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स्वास्थ्य: जान की कीमत पर धंधा

मुख्यमंत्री के गृहक्षेत्र में नकली जीवनरक्षक दवाओं की बरामदगी के बाद स्वास्थ्य सेवाएं सवालों के घेरे में.

अपडेटेड 6 जून , 2012

जरा सोचिए, दिमागी बुखार और निमोनिया जैसी बीमारियों में तुरंत असर दिखाने वाली एंटीबायोटिक दवाएं अगर नकली हों तो क्या होगा? जाहिर है, मरीज की जान पर बन सकती है. पर नकली दवाओं के सौदागरों को इसकी परवाह कहां. मरणासन्न रोगी को बचाने के लिए आखिरी उम्मीद के तौर पर दी जाने वाली ये दवाएं अस्पताल की सहकारी दुकानों की बजाए बाहर सस्ती मिलें तो जाहिर है, मरीज को फायदा होगा. लेकिन बाहर सस्ती कैसे?

जोधपुर में जब सीआइडी को मुखबिर के माध्यम से इसकी भनक लगी तो उसने पुलिस आयुक्त भूपेंद्र कुमार दक से संपर्क साधा. शुरू में पुलिस को भी मामला हजम नहीं हुआ कि रामबाण मानी जाने वाली दवाओं के महंगे इंजेक्शन बाहर की दुकानों पर सस्ते कैसे? दक ने पूर्व और पश्चिम क्षेत्र के पुलिस उपायुक्तों क्रमशः राहुल प्रकाश और अजयपाल लांबा को इसकी पड़ताल करने को कहा.sanjeevni

पुलिस ने आम ग्राहक के तौर पर बाजार में दवाओं की अलग-अलग दुकानों से मेरो-सूल और मेरो-सीडी (मेरोपेनम-साल्ट) नाम के इंजेक्शन खरीदे. उन्हें बनाने वाली कंपनी का पता देखकर उन्हें फोन किया गया. रैपर पर हिमाचल प्रदेश के सोनल क्षेत्र की जिस कंपनी का नाम लिखा था, उसने इस तरह की दवाइयां बनाने से साफ इनकार कर दिया और कहा कि उसके नाम से दवा बना रहे लोगों पर वह मुकदमा दर्ज कराएगी.

अब पुलिस बड़ा कदम उठाने के लिए तैयार थी. लेकिन ऐसे मामले में उसके पास धोखाधड़ी का केस दर्ज करने के अलावा कोई अधिकार ही नहीं. आगे की धाराएं औषधि नियंत्रक संगठन की जांच रिपोर्ट के बाद ही जुड़ सकती हैं. खैर, धोखाधड़ी के मामले में पुलिस ने जोधपुर शहर के होलसेलर तनसुख वडेरा को धरा और उसकी फर्म नाकोड़ा मेडिकल्स में करीब 1,000 इंजेक्शन जब्त कर दुकान को सील कर दिया.

वडेरा की निशानदेही पर मनोज जोशी नाम के शख्स को पुलिस ने उसी देर रात पकड़ा. राहुल प्रकाश बताते है, 'हुएक को गिरफ्तार किया तो इतने में मचे हड़कंप के बाद बाकी 2-3 होलसेलर्स ने दवाइयां गायब कर दीं. पर इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि जोधपुर में ये दवाइयां भारी मात्रा में बिकी हैं.'' मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के गृहक्षेत्र में नकली जीवन रक्षक दवाइयों का यह घिनौना खेल दो साल से चल रहा था.

आगे की कहानी वडेरा के हवाले सेः उसने ये दवाइयां जोधपुर के ही राजेश पुरोहित से खरीदीं. राजेश और उसके सहयोगी नरेंद्र चौधरी और मनोज जोशी नाकोड़ा मेडिकल्स पर दवाइयां पहुंचाते थे. बाद में वडेरा इन्हें शहर की दूसरी दुकानों पर सप्लाई करता था. वडेरा के अलावा दो और दुकानदार पकड़ में आ चुके हैं, जिनके यहां से पुलिस ने सैंपल खरीदे थे. मुख्य सरगना राजेश पुरोहित अभी फरार है. जोधपुर का ही राजेश पहले मेडिकल रिप्रजेंटेटिव (एमआर) था.

दवा बाजार की बारीकियों के अलावा वह यह भी जानता था कि ज्‍यादा से ज्‍यादा मुनाफे वाली दवा बाजार में पटकने पर उसे सब बेचते हैं. औषधि नियंत्रक महकमे की कमजोरियों का भी उसे अंदाजा था. पूरा गणित निकालकर वह इस गोरखधंधे में कूद पड़ा. सूत्र बताते हैं कि राजेश ये दवाइयां इंदौर में बनवाता था और जयपुर में छपवाए गए रैपर चिपकाकर उन्हें 'ओरिजनल' बना देता था. दो साल से ये दवाइयां अकेले जोधपुर में दो-तीन होलसेलरों की मार्फत संजीवनी के रूप में बिक रही थीं. राहुल प्रकाश बताते हैं, ''राजेश की गिरफ्तारी के बाद ही पूरी कहानी खुल पाएगी.''

बाजार में दवाइयों के प्रचलन पर नजर रखने वाले औषधि नियंत्रण महकमे को देखिए. सहायक औषधि नियंत्रक अशोक भंडारी बड़ी बेबाकी से बताते हैं, ''नकली इंजेक्शन के बारे में पुलिस से सूचना मिली. दवाइयां जांच के लिए भेजी हुई हैं. हमारे महकमे को भी राजेश की गिरफ्तारी का इंतजार है.'' फंगस वाले ग्लूकोज के मामले के बाद अब नकली जीवन रक्षक दवाइयों से औषधि नियत्रंण महकमे पर उंगली उठना लाजिमी है. लेकिन जोधपुर में यह महकमा पूरी तरह पंगु बना हुआ है. भंडारी स्वीकार करते हैं, ''यहां औषधि निरीक्षक के चार पद हैं और चारों खाली पड़े हैं.''

