न तो 9 मई को कोई खास बात थी, और न ही उस हेलिकॉप्टर में ऐसी कोई खूबी थी जिससे हम रांची से सरायकेला-खरसावां जिले के कुचाई स्थित एक पावर सब-स्टेशन के उद्घाटन के लिए जा रहे थे. लेकिन 70 मिनट बाद ही उसने जीवन को देखने के मेरे नजरिए को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया.
मेरे साथ चल रही मेरी पत्नी मीरा हेलिकॉप्टर में मेरे बगल वाली सीट पर ही बैठी हुई थीं. विधायक बरकुंअर गगरई और सुरक्षा अधिकारी मनोज कुमार हमारे सामने की सीटों पर बैठे हुए थे. हमारी 25 मिनट की उड़ान पूरी तरह सामान्य रही, लेकिन हेलिकॉप्टर कुचाई पर उतर नहीं पाया तो हमें तुरंत पता चल गया था कि उसमें कोई गंभीर गड़बड़ी पैदा हो गई है. कुचाई में जब पायलटों ने उसे उतारने की कोशिश की तो हेलिकॉप्टर अचानक ही दाईं ओर घूम गया. वे उसे वापस ऊंचाई पर ले गए और उतारने की एक और कोशिश की. इस बार भी हेलिकॉप्टर तेजी से दाईं ओर को मुड़ गया. लेकिन उतर नहीं सका.
दोनों पायलटों-विपुल कुमार सिंह और जीपीएस कौशिक ने मेरी तरफ इशारा किया कि मैं हेडफोन लगा लूं. उन्होंने मुझे बताया कि हेलिकाप्टर की पूंछ पर लगे रडर में कोई गंभीर समस्या पैदा हो गई है. यह रडर ही हेलिकॉप्टर की दिशा को स्थिरता देता है. वे चाहते थे कि वापस रांची लौटा जाए, जहां सही लैंडिंग न होने के बावजूद हमें तुरंत मदद उपलब्ध हो सकती है, और वे इसके लिए मेरी अनुमति चाहते थे.
मैंने उनकी समझ पर भरोसा जताया और उनसे कहा कि वे जैसा उचित समझें, उस तरह से इस स्थिति से निपटें. जब मैंने पायलटों को रांची के एयर ट्रैफिक कंट्रोलर (एटीसी) से बात करते हुए सुना, उस समय सुबह के 11:50 बजे थे. पायलट एटीसी को अपनी समस्या से रू-ब-रू करा रहे थे और रांची लौटने की योजना के बारे में बता रहे थे.
उन चार यात्रियों में से सिर्फ अकेला मैं ही यह जानता था कि हेलिकॉप्टर में गंभीर गड़बड़ी पैदा हो चुकी है. उसी समय मेरे दिमाग में अतीत में हुई हेलिकॉप्टर दुर्घटनाओं की बातें घूमने लगीं. अक्तूबर, 2011 में झारखंड में इसी तरह की गड़बड़ी के बाद बीएसएफ के हेलिकॉप्टर के साथ हुई दुर्घटना मुझे अच्छी तरह याद थी, जिसमें हेलिकॉप्टर पर सवार तीनों लोग मारे गए थे. मुझे अरुणाचल के मुख्यमंत्री दोरजी खांडू और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाइ.एस. राजशेखर रेड्डी के साथ हुए हादसे भी बखूबी याद थे, दोनों ही हेलिकॉप्टर दुर्घटनाओं में मारे गए थे. मुझे ऐसा एक भी इनसान याद नहीं आ सका, जो हेलिकॉप्टर हादसे में जिंदा बच सका हो.
