आम जनता में अपनी दबंगई से खौफ पैदा करने वाले जेल के नाम पर रोगग्रस्त हो जाते हैं. वर्षों से दबी बीमारी अचानक उभर आती है. जून माह में ऐसे ही दो प्रभावशाली लोगों पर कानून का शिकंजा कसा.
लखनऊ में समाज कल्याण विभाग के लिपिक सैफी की हत्या की साजिश रचने के आरोपी बसपा नेता और पूर्व राज्यमंत्री इंतजार आब्दी को पुलिस ने गिरफ्तार किया ही था कि उनके सीने में तेज दर्द शुरू हो गया. आनन-फानन में वे बलरामपुर अस्पताल लाए गए. डॉक्टरों ने स्वास्थ्य परीक्षण कर बसपा नेता को आइसीसीयू में भर्ती कर दिया.
बाद में कोर्ट सख्त हुआ तो आब्दी अस्पताल से जेल भेज दिए गए. यहां फिर उनकी तबीयत बिगड़ी और दोबारा बलरामपुर अस्पताल में लाए गए. यही नहीं, सीतापुर में हुए करोड़ों के खाद्यान्न घोटाले के आरोपी पूर्व सपा विधायक ओमप्रकाश जैसे ही सीबीआइ के रडार पर आए, बीमार हो गए. उनके भी सीने में तेज दर्द हुआ. चिकित्सा विवि के लारी कार्डियोलॉजी में भर्ती हुए.
सीबीआइ ने विधायक को रिमांड पर लेने के लिए कोर्ट में दो बार अर्जी दी, पर हर बार डॉक्टरों ने उनके खराब स्वास्थ्य को ढाल बना दिया. सीबीआइ ने दबाव बढ़ाया तो ओमप्रकाश को तुरंत अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया. आब्दी के मामले में कोर्ट ने कड़ा रुख दिखाया तो मामले से परदा हटा.
अस्पताल प्रशासन ने उनकी जो मेडिकल रिपोर्ट पेश की, उसमें उन्हें ब्लड प्रेशर और दिल की असामान्य धडक़न जैसे रोगों से ग्रस्त बताया. फिर भी उनके भर्ती होने के 48 घंटे से अधिक बीत जाने के बाद भी उनकी कोई जरूरी जांच नहीं कराई गई.
इलाज के पुराने पर्चे के आधार पर ही उन्हें हृदय रोगी करार दे दिया गया. मेडिकल रिपोर्ट के प्रति गंभीर रुख लेते हुए अदालत ने आब्दी का इलाज जेल अस्पताल में करने का आदेश देते हुए मुख्य चिकित्साधिकारी को निर्देश दिया कि वे तीन डॉक्टरों की एक टीम बनाकर आब्दी के स्वास्थ्य का परीक्षण करें और रिपोर्ट अदालत में पेश करें.
हालांकि बलरामपुर अस्पताल के निदेशक डॉ. शोभनाथ का कहना है, ''आब्दी वाकई बीमार हैं और उन्हें पीजीआइ में भर्ती कराया जा रहा है, जहां उन्हें एंजियोग्राफी करानी पड़ सकती है.'' पर इस बसपा नेता की तबीयत पहली बार खराब नहीं हुई है.
पिछले साल सीबीसीआइडी जांच के बाद पुलिस ने जब उन्हें कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा-जोशी का घर जलाने के मामले में गिरफ्तार किया था तो भी उनके सीने में दर्द होने पर उन्हें बलरामपुर अस्पताल में भर्ती कराया गया था.
इस मामले में चिकित्सकों का दावा भले ही सही हो, पर अपराधियों और डॉक्टरों के इस 'गठजोड़' की पूरी सूची है. बीते वर्षों में जेल जाते ही कई अपराधियों ने अस्पतालों का दामन थामा. इनमें से कई को तो ऐसे रोग हुए जिनके इलाज के लिए अस्पताल की जरूरत ही नहीं पड़ती. 2006 में माफिया लल्लू यादव को जेल जाना पड़ा तो अवसाद से ग्रस्त हो गया.
कई दिन तक वह चिकित्सा विवि के मानसिक रोग विभाग में भर्ती रहा. इससे पूर्व मधुमिता हत्याकांड की अभियुक्त मधुमणि भी अवसाद के चलते यहीं भर्ती कराई गई थी. बड़ों-बड़ों को डराने वाले माफिया डॉन ओमप्रकाश श्रीवास्तव उर्फ बबलू को अंधेरे से डर की बीमारी ने जकड़ लिया था, जिसे डॉक्टरों ने हुएग्रोरा फोबिया' नाम दिया.
