एक नई जगह यानी दिल्ली के ओखला इलाके में एनएससीआइ के प्रदर्शनी मैदान में कला वस्तुओं के प्रदर्शन के लिए 12,000 वर्ग मीटर क्षेत्र में गैर-पारंपरिक ढंग से गाड़े गए तंबू; पूरी तरह से व्यावसायिक अवतार. अनोखे रंग-रूप के साथ इंडिया आर्ट फेयर का चौथा संस्करण. इसकी 31 वर्षीय आयोजक नेहा किरपाल के लिए यह मुसीबत का सबब हो सकता था. मगर दर्शकों की भीड़ को पैमाना मानें (26 से 29 जनवरी के बीच करीब 1 लाख दर्शक पहुंचे) तो किरपाल का खुश होना स्वाभाविक है. इस साल प्रदर्शनी में 20 देशों के 98 प्रदर्शकों ने दुनिया भर के 1,000 से ज्यादा आधुनिक और समकालीन कलाकारों को पेश किया.
8 फरवरी 2012: तस्वीरों में इंडिया टुडे
इस साल की शुरुआत में किरपाल ने इंडिया आर्ट फेयर के 49 फीसदी शेयर आर्ट हांगकांग के दो सह संस्थापकों-सेंडी एंगस और विल रैमसे के बीच बांटकर इसे दुनिया के सबसे बड़े आर्ट फेयर नेटवर्क का हिस्सा बना दिया. 80 फीसदी दीर्घाओं में शिल्पों की बिक्री या इसके प्रति दिलचस्पी, इसके अलावा दुनिया भर के क्युरेटरों, गैलरी वालों और डीलरों के जमावड़े को देखकर कहा जा सकता है कि यह 2012 के कला सत्र की धमाकेदार घटना रही. 50,000 रु. से 50 लाख रु. तक की कलाकृतियों की ठीकठाक बिक्री हुई. हालांकि 4.6 करोड़ रु. कीमत वाली अनीश कपूर की कृति ग्रीन ब्लैक नहीं बिकी. सॉदबी के मैथिली पारेख कहते हैं, ‘खरीदार बेहद समझदार हो गए हैं. अब वे सनक में चीजें खरीदने की बजाए समझदारी से चुनाव कर रहे हैं.’
कला के लिए कुछ भी करेगा फेयर में पहुंचे जेम्स लैवेंडर कहते हैं, ‘जगह बदलते रहने के अपने खतरे हैं. इसका एक मतलब यह भी है कि ऐसे लोग आएं जिनकी आपको सचमुच जरूरत है. ऐसे लोग जिनमें कला के प्रति वास्तविक आकर्षण है.’ मेले में प्रवेश करते ही उनके बूथ हाउजर एंड विर्थ पर सबसे पहले नजर पड़ती थी. पॉल मैकार्थी और मार्टिन क्रीड के साथ भारत के कलाकार दंपत्ति सुबोध गुप्ता और भारती खेर को प्रस्तुत करने वाले लैवेंडर ने 'ठीक-ठाक' कारोबार किया. खेर और गुप्ता दोनों की कृतियों ने एक-एक करोड़ रु. के आसपास कमाई की. फेयर में कुछ लोग हवाई मार्ग से आए तो कुछ ने ट्रेन का सफर चुना. करीब अस्सी की वय के वयोवृद्ध प्रोगेसिव आर्टिस्ट एस.एच. रजा और कला इतिहासकार गीता कपूर जैसे कुछ दिग्गज तो व्हील चेयर और बैसाखी के सहारे यहां पहुंचे. लब्बोलुआब यही कि कला के लिए कुछ भी करेगा.1 फरवरी 2012: तस्वीरों में इंडिया टुडे
