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स्‍वास्‍थ्‍य: हरियाणा में सबकी मुफ्त स्वास्थ्य सेवा

जब दारलौन के भूमिहीन खेतिहर मजदूर 50 वर्षीय फाक जुआला को दो दिन तक खून की उल्टी हुई, तो उसे मालूम था कि उसे सुरक्षित हाथों में पहुंचने के लिए 150 किमी दूर आइजॉल सिविल (एसीएच) अस्पताल जाना पड़ेगा.

अपडेटेड 5 नवंबर , 2011

हरियाणा के स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक डॉ. नरबीर सिंह कहते हैं, ''हरियाणा में सब कुछ इतना दिलचस्प कभी नहीं था.''  वे उन लोगों में शामिल हैं जिन्होंने राज्‍य में स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र में अभूतपूर्व बदलाव देखा है, स्वास्थ्य सेवा पर 2004-05 से सरकार के खर्च में 300 गुना बढ़ोतरी की वजह से यह मुमकिन हुआ है.

हरियाणा के 2011-12 के बजट में स्वास्थ्य के लिए 478.31 करोड़ रु. दिए गए हैं. 2009 में हरियाणा ने एक स्वास्थ्य नीति तैयार करने के लिए 30.65 लाख बच्चों की जांच के लक्ष्य के साथ स्वास्थ्य परीक्षण शुरू किया. ऐसी योजनाएं तैयार की गईं जो पहले नहीं थीं.स्‍वास्‍थ्‍य

मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा और स्वास्थ्य सचिव नवराज संधू के सक्रिय सहयोग से डॉ. नरबीर सिंह और डॉक्टरों की एक टीम ने उन स्वास्थ्य योजनाओं को लागू किया जिनके तहत सरकारी अस्पतालों में मुफ्त जरूरी दवाएं देना, डिलीवरी कराना और नवजात शिशुओं की स्वास्थ्य देखभाल शामिल हैं.

राज्‍य के अस्पतालों में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले (बीपीएल) मरीजों के लिए सर्जरी मुफ्त है और दूसरे लोगों को भी रियायत दी जाती है. सीजेरियन सेक्शन और क्लेफ्ट लिप सर्जरी सभी के लिए मुफ्त है. 2005-06 में शुरू की गई राष्ट्रीय आरोग्य स्वास्थ्य निधि योजना के तहत बीपीएल परिवारों को सभी अस्पतालों में विशेषज्ञता प्राप्त तृतीय श्रेणी के मुफ्त इलाज की सुविधा मिलती है. स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े बताते हैं कि मई, 2011 तक इस योजना से 1,42,096 मरीजों को लाभ पहुंचा.

डॉ. नरबीर सिंह ने बताया, ''हम गर्भवती माताओं को संतुलित पोषक आहार भी उपलब्ध कराते हैं.'' उन्होंने बताया कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में हरियाणा की कामयाबी के बारे में दूसरे राज्‍यों ने भी तहकीकात की है. डॉ. नरबीर सिंह ने बताया कि बोस्टन यूनिवर्विटी के स्वास्थ्य विशेषज्ञों के एक दल ने हाल ही में राज्‍य के जिला अस्पतालों और ब्लॉक स्तर की डिस्पेंसरियों का दौरा किया. विशेषज्ञों का कहना था कि उन्होंने ''इससे पहले कभी इतने बड़े पैमाने पर बदलाव नहीं देखा.'' 

बदलाव की शुरुआत 2005 में अत्यधिक उदार और विकेंद्रीकृ त नीति के साथ डॉक्टरों की नियुक्ति से हुई. इस नीति के तहत वॉक-इन इंटरव्यू के आधार पर करीब 3,000 नए फिजीशियन और सर्जन भर्ती किए गए. सबसे अधिक पिछड़े मेवात जिले में काम करने के लिए तैयार डॉक्टरों को हर महीने 25,000 रु. प्रोत्साहन राशि देने की पेशकश की गई. डॉ. नरबीर सिंह ने बताया, ''हमने 2,605 नियमित पदों में से 200 को छोड़कर सभी पदों को भर दिया.''

पूर्ववर्ती सरकारों के उलट हुड्डा प्रशासन ने अपना ध्यान तीन जिलों-मेवात, झज्‍जर और पलवल पर केंद्रित किया जहां काफी कम विकास हुआ था. सिविल सर्जन डॉ. राव कुलदीप सिंह का कहना है, ''मेवात सबसे बड़ी चुनौती था क्योंकि वहां कोई भी महिला स्थानीय मौलवी की मंजूरी के बिना डॉक्टर के पास जाने की हिम्मत नहीं करती थी.''

