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अंग्रेजी अब भी है साम्राज्‍य की छत्रछाया में

भारत से ब्रिटेन पूर्वपरिचित है, लेकिन इसकी ऐतिहासिक सीमाएं हैं. अंग्रेजी लेखन को ब्रिटिश संरक्षण हासिल है, लेकिन अधूरे ज्ञान की वजह से अकसर सर्वश्रेष्ठ भारतीय अंग्रेजी लेखन दुरूह बन जाता है.

अपडेटेड 5 जून , 2012

एक बार मेरे एक अरब दोस्त ने मुझसे कहा था कि अगर अरब की धरती से तेल खत्म हो जाए, तो इससे बढ़िया वहां के लिए कुछ नहीं हो सकता. ठीक उसी तर्ज पर कह सकते हैं कि भारत में आज रचे जा रहे अंग्रेजी साहित्य के लिए इससे अच्छा कुछ नहीं हो सकता कि उसे सदाशयी ब्रिटिश संरक्षण मिलना बंद हो जाए.

सलमान रुश्दी और विक्रम सेठ के लेखन के बाद से ही ब्रिटिश प्रकाशकों ने भारत में किए जा रहे अंग्रेजी लेखन को गंभीरता से लेना शुरू किया. इस बात को महज तीन दशक हुए हैं, लिहाजा ऐसी कोई भी बात कहना जल्दबाजी होगी. ब्रिटिश प्रकाशकों के बाद दूसरे 'अंतरराष्ट्रीय' प्रकाशक (अमेरिकी भी) भी भारतीय अंग्रेजी लेखकों को गंभीरता से लेने लगे. नतीजतन, पहली बार ऐसा हुआ कि 'भारतीय' लेखन आर.के. नारायण, राजा राव या अनिता देसाई से पूर्वपरिचित मुट्ठी भर समझदार पाठकों (ब्रिटिश, अमेरिकी, भारतीय और अन्य) के दायरे से बाहर निकला और उसने ग्लॉसी पत्रिकाओं के सोसाइटी पन्नों और किताब की दुकानों की रैक पर अपनी जगह बनाई. इसके बाद प्रमुख अंतरराष्ट्रीय और ब्रिटिश प्रकाशन एजेंटों को भारतीय अंग्रेजी लेखन को देखने के लिए अपने पैमाने बदलने पड़े.

इस प्रक्रिया में कुछ अभिजात और युवा भारतीय लेखकों ने ब्रिटिश और अमेरिकी एजेंटों का चक्कर लगाना शुरू किया और बड़ी सावधानी से उनके संपादकों के साथ सहानुभूतिपूर्ण संपर्क कायम किया. बदले में ब्रिटिश एजेंट और साहित्य संपादकों का भारत आना शुरू हुआ, जो आज जयपुर में होने वाले सालाना साहित्यिक महोत्सव में तब्दील हो चुका है. पिछले कुछ दशकों में जिस तरीके से अलग-अलग राष्ट्रीयताओं में बंधे इस अभिजात सामाजिक तबके पर बहस का खात्मा हुआ है, उसने इनकी एकता को मजबूत करने में मदद की है.

यह एकता सच्ची दिखती थी, तो आंशिक तौर पर इसलिए भी क्योंकि ब्रिटेन और हिंदुस्तान के पुराने रिश्ते हैं. इस मामले में ब्रिटिश अमेरिकियों से अलग हैं क्योंकि अमेरिका के भारत से पुराने संबंध नहीं रहे हैं. दरअसल, अमेरिकियों का सरोकार अमेरिका से ही होता है. उन्हें भारत के अंग्रेजी लेखन से उतनी ही उम्मीद हो सकती है जितनी किसी और देश में लिखे जा रहे अंग्रेजी साहित्य से.

ब्रिटेन में तस्वीर जरा अलग है. वहां लोग भारत में लिखे जा रहे अंग्रेजी साहित्य से उम्मीद करते हैं. उसे लगता है कि वह भारत को जानता है. यह सही भी है, लेकिन इसकी ऐतिहासिक सीमाएं हैं. भारतीय अंग्रेजी लेखन को ब्रिटिश संरक्षण हासिल है, लेकिन इसी अधूरे ज्ञान की वजह से भारत में रचा जा रहा सर्वश्रेष्ठ अंग्रेजी साहित्य दुरूह बन जाता है.