इसके इलाज के लिए बबलू को बरेली जेल से चिकित्सा विवि लाया जाता था. उधर, मधुमिता हत्याकांड के अभियुक्त अमरमणि त्रिपाठी का चिकित्सा विवि में लंबे समय तक दांत के दर्द का इलाज चलता रहा तो दबंग विधायक मुख्तार अंसारी भी कमर में तेज दर्द की शिकायत लेकर जेल से चिकित्सा विवि के हड्डी रोग विभाग के चक्कर लगाते रहे.
इसी साल उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास निगम के मुख्य अभियंता पद पर तैनात रहे अरुण कुमार मिश्र पर करोड़ों रु. के घोटाले और मनी लांड्रिंग के आरोप में सीबीआइ का फंदा कसा तो वे घबराहट, सीने में तेज दर्द की शिकायत लेकर देहरादून के जिला अस्पताल में भर्ती हो गए. मई माह में लखनऊ विकास प्राधिकरण के पूर्व संयुक्त सचिव श्रीपाल वर्मा वित्तीय अनियमितता के गंभीर आरोप में गिरफ्तार हुए तो उन्हें भी सीने में दर्द की शिकायत पर बलरामपुर अस्पताल में भर्ती कराया गया था. सख्ती के चलते उन्हें जेल वापस भेजा गया तो वे जेल के अस्पताल में भर्ती हो गए.
जेल के अस्पतालों में बंदियों के साथ डॉक्टरों के दोहरे व्यवहार का सच खुद जेल प्रशासन ने ही खोला. वर्मा के भर्ती होने के बाद लखनऊ जिला कारागार के वरिष्ठ जेल अधीक्षक एस.एच.एम. रिजवी ने अदालत और मानवाधिकार आयोग को पत्र लिखकर जेल में तैनात चिकित्सकों की करतूतों की जानकारी दी.
पत्र में बताया गया था कि रसूखदार कैदी बीमारी के नाम पर कारागार अस्पताल में भर्ती होकर मौज से रहते हैं. इस गोरखधंधे में डॉक्टर कैदियों की हर तरीके से मदद करते हैं. डॉक्टर लालच में आकर बंदियों को भर्ती कर लेते हैं और फिर उनसे वसूली करते हैं. इस पत्र पर अदालत ने गंभीर रुख अख्तियार किया और मेडिकल बोर्ड बनाकर उसकी संस्तुति के आधार पर ही बंदियों को अस्पताल में भर्ती करने का आदेश दिया. मानवाधिकार आयोग ने भी मामले की जांच कराई तो दो डॉक्टरों की भूमिका संदिग्ध पाए जाने पर उन्हें जेल से हटाने के निर्देश दिए.
ऐसा नहीं कि सरकार ने जेल में बंद कैदियों को अस्पताल में भर्ती करने के नियम नहीं बनाए हैं. 2007 की शुरुआत में शासन ने जेल जाते ही बीमार पड़ जाने वाले अपराधियों के मामले में सख्त रुख अपनाया. जेल में बंद माफिया और प्रभावशाली लोगों के इलाज के लिए सख्त निर्देश जारी किए गए. इनमें कहा गया कि माफियाओं के सरकारी अस्पताल, मेडिकल कॉलेज और अन्य चिकित्सकीय संस्थानों के निजी और सुविधापूर्ण वातावरण में इलाज कराने की प्रथा पर प्रभावी नियंत्रण लगाया जाए.
स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी के मुताबिक, सभी जिलों के सीएमओ और जेल अधीक्षकों से कहा गया कि जेल में बंद माफिया को किसी तरह की बीमारी होने पर जेल के अस्पताल में ही उनका इलाज कराया जाए. यदि कोई कैदी गंभीर रूप से अस्वस्थ है और उसका इलाज जेल परिसर में हो पाना संभव नहीं है तो सीएमओ की बनाई डॉक्टरों की टीम उसका परीक्षण करेगी.
इसके बाद जरूरी होगा तो ही जेल के बाहर कैदी के इलाज की व्यवस्था की जाएगी. इस सुविधा का दुरुपयोग न हो, इसके लिए जेल से गंभीर हालत में अस्पताल आने वाले हर कैदी की सूचना जेल प्रशासन के महानिरीक्षक (जेल) को उपलब्ध कराने की बात भी थी. हकीकत यह है कि किसी भी जिले में इस नियम का पालन नहीं हो रहा है.
पूर्व पुलिस महानिदेशक यशपाल सिंह मानते हैं, ''कारागार अस्पताल या बाहर भर्ती होने वाले करीब 90 फीसदी कैदियों की मेडिकल रिपोर्टें गलत होती हैं.'' ऐसा प्रभावशाली कैदियों के साथ मिलकर डॉक्टर उन्हें फायदा पहुंचाने के लिए करते हैं. चूंकि अभी तक ऐसा करने वाले डॉक्टरों या जेल प्रशासन पर कोई सख्त कार्रवाई नहीं हुई है ऐसे में गड़बडिय़ां लगातार जारी हैं.