डॉ. कुलदीप सिंह और उनके सहयोगियों ने एंबुलेंसों की मरम्मत कराई और 2007 में मरीजों को लाने की सेवा शुरू की जिसे बाद में राज्‍यभर में स्वास्थ्य वाहन सेवा के रूप में मंजूर कर लिया गया. सिविल सर्जन का कहना है, ''2007 में संस्थानों में कव्वल 683 डिलीवरियां कराई गई थीं. यह संख्या इस साल अगस्त तक 6,834 (मेवात में कु ल जन्म दर का करीब 37 फीसदी) से ज्‍यादा हो गई.''

स्वास्थ्य के क्षेत्र में हरियाणा की सफ लता ने केंद्र सरकार को 2011 में जननी शिशु सुरक्षा योजना की शुरुआत करने का आधार दिया. मुख्यमंत्री 'ड्डा ने राज्‍य के डॉक्टरों को साफ संदेश दे रखा हैः ''मेहनत से काम करो या कहीं और काम ढूंढ़ो.''

मिजोरम सबसे ज्‍यादा उन्नत छोटा राज्‍य

सरकार कराती है इलाज

जब दारलौन के भूमिहीन खेतिहर मजदूर 50 वर्षीय फाक जुआला को दो दिन तक खून की उल्टी हुई, तो उसे मालूम था कि उसे सुरक्षित हाथों में पहुंचने के लिए 150 किमी दूर आइजॉल सिविल (एसीएच) अस्पताल जाना पड़ेगा. आइजॉल जा रहा उसका एक पड़ोसी उसे अपने साथ ले गया. जुआला अब चिंतामुक्त है और अस्पताल से छुट्टी के लिए डॉक्टरों की मंजूरी का इंतजार कर रहा है. राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (आरएसबीवाई) और मिजोरम राज्‍य स्वास्थ्य देखभाल योजना (एमएसएचसीएस) के तहत खून की तीन बोतलों से लेकर उसके इलाज का पूरा खर्च सरकार ने उठाया.

जुआला के साथ वाले बिस्तर पर आइजॉल से 170 किमी दूर जॉनगिन का दिहाड़ी मजदूर 33 वर्षीय के. रिमाविया था. डॉक्टर उसके बुखार की वजह नहीं जान पा रहे थे और उसे गुवाहाटी के बड़े अस्पताल में भेजने के बारे में सोच रहे थे. एसीएच के चिकित्सा अधीक्षक लालबियाक कीमा का कहना है, ''हम गुवाहाटी और कोलकाता के अस्पतालों से जुड़े हुए हैं जहां हमारे भेजे गए मरीजों का 3 लाख रु. तक का इलाज मुफ्त होता है.''

स्वास्थ्य मंत्री लालरिनलियाना सैलो का कहना है, ''आरएसबीवाई के तहत गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले मरीजों का 30,000 रु. तक का मुफ्त इलाज किया जाता है और जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त 70,000 रु. का भुगतान एमएसएचसीएस के तहत किया जाता है. गंभीर बीमारी की अवस्था में मरीज को 3 लाख रु. तक का इलाज मुफ्त मिलता है.

सैलो ने हर डॉक्टर के लिए दो साल तक दूरदराज के इलाकों में काम करना अनिवार्य कर दिया है. वे कहते हैं, ''अब डॉक्टरों को दूरदराज के इलाकों में जाना बुरा नहीं लगता क्योंकि अब उनका दो साल के लिए उन इलाकों में जाना तय है.''

2009 और 2010 में कुल 110 स्वास्थ्य  अधिकारियों की भर्ती कर उन्हें ग्रामीण इलाकों में भेजा गया. इसके नतीजे दिख रहे हैं. मलेरिया से होने वाली मौतें 2009 में 119 थीं जो 2010 में घटकर 31 रह गईं. गर्भवती महिलाओं को डिलीवरी के लिए अस्पताल में भर्ती कराने के मामले 2008 में 65 फीसदी थे जिनकी संख्या 2010 में बढ़कर 76 फीसदी हो गई. मिजोरम पूर्वोत्तर का एकमात्र ऐसा राज्‍य है जहां सरकारी नेत्र बैंक है. 13 अक्तूबर तक 58 कॉर्निया जमा किए गए और एसीएच में 41 ट्रांसप्लांट किए गए. सैलो चाहते हैं कि इनकी संख्या और बढ़े. उन्होंने कहा, ''मिजोरम में एक मेडिकल कॉलेज और अस्पताल की जरूरत है. इसकी स्थापना की हर मुमकिन कोशिश कर रहा हूं.''

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