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लॉकडाउन डायरीः कोरोना के चक्कर में कटने लगे जशपुर के जंगल

छत्तीसगढ़ के जशपुर में लॉकडाउन की खबरों की बीच गांववालों ने तेजी से जंगल काटना शुरू कर दिया है. उनको डर है कि खाना पकाने वाली गैस की कमी से उनको रोटी-भात पकाने की दिक्कत न दरपेश हो

फोटोः जशपुर वन विभाग
फोटोः जशपुर वन विभाग
अपडेटेड 30 मार्च , 2020

अंकिता जैन/ लॉकडाउन डायरीः तीन

वह लॉकडाउन का तीसरा दिन था.

घरों में लोग कैद के दो बिताने के बाद ऊबने लगे थे. राशन-पानी की चिंता सता रही थी. एक तरफ जहां सड़कों पर सन्नाटा अपनी जड़ें पसार रहा था. वहीं छत्तीसगढ़ के जशपुर के आसपास के जंगलों में हलचल बढ़ रही थी.

मुझे यह ख़बर मिली कि गांव-के-गांव जंगल काटने उमड़ पड़े हैं. मजदूर वर्ग, घरों और खेतों में काम करने वाली रेजा लोग, और उनके परिवारों को जब काम से छुट्टी दे दी गई तो वे शुरू के एक दिन तो अपने घरों में बैठे. कुछ बीमारी के डर से कुछ पुलिस के. दिनभर मेहनत-मजूरी करने का आदि यह वर्ग दूसरे दिन अपने लिए काम खोजने लगा.

साथ ही उनकी एक और चिंता थी. चूल्हा जलाने की चिंता.

फ़ोरेस्ट डिपार्टमेंट को जब बड़े स्तर पर लकड़ी कटाई की ख़बर मिली तो इसे कई जगह जाकर रोका गया और लकड़ियां पकड़ाई भी गईं. अचानक ही लकड़ी काटने को लेकर सामने आई इस बात पर जब गांव के लोगों से बातचीत हुई और मूल बात जाननी चाही तो दो तरह की बातें सामने आईं. इनमें कुछ वे लोग थे जो बंदी के दिनों के लिए घर में भरपूर लकड़ी भर लेना चाहते थे. और कुछ वे लोग भी थे जो बंदी के बाद इन लकड़ियों को बेचकर थोड़ा कमा लेना चाहते थे. यह सब सोचते हुए मुझे अपनी हाउस-हेल्प की बातें याद आईं.

18 मार्च को जब वह काम पर नहीं आई तो मैंने उसे फ़ोन किया. पूछा, “सब ठीक है ना?”

वह बोली, “सब ठीक है भाभी लेकिन अब कुछ दिन काम पर नहीं आउंगी”.

मैंने पूछा “क्यों?” तो वह कुछ देर के लिए ख़ामोश हो गई

फिर अपने भाई को फ़ोन थमा दिया. उसका भाई बोला भाभी घर में कोई नहीं है. लकड़ी-उकड़ी काटने कौन जाएगा? अभी हफ़्ता-दस दिन नहीं आएगी. मैंने पूछा ये तो तीन महीने से यहां काम कर रही है. अब तक कौन जाता था लड़की काटने? तो वह चुप हो गया. फिर इसी तरह घुमा-फिराकर बातें कीं और ना आने का कहकर फ़ोन रख दिया.

मुझे याद आया कि वह दो-तीन दिन पहले ही कोरोना के बारे में पूछ रही थी. वह जशपुर से करीब 80 किलोमीटर दूर एक बहुत छोटी सी बस्ती की रहने वाली है (जशपुर के आसपास के आदिवासी ग्रामीण इलाकों को गांव की जगह बस्तियां या टोली कहा जाता है).