मेरी पत्नी के घबराए हुए सवालों ने मुझे मेरे विचारों की दुनिया से बाहर निकाला. उन्होंने कहा कि हम वापस रांची लौट रहे हैं और हेलिकॉप्टर स्थिर नहीं लग रहा है. मैंने उनसे कहा कि चिंता की कोई बात नहीं है और ऐसा मेरे साथ पहले भी हो चुका है. पायलट एटीसी से कह रहे थे कि 15 मिनट के भीतर बिरसा मुंडा एयरपोर्ट का रनवे पूरी तरह खाली करवा लिया जाए.
इसके लिए एक शेड्यूल्ड उड़ान के रूट को बदला गया. मैंने उनकी बातचीत में कोई दखलंदाजी नहीं की. एक बार भी नहीं. लेकिन उम्मीद की कोई किरण नजर नहीं आ रही थी. हेलिकॉप्टर अब भी बुरी तरह हिचकोले खा रहा था और अन्य कई तरह की चुनौतियां भी मौजूद थीं. मुझे हिम्मत का प्रदर्शन करना था, लेकिन रांची जैसे-जैसे नजदीक आता जा रहा था, सब कुछ उतना ही मुश्किल होता जा रहा था.
तय बात थी कि मैं मीरा को बहुत देर तक मुगालते में नहीं रख सकता था. बिरसा मुंडा एयरपोर्ट पर बचाव दस्ता और दमकल की गाड़ियां उन्हें भी नजर आ रही थीं. वे थोड़ा घबरा गई थीं और उन्होंने सब कुछ भाग्य भरोसे छोड़ दिया. उन्होंने मुझसे कहा कि मैं परिवार में किसी को फोन करके कहूं कि वह हमारे तीन बच्चों का ख्याल रखे. भावुक होना और वह फोन करना आसान था, जो उस समय महत्वपूर्ण नजर आ रहा था. लिहाजा मैंने अपना मोबाइल फोन बंद कर दिया, क्योंकि ऐसा फोन करते ही बाकी यात्रियों में भी यही करने की इच्छा जोर मारने लग जाती, जिससे पायलट घबरा सकते थे.
पायलट हेलिकॉप्टर को जमीन पर उतारने की कोशिशों में लगे थे और कम-से-कम छह चक्कर लगा चुके थे. वे यह भी चाहते थे कि क्रैश लैंडिंग करने से पहले सारा ईंधन खर्च कर दिया जाए, ताकि विस्फोट होने का जोखिम कम-से-कम हो सके. हम जमीन पर उतरने के लिए तैयार हो रहे थे. मैंने अपनी और मीरा की सीट बेल्ट कसी, उन्हें और बाकी लोगों को दिलासा दी और फिर तैयार हो गया.
हालांकि दिशा पर नियंत्रण में गड़बड़ी के कारण हेलिकॉप्टर की गति कम हो गई थी, फिर भी वह जमीन पर उतरने के बाद पलटियां खा सकता था. लेकिन पाइलट हेलिकॉप्टर को लगभग 15 फुट की ऊंचाई पर ले आए, और उन्होंने उसके दोनों इंजन बंद कर दिए. हेलिकॉप्टर हवाईअड्डे के बीचोबीच धड़ाम से गिरा और हवाईपट्टी के पश्चिम की ओर पलट गया.
मेरा बायां हाथ हेलिकॉप्टर के टूटे हुए दरवाजे में फंस गया. मैं बोल नहीं पा रहा था, लेकिन मैंने बचाव दल को इशारा किया कि मेरा हाथ निकालें, क्योंकि मुझे बहुत ज्यादा दर्द हो रहा था. मुझे याद है कि मैं मुस्करा रहा था, क्योंकि हम सभी बच गए थे. मैं बिस्तर पर हूं तथा कुछ हफ्ते और बिस्तर पर रहूंगा, पर मुझे लगता है कि यह पुनर्जन्म था. ईश्वर ने मुझे यह नई जिंदगी दी है. मेरा इरादा इसका भरपूर इस्तेमाल करने का है और समाज को वह सब कुछ लौटाना है जो उसने मुझे दिया है.
लेखक झारखंड के मुख्यमंत्री हैं.