नकली जीवनरक्षक दवाइयां सरकारी अस्पतालों में भी खूब बिकीं. शहर के तीनों बड़े अस्पतालों-महात्मा गांधी अस्पताल, उम्मेद अस्पताल और मथुरादास अस्पताल-में सहकारी उपभोक्ता होलसेल दुकानों की मार्फत ये दवाइयां मरीजों तक पहुंचीं और बिकीं भी. जोधपुर सहकारी उपभोक्ता होलसेल भंडार के महाप्रबंधक भवानी सिंह कविया बताते हैं, ''हमारे पास शिकायतें आती थीं कि मेरो-सीडी और मेरो-सूल नाम के इंजेक्शन बाहर की दुकानों पर सस्ते में मिलते हैं. ऐसे में हमने वडेरा से संपर्क साधा.

उसने कहा कि बड़े पैमाने पर खरीदने से ये इंजेक्शन सस्ते पड़ेंगे. इस पर सहकारी उपभोक्ता होलसेल भंडार ने मेरो-सीडी के 825 और मेरो-सूल के 100 इंजेक्शन खरीदे.'' इनके नकली होने का खुलासा होने तक उपभोक्ता भंडार की दुकानों से भी मेरो-सीडी के 82 और मेरो-सूल के 44 इंजेक्शन मरीजों को लग चुके थे. आनन-फानन में उपभोक्ता भंडार के बाकी बचे इंजेक्शन संबंधित होलसेलर को लौटाए गए.

जोधपुर में होलसेल की 30 दुकानें हैं. कविया की मानें तो ''नाकोड़ा फर्म से पिछले 7-8 साल से उपभोक्ता भंडार के लिए दवाइयां ली जा रही थीं. ऐसे में इस फर्म पर भरोसा तो किया जा सकता था.'' गौर तलब है कि इन इंजेक्शनों पर अधिकतम कीमत 400 रु. से 3,000 रु. लिखी हुई थी जबकि खुले बाजार में ये 200-300 रु. में बिक रहे थे. एमआरपी ज्‍यादा होने से दुकानदार मुंह देखकर रेट बताते और जमकर कमाई करते. अलग-अलग कीमत होने के बारे में पूछा जाता तो वे अलग-अलग कंपनियों के होने का तर्क देते.

गौरतलब है कि सरकारी अस्पताल में खुली सहकारी उपभोक्ता भंडार जैसी दुकानों पर दवाइयां खरीदने वालों की कतारें लगी रहती हैं. कविया खुद मान रहे हैं कि इन दुकानों की मार्फत नकली जीवन रक्षक इंजेक्शन मरीजों तक पहुंचे हैं. सरकारी अस्पतालों में निःशुल्क तौर पर इन इंजेक्शनों की आपूर्ति कम ही होती है.

जोधपुर के महात्मा गांधी अस्पताल के अधीक्षक पी.सी. व्यास मानते हैं कि ऐसे में मरीजों को बाहर की दुकानों से भी इस तरह के इंजेक्शन खरीदने पड़ते हैं. चिकित्सकों की मानें तो मरीज जब साधारण एंटीबायोटिक से ठीक नहीं होते तब उन्हें इन महंगे इंजेक्शनों से बचाने का प्रयास किया जाता है. इन इंजेक्शनों को डॉक्टरों का अंतिम हथियार कहा जाता है. एक चिकित्सक की मानें तो पिछले कुछ दिनों से मेरोपेनम इंजेक्शन के कम असरकारक होने की शिकायत भी आ रही थी. निजी अस्पतालों में भी ये इंजेक्शन बिके ही होंगे.

पर जोधपुर की स्वास्थ्य सेवाओं को आखिर हो क्या गया है? किसकी नजर लग गई है इन्हें? गांधीवादी कहलाने वाले मुख्यमंत्री गहलोत के इस गृहक्षेत्र में हादसे-दर-हादसे हो रहे हैं और वे जैसे 'बुरा मत देखो, बुरा मत सोचो, बुरा मत कहो' की तर्ज पर बेखबर बने बैठे हैं. प्रसूताओं की मौतों के मामले के बाद भी न तो स्वास्थ्य विभाग चेता और न मुख्यमंत्री.

उसके बाद मरीजों को फंगस वाले ग्लूकोज चढ़ाने के मामले सामने आए. लगा कि अब शायद सख्ती हो और दोबारा ऐसी घटनाएं न हों, कम से कम जोधपुर में. लेकिन उसके बाद यहां के एक बड़े अस्पताल में आइसीयू में भर्ती मरीज को चूहा कुतर गया. अब जीवन रक्षक महंगी और नकली दवाइयां असली की शक्ल में उसी जोधपुर में जमकर बिकती पकड़ी गईं. कोई कैसे भरोसा करे कि यह किसी प्रदेश के मुख्यमंत्री का गृहक्षेत्र है.

इंडिया टुडे ने जब इस बारे में उनसे पूछा तो उन्होंने ''उचित कार्रवाई'' का पूरा भरोसा दिया और फिर सरकार की उपलब्धियां गिनाने लगेः ''देखिए हमने जननी सुरक्षा योजना शुरू की, निःशुल्क दवाइयां बंटवाना शुरू किया.'' लेकिन पश्चिमी राजस्थान में इलाज के सबसे बड़े केंद्र जोधपुर में औषधि निरीक्षक के चारों पद खाली पड़े है. ऐसे कई सवाल हैं जो स्वास्थ्य सेवाओं की पोल खोलते दिखते हैं.

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