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जान की आफत बनी किस्तें

बढ़ती ब्याज दरों ने अपना एक घर बनाने के मध्यम वर्ग के सपने को दुःस्वप्न में बदल दिया है.

अपडेटेड 16 अक्टूबर , 2011

अर्थशास्त्री बिबेक देबरॉय इसे उपभोक्तावाद का उलटा निर्वाण कहते हैं, यानी ऋणों पर बढ़ते मासिक भुगतानों का ऐसा जानलेवा जाल, जो भारतीय मध्यम वर्ग के महान सपने को दुःस्वप्न में बदल रहा है.

मुद्रास्फीति की ऊंची दर को काबू में लाने की लगभग नाकाम कोशिश के तहत भारतीय रिजर्व बैंक 12 मार्च, 2010 से अब तक ब्याज दरों में 12 बार वृद्धि कर चुका है. खामियाजा कर्ज लेने वाले भुगत रहे हैं. पिछले 18 महीनों में गृह ऋण और कार ऋण पर ब्याज दरें 300-350 आधार अंक (3-3.5 प्रतिशत) बढ़ चुकी हैं.

लगता तो यह साधारण गणित है. ब्याज दरों में 25 आधार अंकों (0.25 प्रतिशत) की वृद्धि से 10 लाख रु. के गृह ऋण पर मासिक किस्त में सिर्फ 170 रु. की वृद्धि होती है. लेकिन 350 आधार अंकों की वृद्धि के लगातार बढ़ते प्रभाव का आकलन करने पर नतीजा कर्ज लेने वाले औसत व्यक्ति के लिए मासिक किस्त में हजारों रु. की वृद्धि में निकलता है. चिंतित बैंक अब कर्ज लेने वालों से पूछ रहे हैं कि बढ़ी हुई रकम का भुगतान करने में अगर वे असमर्थ हों, तो क्या अपनी मासिक किस्तों की अवधि बढ़वाना चाहेंगे. पर कई लोगों को यह भी रास नहीं आ रहा.

अपने कार और गृह ऋ णों की किस्तों में हर माह 2,500 रु. से ज्‍यादा की वृद्धि का सामना कर रहे आइटी विशेषज्ञ गौतम दत्ता कहते हैं, ''कर्ज  का चक्र हमारी जान के लिए आफत बन गया है. वित्तीय योजना जैसी तहस-नहस हो गई है. पता नहीं, बैंक मासिक किस्त की दरें कब बढ़ा दें.''

यही हालत हैदराबाद निवासी के. वेणुप्रसाद की है. सितंबर 2010 में 15.29 लाख रु. के ऋण से लिए गए उनके दो बेडरूम के फ्लैट के लिए 9.5 प्रतिशत की ब्याज दर से उन्हें 14,257 रु. की 240 मासिक किस्तें 20 वर्ष में चुकानी थीं. तब 31,000 रु. के मासिक वेतन में मासिक किस्त 46 प्रतिशत बैठती थी. अब वे प्रति माह 15,954 रु. चुकाते हैं, जो उनके वेतन का 53 प्रतिशत है. अगर वे कर्ज 240 किस्तों में चुकाना चाहें, तो रकम होगी 17,000 रु. प्रतिमाह.

देबरॉय कहते हैं कि ब्याज दरों में वृद्धि नए और मौजूदा कर्ज लेने वाले दोनों को चुभेगी और ऊंची ब्याज दरों की इस व्यवस्था में वृद्धि का असर कम करने के लिए कुछ कर सकने की गुंजाइश कर्ज लेने वाले के पास न के बराबर है. देबरॉय कहते हैं, ''हां, अगर बैंक कर्ज लेने वालों को कर्जों के पुनर्भुगतान की अवधि बढ़ाने की इजाजत दें तो बात और है.'' कुछ बैंकर इस पर राजी हो गए हैं. आइडीबीआइ बैंक के मुख्य वित्त अधिकारी पी. सीताराम कहते हैं, ''हमारे ग्राहकों को अगर ऊंची मासिक किस्त चुकाने में मुश्किल आ रही हो, तो उनके पास कर्ज की अवधि बढ़वाने का विकल्प है.''

सितंबर में एक कॉन्फ्रेंस के बाद इंडियन ओवरसीज बैंक के सीएमडी एम. नरेंद्र ने पत्रकारों से कहा, ''मौजूदा हालात में कर्ज की अवधि बढ़वाना सबसे सुरक्षित तरीका है.''

समस्या क्या है? कर्ज की अवधि बढ़वाने से चुकाया गया कुल ब्याज बढ़ जाएगा. ऐसा इसलिए है क्योंकि कर्ज के शुरुआती वर्षों में मासिक किस्त में ब्याज का अंश बहुत ज्‍यादा होता है और किस्त का सिर्फ एक छोटा-सा हिस्सा ही मूल धन चुकाने में जाता है.

बंगलुरू स्थित वित्त विशेषज्ञ अनिल रेगो कहते हैं, ''कर्ज लेने वालों को जितना संभव हो, बैंक को पहले पैसा चुकाने के लिए कड़ी कोशिश करनी चाहिए. लेकिन तब मासिक किस्त ज्‍यादा हो जाएगी. फिर भी अगर यह किया जा सके, तो ब्याज दरें अगले कुछ महीनों में कम हो जाएंगी. तब आप देखेंगे कि ज्‍यादा ब्याज दरों की क्षतिपूर्ति कम ब्याज दरें कर देंगीं.''