सूत्रों के अनुसार, जब भी कोई प्रभावशाली बंदी जेल भेजा जाता है तो उसकी तुरंत दो जरूरतें होती हैं. एक, लेटने के लिए पलंग और दूसरी अच्छा खाना. ये चीजें जेल में मौजूद डॉक्टर मुहैया करा सकता है, जो कैदी को बीमार दिखाकर कारागार के अस्पताल में भर्ती कर लेता है. इससे न केवल कैदी को लेटने के लिए पलंग मिल जाती है बल्कि अच्छा भोजन भी मिलने लगता है.
रसूखदार कैदियों को ऐसी सुविधाएं मुहैया कराने के एवज में डॉक्टर खूब ऊपरी कमाई करते हैं. पर जेल में तैनात रहे डॉ. ए.के. शर्मा चिकित्सकों पर लगने वाले ऐसे आरोपों से पूरी तरह इत्तफाक नहीं रखते. वे कहते हैं, ''जेल में डॉक्टर की ड्यूटी दोधारी तलवार की तरह है. यदि कोई कैदी जेल पहुंचने के बाद सीने या पीठ में भीषण दर्द की शिकायत करता है तो कारागार में डॉक्टर के पास ऐसा कोई उपकरण नहीं मौजूद होता जिससे वह इस बात का पता लगा सके कि कैदी की तकलीफ सही है कि नहीं.
अगर ऐसे कैदी को अस्पताल में न भर्ती करें और बाद में उसकी तकलीफ और बिगड़ जाए तो पूरा दोष डॉक्टर पर ही मढ़ दिया जाएगा. ऐसे में ज्यादातर मामलों में बीमारी की शिकायत करने वाले कैदी को अस्पताल में 48 घंटे तक निगरानी में रख लेते हैं. इस दौरान जरूरी जांच करवा ली जाती हैं. डॉक्टर के इस तरीके को जेल के अिधकारी शक की निगाह से देखते हैं.''
वैसे, एक वरिष्ठ जेल अधीक्षक डॉक्टरों के इन तर्कों से सहमत नहीं. वे कहते हैं, ''अस्पताल में भर्ती होने वाले ज्यादातर कैदियों की बीमारी ही उन्हें शक के दायरे में लाती है. ऐसे कैदियों को सीने में दर्द, पीठ या रीढ़ की हड्डी में दर्द और कई बार हीमेच्यूरिया (पेशाब के साथ खून आना) जैसे लक्षण ही प्रकट होते हैं. चूंकि कारागार के अस्पतालों में जांच की सुविधा नहीं होती ऐसे में डॉक्टरों की रिपोर्ट पर भरोसा करने के अलावा कोई चारा नहीं होता.''
महानिरीक्षक जेल वी.के. गुप्ता बताते हैं कि सामान्य स्थिति में किसी कैदी को इलाज के लिए जेल से बाहर भेजने से पहले चिकित्सक को कारागार अधीक्षक, डीआइजी और संबंधित न्यायालय की अनुमति लेनी पड़ती है.
जब चिकित्सक बीमार कैदी को आपात स्थिति में तुरंत इलाज की व्यवस्था करने को कहता है तब पूर्व निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया जाता क्योंकि रोगी की जान बचाना पहली प्राथमिकता होती है. गुप्ता कहते हैं, ''जेल में डॉक्टर के सिवा कोई व्यक्ति नहीं होता जो कैदी की बीमारी की पड़ताल कर सके. ऐसे में डॉक्टर की रिपोर्ट पर विश्वास करने के अलावा कोई चारा नहीं रहता. बंदी की गलत मेडिकल रिपोर्ट तैयार करने पर डॉक्टर के खिलाफ कार्रवाई की जाती है.''
पर प्रांतीय चिकित्सा सेवा संघ के पदाधिकारी मानते हैं कि जेल में काम करने वाले चिकित्सकों को भारी दबाव का सामना करना पड़ता है. मनचाही मेडिकल रिपोर्ट लिखने के लिए प्रभावशाली कैदियों का 'प्रेशर' रहता है. यही वजह है कि बहुत सारे डॉक्टर जेल अस्पताल में तैनात नहीं होना चाहते.
बहरहाल, कोई चाहे कुछ भी कहे, पर इतना तय है कि उत्तर प्रदेश की जेलों के अस्पताल रसूखदारों की आरामगाह बनते जा रहे हैं. जब तक सरकार कुछ कड़े फैसले नहीं करती यह व्यवस्था सुधरने वाली नहीं है.

