अहम भूमिका अदा करने वाले पांच पूर्व मंत्री सलाखों के पीछे आराम फरमा रहे हैं.

2005 में हुए झारखंड विधानसभा का पहला चुनाव लड़ने के छह साल बाद मधु कोड़ा, कमलेश सिंह, भानुप्रताप शाही, एनोस एक्का और हरिनारायण राय की भाग्य रेखाएं बहुत कुछ मिलती-जुलती साबित हुई हैं.

कोड़ा तब निर्दलीय चुनाव लड़े थे, कमलेश, शाही, एक्का और राय अपनी राजनैतिक पारी की शुरुआत कर रहे थे. ये पांचों चुनाव जीत गए थे और कमलेश 35 वोट के अंतर से किसी तरह कामयाब हो पाए थे.

बदनाम पांच
 
मधु कोड़ा
पूर्व मुख्यमंत्री, अब सांसद
आरोप काले पैसे को सफेद करना, ज्ञात स्त्रोतों से ज्‍यादा संपत्ति जुटाना. 30 नवंबर, 2009 को न्यायिक हिरासत में लिए गए वे संसद में भाग लेने तिहाड़ जेल से जाते हैं.

कमलेश सिंह
पूर्व जल संसाधन मंत्री
आरोप ज्ञात स्त्रोतों से ज्‍यादा संपत्ति जुटाना. 1 दिसंबर, 2009 से वे रांची के बिरसा मुंडा केंद्रीय कारागार में रखे गए हैं. वे चार सरकारों में मंत्री रह चुके हैं.
 
भानुप्रताप शाही
पूर्व स्वास्थ्य मंत्री
आरोप 6 अगस्त को रांची की सीबीआइ अदालत ने शाही को 2008 के 130 करोड़ रु. के दवा घोटाले में न्यायिक हिरासत में भेजा और रांची के बिरसा मुंडा केंद्रीय कारागार में रखा.

हरिनारायण राय
पूर्व शहरी विकास मंत्री
आरोप ज्ञात स्त्रोतों से ज्‍यादा संपत्ति जुटाना.
17 अगस्त, 2009 से वे रांची के बिरसा मुंडा केंद्रीय कारागार में बंद हैं. वे तीन सरकारों में मंत्री रह चुके हैं.
 

एनोस एक्का
पूर्व ग्रामीण विकास मंत्री
आरोप ज्ञात स्त्रोतों से ज्‍यादा संपत्ति जुटाना.
वे रांची के बिरसा मुंडा केंद्रीय कारागार में 17 अगस्त, 2009 से बंद हैं और तीन सरकारों में मंत्री रह चुके हैं.

 

चुनाव के फौरन बाद कमलेश शिबू सोरेन के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार में शामिल हो गए. लेकिन एक सप्ताह के भीतर ही उन्होंने पलटी मार ली और वे एक्का, राय तथा कोड़ा के साथ अर्जुन मुंडा के नेतृत्व वाली राजग सरकार में शामिल हो गए.

सितंबर, 2006 में शाही एक्का, कमलेश और राय के साथ मिल गए और उन्होंने कोड़ा को मुख्यमंत्री के पद के लिए तैयार कर लिया. शाही किसी सरकारी अधिकारी पर हमला करने के एक लंबित आपराधिक मामले की वजह से चूंकि कोड़ा सरकार में शामिल नहीं हो सके, इसलिए उन्होंने सत्तर की उम्र पार कर चुके अपने पिता हेमेंद्र प्रताप देहाती को मंत्रिमंडल में शामिल करवा दिया.

तीन सप्ताह से ज्‍यादा की न्यायिक हिरासत के बाद जब शाही को जमानत मिल गई, तो देहाती ने अपने बेटे के लिए कुर्सी खाली कर दी. इस सरकार में 23 महीने तक बने रहने के बाद चारों ने कोड़ा से समर्थन वापस ले लिया और अपनी निष्ठा बदलकर सोरेन के समर्थक बन गए, जिन्होंने अगस्त, 2008 में अपनी सरकार बनाई.

जनवरी, 2009 में एक विधानसभा उपचुनाव में सोरेन की हार के बाद जब राज्‍य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया, तब तक कमलेश एक के बाद एक चार सरकारों में मंत्री बनते रहे. संयोग से कमलेश की बेटी की शादी मुंबई के कांग्रेसी नेता कृपाशंकर सिंह के बेटे से हुई है, जिन पर आय के ज्ञात स्त्रोतों से ज्‍यादा संपत्ति जुटाने के आरोप भी हैं.