यह दुधारी तलवार है जो दोनों तरफ से हमारे सर्वश्रेष्ठ को काट-छांट देती है. समस्या सिर्फ इतनी नहीं कि अच्छे भारतीय लेखकों की उपेक्षा कर दी जाती है क्योंकि वे ब्रिटिश साहित्य और राष्ट्रीयता के नजरिए में फिट नहीं बैठते, बल्कि होता यह है कि ब्रिटेन की नजर में बेहतरीन भारतीय लेखक अकसर गलत वजहों से भारत में ही खारिज कर दिए जाते हैं. यह लोकरंजक साहित्य को उतना प्रभावित नहीं करता जितना गंभीर लेखन कोः यही एक वजह है कि मैं चेतन भगत जैसे भारतीय लेखकों को ज्‍यादा तवज्‍जो देता हूं क्योंकि वे ब्रिटिश संरक्षण के मोहताज नहीं. चाहें भी तो नहीं हो सकते. इसकी जरूरत गंभीर साहित्य लिखने वालों को है, लेकिन विडंबना है कि उन्हें यह छत्रछाया नहीं मिल पाती.

पश्चिम की ओर देखने वाली भारतीय प्रवृत्ति यदि बुरी है, तो अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य कहीं बदतर है. मुट्ठी भर भारतीय लेखकों को जितनी तवज्‍जो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मिल जाती है, उसका छटांक भर भी शशि देशपांडे जैसे बेहतरीन और वरिष्ठ लेखकों को नसीब नहीं क्योंकि वे ब्रिटिश संरक्षण के अनुकूल विचार वाला लेखन नहीं करते.

इसके अलावा, बड़े ब्रिटिश एजेंटों को भारतीय साहित्यिक एजेंटों के अधीन रह कर काम करना मंजूर नहीं जबकि अमेरिका में ऐसा नहीं है. क्या यह औपनिवेशिक वर्चस्व की देन है-खासकर भारत के अभिजात तबकों के बीच-और एक चाहत कि दक्षिण एशिया में अंग्रेजी भाषा प्रकाशन के भद्र दायरे में सांस्कृतिक संरक्षक के तौर पर ब्रिटेन की स्थिति जस की तस बनी रहे? या फिर इसलिए कि ब्रिटेन छोटे-छोटे द्वीपों का एक ऐसा समूह है जहां विभिन्न भाषाओं के साहित्यिक प्रकाशन का बाजार अब बचा नहीं, खासकर तब जब कॉर्पोरेट शैली के इस कारोबार में खर्चे आसमान छू रहे हैं? वास्तव में ब्रिटिश एजेंटों और प्रकाशकों को राष्ट्रमंडल के देशों का बाजार ही चाहिए (जिनमें भारत सबसे बड़ा है) ताकि वे प्रकाशन गतिविधियों से मुनाफा कमा सकें. ऐसे प्रकाशन में निश्चित तौर पर वह 'अंतरराष्ट्रीय' कचरा शामिल नहीं है जिसे ब्रिटिश प्रकाशक 'सस्ते' में लाकर भारतीय बाजारों में पटक देते हैं.

भारतीय अंग्रेजी लेखन अब रचनात्मक और आलोचनात्मक दोनों ही दृष्टि से परिपक्व हो चुका है, लिहाजा उसे व्यावसायिक और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आत्मनिर्भर बनने की जरूरत है. भारत में ऐसे लेखक हैं जो अपने तईं हर संभव प्रयास कर रहे हैं. ऐसे आलोचक भी मौजूद हैं जो इन लेखकों को पढ़ते हैं.

समस्या उन भारतीय बुद्धिजीवियों, टीवी पत्रकारों, ग्लॉसी परिशिष्टों के संपादकों, फैशनपरस्त किताबघरों और अभिजात मेजबानों की है जो अब भी पूंछ हिलाने की अपनी औपनिवेशिक आदत से निजात नहीं पा सके हैं. वक्त आ गया है कि भारत में रचे जा रहे अंग्रेजी साहित्य को सार्वजनिक स्थलों पर ज्‍यादा जगह मिले ताकि भारतीय पाठक अपने विवेक से पढ़ने का फैसला कर सके और उसे किसी पुस्तक पर ब्रिटिश मुहर की दरकार न रहे.

ताबिश खैर का नया उपन्यास है हाउ टु फाइट इस्लामिस्ट टेरर फ्रॉम द मिशनरी पोजीशन.

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