मोलतोल का मेला गैलरी मालिक, संग्राहक और हाल ही लेखक बने अभय मस्कारा कहते हैं, ‘दुनिया भर के कलाप्रेमियों तक पहुंचने के लिए कला मेले नए ठिकाने बन गए हैं. लोग हफ्ते भर के लिए इनमें आते हैं, दिनभर खरीदारी और रातभर पार्टीबाजी.’ दिल्ली की रेलीगेयर और एक्जिबिट 320, मुंबई की गैलरी बियॉन्ड और अबू धाबी की सल्वा जेडान सरीखी कला दीर्घाओं ने कीमत 1 लाख से 50 लाख के बीच रखकर बेहतर कमाई की. आखिरी दिन रविवार को हड़बड़ी में मोल-भाव भी हुआ. कुछ महंगी कृतियां 20-30 फीसदी कम पर बेच दी गईं, लेकिन यह ऑफ द रिकॉर्ड था.’अजीबो-गरीब मस्कारा के बूथ में कुछ बड़ी ही अजूबा किस्म की कलाकृतियां प्रदर्शित की गई थीं. इनमें हिरण की बीट से बनी शाइन शिवान की कलाकृति और टी. वेंकाराणा की खुद को संतुष्ट करती उन्मत्त-मादक स्त्रियों जैसी कृतियां शामिल थीं. दोनों कलाकारों की भारी मांग रही और उनके काम पर 1 लाख से 10 लाख रु. के बीच दाम लगे. सिद्धार्थ करारवाल के पट्टियों में लिपटे घुड़सवार महाराजा गायकवाड़ पर दर्शकों की नजरें थमीं. योको ओनो की विश ट्री पर लोगों ने कुछ इस तरह के संदेश लिखेः ‘मैं नहीं चाहता लोकपाल बिल पास हो क्योंकि मैं अच्छी कमाई करना चाहता हूं.’ कुछ अजीबोगरीब नजारे भी दिखे. ऑस्ट्रेलियाई कलाकार पीटर बर्क ने बहुतों का ध्यान खींचा. उन्होंने लोगों के सामने अपना कोट बिछाकर माचिस की डिबिया के आकार की कई कृतियों को पेश किया. इन्हें वे अपनी मोबाइल गैलरी कहते हैं.अब वे नहीं परदेसी25 जनवरी 2012: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
आर्ट 18/21 दीर्घा की लॉरा विलियम्स अब तक तीन बार कला मेले में शिरकत कर चुकी हैं. इसकी पहुंच बढ़ते हुए उन्होंने देखा है. वे कहती हैं, ‘मुझे नहीं लगता कि दुनिया भर की गैलरियां भारतीय कला बाजार के साथ सिर्फ आंख-मिचौली खेलने आई हैं. वे यहां मजबूत रिश्ते बनाना चाहती हैं. ऐसे परिवेश में मैं चाहती हूं कि कलाकृतियों को सीमा पार से लाने-ले जाने में होने वाली कागजी कार्यवाही भी आसान की जानी चाहिए.’ विलियम्स की गैलरी के कलाकार एलेक क्युमिंग्स और इ.जाबेला रॉक ने तो भारत को अपना दूसरा घर ही बना लिया है. इस मेले में यूरोप की कला दीर्घाओं का हिस्सा 26 फीसदी था जबकि 14 फीसदी में उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका, मध्य-पूर्व, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया की गैलरियां थीं. भारत सहित एशियाई गैलरियों ने 57 फीसदी हिस्से पर कब्जा जमाया था.
बाजार का दबदबा कुछ स्वर नाराजगी के भी सुनाई दिए. उभरते संग्राहक परमेश साहनी मेले में 'व्यावसायिक' कलाकृतियों के दबदबे से गुस्से में थे. इस बार भारत की छह बड़ी कला दीर्घाओं-वढेरा, एस्पेस, नेचर मोर्ट, साक्षी और आरुषि तथा दुबई की 1×1-ने बेहद मशहूर रवींद्र रेड्डी के काम को प्रदर्शित किया था. इस बात से समझ जा सकता है कि साहनी शिकायतपूर्ण लहजे में किस ओर इशारा कर रहे हैं. रेड्डी के अलावा एम.एफ. हुसैन, एस.एच. रजा, अंजलि इला मेनन और लक्ष्मा गौड़ की बिकाऊ कृतियों की भी फेयर में धूम दिखाई दी.-साथ में ओलिना बनर्जी

