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हुंकारो: उम्मीद की ऊंची हुंकार

इंडियन थिएटर का ऑस्कर माने जाने वाले महिंद्रा एक्सीलेंस इन थिएटर अवार्ड्स में जूरी के दिग्गजों ने हुंकारो की सादगी भरी किस्सागोई के पक्ष में हुंकारी भरी. उसने कुल 13 श्रेणियों में से सात अवार्ड्स पर कब्जा किया.

हुंकारो नाटक के कलाकार
हुंकारो नाटक के कलाकार
अपडेटेड 1 अप्रैल , 2023

हां. हूं. अच्छा! जी. ओके! मतलब टेका देना, हुंकारी भरना, और मारवाड़ी में कहें तो हुंकारो. और 26 मार्च की शाम नई दिल्ली के कमानी सभागार में जब यह खेला हुआ तो 600 से ज्यादा दर्शक उसके छह कलाकारों के साथ डेढ़ घंटे तक उसके जादू में डूबे बस हुंकारी भरते पाए गए. इंडियन थिएटर का ऑस्कर माने जाने वाले मेटा (महिंद्रा एक्सीलेंस इन थिएटर अवार्ड्स) के दस नाटकों के इस आयोजन में तीन दिन बाद जब अवार्ड्स का ऐलान किया गया तो जाहिर हुआ कि जूरी के सात दिग्गजों ने भी हुंकारो की सादगी भरी किस्सागोई के पक्ष में हुंकारी भरी है.

ताजी और निरंतर अप्रत्याशित लगती लिखावट, मौजूं ऑर्गेनिक वाक्यों और वोकैबुलरी के साथ चारपाई की कसी रस्सी-सी बुनावट, रोचक बिंब. इन सबको साथ लेकर ऊंटड़े की चाल से बढ़ता जाता कथानक. और इसी से कदमताल करती, बराबर बढ़ती जाती दर्शक की जिज्ञासा. किसी भी भाषा के नाट्यप्रेमी के लिए यह रस में डूब जाने वाला अनुभव था. तभी तो बेस्ट प्ले, बेस्ट ओरिजनल स्क्रिप्ट (चिराग खंडेलवाल और अरविंद चारण), बेस्ट डायरेक्टर, बेस्ट स्टेज डिजाइन (दोनों मोहित ताकलकर), बेस्ट कॉस्ट्यूम डिजाइन (देविका काले), बेस्ट लाइन डिजाइन (विक्रांत ठाकर) और बेस्ट आंसांबेल यानी कुल 13 श्रेणियों में से सात अवार्ड्स पर उसने कब्जा किया.

मेटा के 18वें साल के इस आयोजन में देशभर के, विभिन्न भाषाओं और शैलियों के करीब 400 नाटकों ने प्रविष्टियां भेजकर अपना दावा ठोंका था. एक कमेटी ने उन सबको देखने के बाद दस नाटक चुने. फिर 23 से 29 मार्च तक दिल्ली में हुए उनके शो के दौरान एक अलग जूरी थी. उन्हीं में से एक, बेंगलूरू की मशहूर रंगकर्मी अरुंधती नाग पूछने पर छूटते ही बोल पड़ती हैं, ''आधा कौवा आधा गिद्ध...ओ हो हो. रोंगटे खड़े हो गए. हुंकारो एक संकेत है कि हमको इस तरह की तराश (फिनेस) और परफेक्शन की ओर बढ़ना चाहिए. आप देखिए कि कहानियों को उन्होंने किस खूबसूरती से बुना है. देथा की कहानी के क्लाइमैक्स को बाद के लिए बचाकर रखा.''

मशहूर राजस्थानी कथाकार विजयदान देथा की कहानी आशा अमर धन को बुनियाद बनाकर थिएटर ग्रुप उजागर ड्रामेटिक एसोसिएशन के दोनों लेखकों ने इसमें लॉकडाउन के दिनों पर दो किस्से जोड़े. जगह और किरदार के हिसाब से मारवाड़ी से निकलकर भोजपुरी, अवधी, हरियाणवी और फिर हिंदी में आवाजाही करते संवाद. लॉकडाउन में घर लौटते अमर की रास्ते में आधा कौव्वा आधा गिद्ध रूपी किरदार से हो रही बातचीत सुनिए:
''हम लोगों पर छिड़के क्या थे?''
''फुसफुस''
''तुम्हें कैसे पता? तुम जानते हो इसके बारे में?''
''हां, मैं जानता हूं.''
''हम लोग किसकी फसल हैं जिस पर कीटनाशक का छिड़काव किया गया है?''
''गरीब आदमी, कभी तो बड़ा सोच लिया कर. हम कीड़े भी तो हो सकते हैं.''
खाली स्टेज, बीचोबीच छह गद्दियों पर बैठे छह कथावाचक: राजस्थानी पाग, कमीज, धोती, ताबीज, कड़े में. अनुशासन, भंगिमाएं और टाइमिंग से उपजी लय कुछ ऐसी कि उसी के बूते उन्होंने बेस्ट आंसांबेल का भी खिताब जीत लिया.