अभी बैंक 50 लाख रु. से कम के गृह कर्ज  पर 11-12 प्रतिशत ब्याज ले रहे हैं. देश का सबसे बड़ा कर्जदाता भारतीय स्टेट बैंक 30 लाख रु.  तक के गृह कर्ज पर 11 प्रतिशत और 30 लाख रु. से 75 लाख रु. तक के गृह कर्ज पर 11.25 प्रतिशत  ब्याज ले रहा है. इसी तरह एचडीएफसी बैंक और आइसीआइसीआइ बैंक भी 30 लाख रु. तक के गृह ऋण पर 11 प्रतिशत ब्याज ले रहे हैं. बैंक ऑफ बड़ौदा, आइडीबीआइ और बैंक ऑफ इंडिया सरीखे अन्य बैंक 20 लाख रु. तक के गृह ऋण पर 11.50 प्रतिशत ब्याज ले रहे हैं.

फिक्की के महासचिव राजीव कुमार कहते हैं, ''ब्याज दरों में 325 आधार अंकों की वृद्धि का कुल मिलाकर प्रभाव अधिकांश उपभोक्ताओं के लिए दरअसल चिंता का विषय है.'' वे कहते हैं,  ''उनके पास ब्याज दरों में इस बढ़ोतरी का खामियाजा भुगतने और अपने बजट पर बारीकी से निगाह रखने के अलावा कोई चारा नहीं है.''

मुंबई स्थित क्रेडिट कार्ड ऐंड मैनेजमेंट कंसल्टेंसी के प्रमुख विजय मेहता कहते हैं कि भारत में कई लोग अपने क्रेडिट कार्ड से नकद पैसे निकाल कर बढ़ती हुई मासिक किस्तों का भुगतान कर रहे हैं. यह चीज आगे चलकर अनुत्पादक ऋणों को बढ़ावा दे रही है, जो कुछ बैंकों के लिए बड़ी चिंता का विषय है. मेहता कहते हैं कि बढ़ती हुई मासिक किस्तों से निबटने के इस ढंग से कर्ज लेने के कारण भुगतान न कर पाने की दर-जिसमें पैसा कभी भी नहीं चुकाया जाता है-सभी क्रेडिट कार्ड कंपनियों के लिए 8 प्रतिशत है और वर्ष के अंत तक 10 प्रतिशत के पास पहुंच सकती है.

मेहता कहते हैं, ''अब जिस चीज की जरूरत नहीं है वह है ब्याज दरों में एक और वृद्धि. अगर वह हो गई, तो मासिक किस्तें बहुत चिंताजनक विषय हो जाएंगी. भारतीयों में अपनी हैसियत से बाहर जीवन जीने की प्रवृत्ति होती है और वे हर चीज बहुत कम समय में खरीद लेना चाहते हैं.''

रियल इस्टेट कंसल्टेंट्स नाइट फ्रैंक के प्रमुख प्रणय वकील ने इंडिया टुडे को बताया, ''कुछ लोग कर्ज पुनर्भुगतान करने की अवधि आगे बढ़वा लेंगे, लेकिन अधिकांश लोग शायद ऐसा नहीं कर पाएंगे, क्योंकि समय सीमा का निर्धारण बैंक द्वारा किया जाता है.''

बैंकबाजार डॉट कॉम के सीईओ आदिल शेट्टी का कहना है कि उनके पास एक समाधान है. वे चाहते हैं कि सारे कर्जदार अपने बैंकों से वह तालिका देने का अनुरोध करें, जो कर्ज की बकाया रकम का ठीक-ठीक संकव्त देती हो. उनका कहना है, ''और फिर तब कर्ज लेने वाले फिर से कर्ज लेकर ब्याज का बोझ और किस्तों में चुकाई जाने वाली कुल रकम कम करवा सकेंगे. निस्संदेह कर्ज लेने वालों से फिलहाल जो वसूला जा रहा है, ब्याज की दर निश्चय ही उससे कम होनी चाहिए.''

 

के. वेणुप्रसाद, 30 वर्ष

नौकरी वीडियो एडिटर, हैदराबाद

वार्षिक पैकेज 3,72,000 रु.

मासिक वेतन 31,000 रु.

सितंबर 2010 में 15.29 लाख रु. की लागत के दो बेडरूम के फ्लैट के लिए कर्ज लिया था. उन्होंने 14,257 रु. की मासिक किस्त चुकाई. अब मासिक किस्त कोई 16,000 रु. है.

मैं इसका खर्च जरा भी अधिक नहीं उठा सकता, पर कोई चारा नहीं है. मुझे हर माह किस्त चुकानी है. मैं परिवार के बाकी खर्चों में कटौती कर रहा हूं.

ए. अग्रवाल, 37 वर्ष

रोजगार सीनियर मैनेजर, आइडिया सेलुलर, चंडीगढ़

वार्षिक पैकेज 7,20,000 रु.

मासिक वेतन 60,000 रु.

2010 में 26.50 लाख रु. का गृह ऋण लिया, जिसके लिए उन्होंने 24,500 रु. मासिक किस्त चुकाइं. अब वह बढ़कर 28,500 रु. हो गई है.

मासिक किस्तों के कारण हमें हर तरह के भुगतान में जूझ्ना पड़ रहा है. जिंदगी बहुत दुश्वार हो गई है. मेरी आय को छोड़कर हर चीज बढ़ गई है.

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