मंत्री की हैसियत से एक्का, कमलेश, राय, शाही और कोड़ा ने हर कानून को बेधड़क होकर तोड़ा-मरोड़ा और गलत तरीके की अपनी कमाई का प्रदर्शन करते रहे. ग्रामीण विकास मंत्री के तौर पर एक्का ने अपनी पत्नी को खूब ठेके बांटे और 2006, 2007 तथा 2008 में अपने बेटे के जन्मदिन पर 50,000 लोगों को न्यौता भेजा. शाही ने 2008 में स्वास्थ्य मंत्री रहते हुए सरकार को दवाओं की आपूर्ति करने का काम अपने भतीजे को दे दिया. कमलेश ने अप्रैल, 2008 में अपनी बेटी की शादी में शामिल होने के लिए मेहमानों को लाने के लिए चार्टर्ड विमान इस्तेमाल किए.

इन सबके पाप का घड़ा 2009 में भरना शुरू हुआ.

कोड़ा, एक्का, राय और कमलेश कठघरे में तब आए, जब राज्‍य सतर्कता ब्यूरो ने प्रतिकूल रिपोर्टें दीं, जिसका नतीजा यह हुआ कि सीबीआइ, प्रवर्तन निदेशालय और आयकर विभाग जैसी केंद्रीय संस्थाओं ने कड़ी जांच शुरू कर दी. काले पैसे को सफेद करने और ज्ञात स्त्रोतों से ज्‍यादा संपत्ति रखने के आरोपों में चारों को न्यायिक हिरासत में रहते हुए अब लगभग दो साल हो गए हैं.

6 अगस्त को शाही भी रांची के बिरसा मुंडा केंद्रीय कारगार में मंत्रिमंडल के अपने पूर्व सहयोगियों से जा मिले, जब सीबीआइ की एक अदालत ने उन्हें 2008 में हुए 130 करोड़ रु. के एक दवा घोटाले के सिलसिले में न्यायिक हिरासत में भेज दिया. शाही उस समय स्वास्थ्य मंत्री थे.

एक विभागीय जांच में जब शाही के मातहत दवाओं की खरीद में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं का खुलासा हुआ तो अगस्त, 2009 में तत्कालीन राज्‍यपाल के. शंकरनारायणन ने सीबीआइ जांच के आदेश दिए.

हालांकि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की 2008 की खरीद प्राथमिकता नीति में कहा गया है कि राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के लिए राज्‍यों को केवल सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों से ही दवाएं और उपकरण खरीदने चाहिए, लेकिन शाही और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने नियमों को धता बताते हुए 130 करोड़ रु. मूल्य की दवाएं और उपकरण 19 निजी कंपनियों से खरीद लिए.

उदाहरण के लिए, 48.56 करोड़ रु. मूल्य की दवाइयों की आपूर्ति करने वाली फोगला नाम की एक स्थानीय कंपनी ने वाणिज्यिक कर विभाग में अपना पंजीकरण 2008 में राज्‍य के स्वास्थ्य विभाग से ठेका मिलने के बाद ही करवाया.

कंपनी को माइक्रोजेन नामक कीटाणुनाशक की आपूर्ति का ठेका इस रसायन की निर्माता फर्म माइक्रोजेन हाइजीन प्राइवेट लि. की ओर से उद्धृत की गई दरों से ऊंची दरों पर दिया गया था. कंपनी के मालिक राजेश फोगला ने सीबीआइ को दिए इकबालिया बयान में माना कि उसने ठेका पाने के लिए शाही को 2.14 करोड़ रु. की घूस दी थी. जुलाई, 2009 में सीबीआइ ने शाही के खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत एक मामला दर्ज किया.

1991 के बैच के आइएएस अधिकारी और पूर्व स्वास्थ्य सचिव प्रदीप कुमार, जिन्हें इसी घोटाले के सिलसिले में 8 अगस्त को न्यायिक हिरासत में भेजा गया था, अब रांची जेल में अपने पूर्व आका को संगत दे रहे हैं. शाही और कमलेश 2009 का विधानसभा चुनाव हार गए थे, एक्का और राय अपनी-अपनी सीटों से चुनाव जीत गए और झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री कोड़ा 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के

स्तंभ बेगुन सुंब्रई को हराकर सांसद बन गए. लेकिन उनकी यह ऊंची हैसियत भी उन्हें कानून के शिकंजे से बचा नहीं सकी. संसद के मानसून सत्र में हिस्सा लेने के लिए इन दिनों दिल्ली की तिहाड़ जेल में रह रहे कोड़ा के बारे में उम्मीद की जा रही है कि वे जल्द ही बिरसा मुंडा केंद्रीय कारागार में लौट आएंगे.

झारखंड इस बात का शानदार उदाहरण पेश करता है कि अगर जांच और अभियोजन एजेंसियां उद्देश्यपरक तरीके से काम करें, तो ऊंचे और शक्तिशाली लोग भी कठघरे में खड़े किए जा सकते हैं.

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