हुंकारो नाटक का एक दृश्य
हुंकारो नाटक का एक दृश्य

फेस्टिवल के दूसरे नाटकों के विषय भी काफी प्रॉमिसिंग थे. महामारी का पहलू तो हुंकारो ने उठाया ही, ट्रांसजेंडर, मजदूर, स्त्री वगैरह. लेकिन कई नाटकों में विषय कुछ ज्यादा हो हो गए. थोड़ा इतिहास, थोड़ी पॉलिटिक्स, थोड़ा कास्ट सिस्टम. नाग इसमें भी हुंकारो के साफ नजरिए को पकड़ती हैं, ''इन बंदों ने कथा के एक सूत्र को पकड़े रखा. सीधी-सच्ची और सादगी से कही गई कहानी. और याद रखिए! सादगी बहुत मुश्किल चीज है. कुदरत को एक शुद्ध सफेद फूल तैयार करने में सबसे ज्यादा काम करना पड़ता है.''

जूरी की ही एक और सदस्य, मंच पर मिट्टी, पानी, रंगों और रौशनी के अद्भुत जैविक प्रयोग से कथा कहने वालीं नीलम मानसिंह चौधरी हुंकारो को और भी बारीक नजर से देखती हैं. उनके शब्दों में, ''मुझे लगा कि यह दास्तानगोई का एक नया आयाम है. 1-2 की जगह 5-6 कलाकार. हालांकि वे सबके सब बैठकर ही बोलते हैं लेकिन विराम, अंतराल, देहगतियां, भंगमाएं उनकी बॉडी इंटेंसिटी सब बेहद थिएट्रिकल परफॉर्मेंस वाले थे. कॉस्ट्यूमिंग, लाइटिंग बहुत ही सट्ल/बारीक.''

दरअसल, खंडेलवाल और चारण ने देथा की कहानी के साथ अपनी कहानियां जिस तरह से बुनी-सिली हैं, उससे पूरी कथा में एक असाधारण किस्म की सघनता आ गई है. चौधरी इसी ओर इशारा करते हुए कहती हैं, "इस वजह से नाटक में इंटेलेक्चुअल और इमोशनल दोनों तरह का कनेक्शन बना. और ऐसा बहुत कम होता है.''

पेशे से मनोचिकित्सक और मराठी/हिंदी सिनेमा/रंगमंच के दिग्गज अभिनेता मोहन अगाशे पहली बार मेटा की जूरी में थे. निर्णय उनके लिए आसान नहीं था. ''साइकोलॉजी की मेरी जो पढ़ाई रही है उसी पहली बात तो यही थी कि बी नॉन-जजमेंटल. जो कुछ कहा-किया जा रहा है उसे समझने की कोशिश करो. तो उस लिहाज से मैंने फेस्टिवल को एन्ज्वाय किया लेकिन ये जो हुंकारो था, इसमें शब्द, रंग, लय, ध्वनि, टीमवर्क, सारी चीजें एक प्ले में अच्छी और ऊंचे दर्जे की थीं. उसी वजह से नाटक जम के आया.''

हुंकारो के कथानक की बुनियाद है उम्मीद. और इसने अपनी सादगी भरे विन्यास से हिंदी थिएटर के लिए उम्मीद जगाई है. नाग कहती हैं, ''हुंकारो एक बहुत अच्छा मॉड्यूल है थिएटर के लिए. इसके कलाकार एनएसडी और दूसरी जगहों से तालीम लिए हुए हैं, ओटीटी पर काम करके पैसे भी कमाते हैं और मन का नाटक गढ़ते/करते हैं.'' हालांकि इस बात से एक तबके की असहमति भी रही है. एनएसडी के निदेशक रहे देवेंद्र राज अंकुर का मानना है, ''यह अंग्रेजी के एलीट थिएटर का हिंदी संस्करण भर है. इससे हिंदी थिएटर में कोई खास बदलाव आने से रहा.'' पर इसमें दो राय नहीं कि मेटा के अवार्ड रंगकर्मियों को कुछ समय के लिए ही सही, एक बड़ी पहचान और हौसला देते हैं. कम-से-कम, हुंकारो को मंच पर उतारने वाले अजीत सिंह पालावत, इप्शिता चक्रवर्ती, पुनीत मिश्र, भारती पेरवानी, महेश सैनी और भास्कर शर्मा तो इसकी तस्दीक करेंगे.
 

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