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1971 के भारत-पाक युद्ध के हीरो का मेडल कैसे गायब हो गया

परिवार को संदेह है कि मरणासन्न पूर्व फौजी के भाई का घर देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान लूट लिया गया था.

लेफ्टिनेंट कमांडर अशोक कुमार राय; और भारत का तीसरा सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार वीर चक्र
लेफ्टिनेंट कमांडर अशोक कुमार राय; और भारत का तीसरा सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार वीर चक्र
अपडेटेड 5 मार्च , 2021

देहरादून की निवासी 87 वर्षीया बिमलरानी मेहरा ने पिछले साल 18 अप्रैल को पाया कि कुछ गड़बड़ है. तब देशव्यापी लॉकडाउन का पहला महीना पूरा होने को था. उनके पड़ोसी माइकल राय के ग्राउंड फ्लोर के फ्लैट का दरवाजा खुला हुआ था और घर बाहर मलबा बिखरा हुआ था.

जब मेहरा का नौकर उस फ्लैट में दाखिल हुआ तो उसने बक्से और अलमारियों को खुला पाया, और उनमें रखे सामान को इधर-उधर बिखरा हुआ पाया. बेडरूम में 77 वर्षीय कृशकाय राय लेटे हुए थे. उन्हें कभी फ्लाइट लेफ्टिनेंट आलोक कुमार राय के नाम से जाना जाता था. भारतीय वायु सेना (आइएएफ) के इस पूर्व अधिकारी ने 1970 के दशक के शुरू में नौकरी छोड़ दी थी. वे सेवेंथ डे ऐडवेंटिस्ट चर्च की शरण में चले गए थे और अपना नाम बदल लिया था.

मेहरा दंपति ने पुलिस को बुलाया. पुलिस आई और पूर्व फौजी को अस्पताल में भर्ती कराया. लेकिन अस्पताल में भर्ती होने के कुछ ही घंटों बाद राय का देहांत हो गया. मृत्यु प्रमाणपत्र पर मौत की सिर्फ एक वजह लिखी गई है—हाइपोग्लीसीमिया, जो संभवतः भूखे रहने की वजह से हुई थी. कुछ साल पहले हार्ट सर्जरी की वजह से राय कमजोर हो गए थे. उन्हें चलने-फिरने में तकलीफ होती थी और अपनी सारी जरूरतों के लिए घर पर आने वाली नौकरानी नीतू सिंह पर ही निर्भर थे. लेकिन लॉकडाउन की वजह से नीतू सिंह ने आना बंद कर दिया था.

अक्तूबर 2019 में देहरादून में फ्लाइट लेफ्टिनेंट आलोक कुमार राय उर्फ माइकल राय (काले शर्ट में)
फ्लाइट लेफ्टिनेंट आलोक कुमार राय उर्फ माइकल राय (काली शर्ट में) अक्तूबर 2019 में देहरादूर में अपने आवास में

राय के परिवार को पूर्व फौजी की मौत के बारे में इसी साल पता चला. इस साल फरवरी में मुंबई में रहने वाले उनके भांजे अजीत चौधरी की पत्नी उनके जन्मदिन के अवसर पर केक लेकर देहरादून पहुंचीं, तब जाकर उन्हें पता चला कि उनका देहांत हो चुका है. इस दौरान उनके परिवार को इसकी भनक तक नहीं थी क्योंकि राय बिल्कुल अलग-थलग रहना पसंद करते थे, फोन या इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं करते थे और शायद ही कभी किसी से संपर्क करते थे. जब वे इस क्षति से उबर ही रहे थे कि उन्हें एक और नुक्सान के बारे में पता चला.

उस घर में चर्च ने ताला लगा दिया था. राय के भांजे चौधरी टाटा ग्रुप में असिस्टेंट वाइस-प्रेसिडेंट हैं. वे घर का सामान ले जाने के लिए देहरादून पहुंचे और परिवार की एक विरासत—उनके दूसरा मामा लेफ्टिनेंट कमांडर अशोक कुमार राय का वीर चक्र मेडल—को बेसब्री से तलाशने लगे. वीर चक्र भारत का तीसरा सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार है, जिसे दुश्मन के खिलाफ विशिष्ट बहादुरी के लिए दिया जाता है. यह पुरस्कार लेफ्टिनेंट ‘अकु’ राय को उनकी मृत्यु के बाद जनवरी 1972 में दिया गया था. नौसेना के पाइलट राय के विमान को 10 दिसंबर, 1971 को जामनगर के पास एक पाकिस्तानी एयरफाइटर ने उस समय मार गिराया था जब वे आइएनएस खुखरी को डूबोने वाली पाकिस्तानी सबमेरीन का पीछा कर रहे थे.

