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इंदौर: नाकामयाबी की दवा, आसानी से नहीं मिलेगी दवाएं

अपराध रोकने में नाकाम इंदौर पुलिस-प्रशासन ने अपनी नाकामयाबी का ठीकरा दवाइयों पर फोड़ा है. पुलिस ने अनोखा आदेश जारी कर शहर की दवा की दुकानों पर अनिद्रा और अवसाद से जुड़ी पांच तरह की दवाओं को खुले तौर पर बेचने पर न सिर्फ प्रतिबंध लगाया, बल्कि चिकित्सक की मूल पर्ची जमा करने और बिल रिकॉर्ड रखने के आदेश भी दवा विक्रेताओं को दिए हैं.

दवा दुकान
दवा दुकान
अपडेटेड 17 अगस्त , 2011

अपराध रोकने में नाकाम इंदौर पुलिस-प्रशासन ने अपनी नाकामयाबी का ठीकरा दवाइयों पर फोड़ा है. पुलिस ने अनोखा आदेश जारी कर शहर की दवा की दुकानों पर अनिद्रा और अवसाद से जुड़ी पांच तरह की दवाओं को खुले तौर पर बेचने पर न सिर्फ  प्रतिबंध लगाया, बल्कि चिकित्सक की मूल पर्ची जमा करने और बिल रिकॉर्ड रखने के आदेश भी दवा विक्रेताओं को दिए हैं. आदेश की अवहेलना करने वाले विक्रेता के खिलाफ  रासुका की कार्रवाई होगी. 1 अगस्त से लागू कर दिए गए इस अव्यावहारिक आदेश से दवा विक्रेताओं और चिकित्सकों में जहां हैरानी है वहीं मरीजों की मुश्किलें बढ़ गई हैं. सवाल यह भी है कि प्रतिबंध सिर्फ शहरी सीमा तक लगाया गया है जबकि आसपास के क्षेत्र में ये दवाएं आसानी से उपलब्ध हैं.
ये वे दवाएं हैं जिनका इस्तेमाल मधुमेह, हृदयरोग, मनोरोग और दर्द निवारक के रूप में होता है. लेकिन पुलिस का दावा है कि नाइट्रावेट नाम की दवा शहर के युवाओं में अपराध की प्रवृत्ति बढ़ा रही है. इसी दवा की उत्तेजना में ऐसे युवाओं ने हत्याएं तक कर डालीं, जिनका कभी कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं रहा. एंडोक्रिनोलॉजिस्ट डॉ. सुनील एम. जैन कहते हैं, ''रोगियों को ये दवाएं सीमित मात्रा में दी जाती हैं. अत्यधिक मात्रा में इनके सेवन से आक्रामकता बढ़ सकती है.''
रासुका के डर से कई दवा विक्रताओं ने ये दवाएं ही रखनी बंद कर दी हैं. आदेश के मुताबिक दवा विक्रेता चिकित्सक की मूल पर्ची जमा करने लगे हैं जो मरीजों के लिए परव्शानी का सबब है क्योंकि मूल पर्ची विक्रेता जमा कर लेगा तो हर बार दवा खरीदने के लिए पर्ची लिखवानी होगी और हर बार चिकित्सक को परामर्श शुल्क देना पड़ेगा.
शहर में पिछले पांच साल में हुए अपराधों का रिकॉर्ड खंगालने और आरोपियों का मनोविश्लेषण करने के बाद पुलिस ने 12 तरह की दवाओं को खुलेआम बेचने पर प्रतिबंध का प्रस्ताव रखा था. लेकिन शहर के जनप्रतिनिधियों, दवा विक्रेताओं और चिकित्सकों के साथ चर्चा के बाद सिर्फ पांच दवाओं-अल्प्राजोलम, क्लोनजिपाम, डाइजिपाम, नाइट्राजिपाम और लोराजिपाम-की खुले तौर पर बिक्री पर प्रतिबंध लगाया गया. पुलिस के आला अधिकारियों का मानना है कि इससे एक हद तक अपराधों को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी जबकि शहर के करीब 1,500 खुदरा दवा विक्रेताओं और चिकित्सकों का कहना है कि पुलिस को अपनी नाकामयाबी की वजह दवा की पर्ची में ढूंढ़ने पर कुछ हासिल नहीं होने वाला. इंदौर दवा विक्रेता संघ के अध्यक्ष विनय बाकलीवाल कहते हैं कि ये दवाएं ऑपरेशन के दौरान और बाद में दी जाती हैं. ऐसे समय में कई बार नर्स ही दवा की पर्ची बना देती है लेकिन विक्रेता अब यह पर्ची स्वीकार नहीं कर रहे. ऐसे में मरीज दवा के लिए परव्शान हो रहे हैं. नर्सिंग  होम एसोसिएशन की अध्यक्ष डॉ. सुनंदा जैन बताती हैं कि ये दवाएं रजोनिवृत्ति के दौर से गुजर रही महिलाओं को भी दी जाती हैं लेकिन पर्ची पर एक साथ दो-तीन माह की दवा नहीं लिखी जाती. अब मरीज को हर बार पर्ची लेने आना पड़ेगा. हालांकि इंदौर चिकित्सा संघ के अध्यक्ष डॉ. अनिल बंडी कहते हैं कि इससे अपराध रोकने में मदद मिलती है तो उनका पूरा समर्थन पुलिस-प्रशासन के साथ है.
इस मुहिम की अगुआई कर रहे आइजी संजय राणा कहते हैं कि औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम के तहत प्रावधान है कि चिकित्सक की पर्ची के बगैर कुछ खास किस्म की दवाएं नहीं खरीदी जा सकती हैं, वे उसी नियम को सख्ती से लागू कर रहे हैं. यह प्रतिबंध दवा विक्रेताओं और चिकित्सकों की रजामंदी से ही लगाया गया है. हालांकि निगरानी से दिक्कत न हो इसलिए उन्हीं के साथ मिलकर एक जांच दल भी बनाया जा रहा है.

पुलिस-प्रशासन के अनोखे आदेश से हैरान चिकित्सा तंत्र

''कानूनन कुछ खास किस्म की दवाइयां चिकित्सक की पर्ची के बगैर नहीं खरीदी जा सकतीं. हम तो बस उसी कानून को सख्ती से लागू कर रहे हैं.''
संजय राणा, आइजी, इंदौर

दवा या नशे का सामान?
डीएसपी (अपराध शाखा) जितेंद्र सिंह के मुताबिक इन अपराधियों ने अपराध करने से पहले ली थी नाइट्रावेटः
जून, 2011: देशपांडे तिहरे हत्याकांड के आरोपी नेहा वर्मा, राहुल और मनोज.
फरवरी, 2011: राजीव गुप्ता हत्याकांड. आरोपी राहुल टोकनीवाला और डब्बू गुलजार. 
वर्ष 2010: राजेश मालाकार की पत्नी और दो बेटियों की हत्या. आरोपी पापिया, सचिन, राजेंद्र, विजय और सलमान. गुलशन तेजवानी हत्याकांड  के आरोपियों ने भी ली थी दवा.
वर्ष 2010: लाखन जाट ने प्रमुख चौराहों पर लोगों को चाकू से गोदा.
वर्ष 2008: चंदन नगर में छोटा, पायला, राजीक ने चाकूबाजी की.

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