ये वे लोग हैं जिनकी बस्तियों में बंदी की, और एक ‘शहरी बीमारी –अमीरों वाली बीमारी’ फ़ैलने वाली है, ऐसी ख़बरों की सुगबुगाहट जनता कर्फ्यू या लॉकडाउन के सरकारी ऐलान से पहले ही होने लगी थी. अब इन लोगों के सामने समस्या थी कि आगे क्या किया जाए?

यह आदिवासी ग्रामीण इलाका है. जिनके घरों में आज भी चूल्हा लकड़ी से जलता है. एक तबका जहां बंदी में समय कैसे काटेगा उसकी चिंता कर रहा था, वहीं ग्रामीण अंचल के इन लोगों को जब ख़बर मिलने लगी तो इनके सामने राशन के अलावा उसे पकाने की भी चिंता थी. उज्ज्वला योजना के बाद भी ये लोग गैस पर नहीं चूल्हे पर खाना बनाना पसंद करते हैं. उसकी कुछ ख़ास वजहें यह हैं कि, एक तो गांव वालों को गैस पर काम करने की आदत नहीं होती, कुछ को इस्तेमाल करना नहीं आता, उनके पास उस तरह के बरतन नहीं होते, दूसरा उन्हें चूल्हे पर पके भोजन के आगे गैस पर पके भोजन में स्वाद नहीं लगता. अतः गैस का इस्तेमाल यदाकदा होता है. यहाँ के कई घरों में देखा जा सकता है कि गैस चूल्हा और सिलिंडर साज-सज्जा का सामान बनकर रह गए हैं.

चूल्हे की लकड़ी के लिए ये गाँव वाले जंगलों पर निर्भर हैं. क्योंकि यह इलाका सतपुड़ा का घने जंगल वाला इलाका है और यहां के कई गांव और बस्तियां इन्हीं जंगलों के बीच बसे हैं. इसलिए वे लोग जंगल से पत्ते-लकड़ी लाते हैं और उसी पर खाना पकाते हैं.

कुछ घरों में जिनमें खाना गैस पर पकता भी उनसे पूछा जब कि आपको इस लॉकडाउन में गैस मिल रही है तो उनमें से कुछ ने शिकायत की, कि उनका नंबर तो था लेकिन सिलिंडर मिला मिला नहीं. उन्हें शक़ है कि बांटने वालों ने उन्हें देने की जगह ऊंचे दाम पर जमाखोरों को बेच दिया. ऐसे में वे लोग लकड़ी के ही सहारे हैं.

लॉकडाउन में रोज़ जंगल जाकर लकड़ी लाने की समस्या आई. पुलिस जगह-जगह लगी है. घरों से निकलने नहीं दिया जा रहा. इसलिए जो गांव और बस्तियां सड़क या कस्बों के आस-पास हैं वहां के लोग तो जंगल नहीं जा पाए, लेकिन जो लोग जंगलों के किनारे रहते हैं उन्हें अचानक ही झुण्ड में जंगलों में पाया गया.

अभी वन विभाग और गांववालों के बीच जंगल की लकड़ी काटने को लेकर तनातनी चल रही है. अधिकांश गांववालों ने शायद कुछ दिनों के लिए लकड़ी जमा कर ली है, पर जंगल काटने का काम बदस्तूर चल रहा है. मुमकिन है कि कुछ मौकापरस्त लोग इस मसले के बीच अपने लिए फायदा कमाने की जुगत में भी हों. दूसरी तरफ, स्थानीय प्रशासन यह कोशिश कर रहा है कि राशन के अलावा सिलिंडर को ठीक तरह से बिना किसी कालाबाज़ारी के बांटा जाए.

(अंकिता जैन वैदिक वाटिका की निदेशक और सीडैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस विभाग में एक्स रिसर्च एसोसिएट और साहित्यकार हैं. जशपुर से उन्होंने यह लॉकडाउन डायरी लिखी है. यहां व्यक्त विचार उनके अपने हैं और उससे इंडिया टुडे की सहमति आवश्यक नहीं है)

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