मेडल के साथ ही लेफ्टिनेंट कमांडर राय का वीर चक्र साइटेशन भी गायब था. उसमें उनके अंतिम मिशन का जिक्र था—दो एलीज ऐंटी-सबमेरीन और टोही नौसेना विमान के कमांडर. एलीज अमूमन विमानवाहक विक्रांत से संचालित होते थे, लेकिन युद्ध छिड़ने के बाद दो विमान लेफ्टिनेंट कमांडर राय के अधीन तटीय अड्डे से निगरानी करते थे. पहले मुंबई से और बाद में जामनगर स्थित आइएएफ एयरबेस से काम कर रहे थे.

लेकिन राय के पास एक ऐसा सुराग था जिसे वे अपने सीने में छिपाए अपनी कब्र में ले गए. उससे पहले उसी साल वे नैवल कमांडो ऑपरेशन (एक्स), या एनसीओ (एक्स) का हिस्सा थे, जो भारतीय नौसाना का खुफिया अभियान था. इस अभियान के तहत ‘मुक्ति वाहिनी’ के प्रशिक्षित हमलावर तैराकों को अगस्त और नवंबर के दौरान पूर्वी पाकिस्तान में भेजा गया था. अगरतला में एक खुफिया शिविर से राय ने नौसेना के कमांडो की घुसपैठ की निगरानी की थी. उन कमांडो ने 16 अगस्त, 1971 की रात को ऑपरेशन जैकपॉट को अंजाम दिया था, जो दुनिया में नौसेना के सबसे बड़े ध्वंसक छापों में शुमार है. बंगाली ध्वंसकों ने उस एक ही हमले में पूर्वी पाकिस्तान के चार बंदरगाहों पर 22 मर्चेंट जहाजों को डूबो दिया.

चौधरी को संदेह है कि पिछले साल जब उनके चाचा मरणासन्न हालत में पड़े हुए थे तभी मेडल चुरा लिया गया. वे बताते हैं, ‘‘उस मेडल की हमारे लिए बहुत अहमियत थी, वह मेरी मां के परिवार से हमारी आखिरी कड़ी था और हम उसे दोबारा हासिल करना चाहते हैं.’’

वीर चक्र, नीला और नारंगी रिबन वाला सिल्वर मेडल जिसके किनारे राय का नाम लिखा था, लेफ्टिनेंट कमांडर राय के पिता मेजर जनरल अमरनाथ राय ने 1972 में लिया था. अपने माता-पिता की मृत्यु—मेजर जनरल राय 1985 में और उनकी मां इरीना 1996 में—वह मेडल आलोक कुमार राय उर्फ माइकल राय के पास आ गया.

चौधरी के साथ उस फ्लैट में आईं राय की भांजी ने अपना नाम जाहिर न करने को कहा. वे आखिरी बार राय से अक्तूबर 2019 में मिली थीं. उन्हें अपने मामा के मेडल बारे में अच्छी तरह याद है. उनके नाना मेजर जनरल राय ने लेफ्टिनेंट कमांडर राय की वर्दी और दूसरे मेडल के साथ सेना के टिन के संदूक में रखा था. इस तरह के कोई छह संदूक थे. ‘‘जब मैं 1 मार्च को घर गई तो उन संदूकों को देखा, लेकिन सब खाली थे...घर में जो भी कीमती सामान था, चुरा लिया गया था.’’

जब अक्तूबर 2019 में वे अपने मामा से मिलने गई थीं तब लेफ्टिनेंट कमांडर राय के मेडल का जिक्र हुआ था. पूर्व फौजी ने बताया था कि उन्होंने नौसेना की एक टीम को उसे दिखाया था. वह टीम कुछ महीने पहले ही उनसे मिली थी. कमांडर विजय कपिल (सेव‌ानिवृत्त), जो एनसीओ (एक्स) की खुफिया टीम का हिस्सा थे और जिन्हें 1971 में वीर चक्र मिला था, भी काफी परेशान हैं. उनका कहना है, ‘‘यह काफी दुखद बात है कि नौसेना के इस हीरो की आखिरी याद चोरी और विध्वंस में गुम हो गई.’’ इस साल जब भारत 1971 के युद्ध की 50वीं वर्षगांठ मना रहा है, ऐसे में उसके एक हीरो के दोस्त और परिवारवाले जवाब मांग रहे हैं.

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