अलवर जिले के एक गांव शेरपुर में एक धर्मनिरपेक्ष धर्मस्थल लालदास अब राजस्थान में सांप्रदायिक तनाव का नया केंद्र बन गया है. यह गांव उस गोपालगढ़ से 22 किमी दूर है, जहां पिछले साल सितंबर में मस्जिद पर हुई पुलिस फायरिंग में 10 मेव मुसलमान मारे गए थे. दो सौ गाड़ियों में आई राजस्थान पुलिस ने 10 जुलाई को करीब दो दर्जन घरों वाले इस छोटे से गांव को तीन दिन तक छावनी बनाए रखा.
ऑपरेशन का नेतृत्व करने वाले जयपुर (ग्रामीण) पुलिस महानिरीक्षक सौरभ श्रीवास्तव कहते हैं, ''ऐसा नमाज पढ़ने से रोकने और हिंदू प्रतीकों को हटाने का प्रयास टालने के लिए किया था.''
यह धर्मस्थल संत लालदास की कब्र के चारों ओर बनी दीवारों का एक परिसर है. 1597 में जन्मे संत लालदास मुस्लिम मेव माता पिता की संतान थे और उन्होंने लालदासी पंथ की स्थापना की थी. इस धर्मस्थल में मुसलमान और हिंदू दोनों आते हैं, और इसका प्रबंधन हिंदुओं की एक समिति करती है. एक अधेड़ मेव मुसलमान इदरीस साद इसके पुजारी हैं.
यह धर्मस्थल मेवों के गढ़ अलवर में स्थित है, जो केंद्रीय गृह राज्य मंत्री भंवर जितेंद्र सिंह का चुनाव क्षेत्र है. इस परिसर में लालदासी पंथ के संस्थापक लालदास, उनकी कुछ संतानों और उनके परिवार के सदस्यों की दर्जनों कब्रें हैं. अलवर के तत्कालीन बंदोबस्त अधिकारी मेजर पी.डब्लू. पॉलेट ने अलवर गजट में लिखा है कि लालदास जन्म से एक मेव मुसलमान थे, जो हिंदू रीति-रिवाजों को मानते थे.
उनका लालदासी पंथ कबीर पंथ की तरह था और अपने किस्म के बाकी किसी संप्रदाय की तुलना में कहीं ज्यादा उदार था. आज इस संप्रदाय की अलवर में सत्रह घोषित संपत्तियां हैं और 30 अन्य संपत्तियां उत्तरी, मध्य भारत में हैं.
धर्म परिवर्तन करके हिंदू से मुसलमान बना राजस्थान का मेव समुदाय सहिष्णु और धर्मनिरपेक्ष है, जो इतने वषोर्ं से हिंदुओं के साथ बेहद नजदीकी सांस्कृतिक संबंधों के साथ फलता-फूलता रहा है. लेकिन गोपालगढ़ हिंसा से मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के ठीक ढंग से न निपटने और उसके बाद लेखक सलमान रुश्दी को जयपुर साहित्य महोत्सव में शामिल न होने देकर कट्टरपंथी मुसलमानों का तुष्टीकरण करने से क्षेत्र में कट्टरपंथी गुटों को सांप्रदायिक भावनाएं भड़काने को प्रोत्साहन मिला है.
श्रीवास्तव कहते हैं, ''हमने गोपालगढ़ जैसी स्थिति टाली है. सद्भावना मंच के बैनर तले प्रस्तावित बैठक के आयोजक सांप्रदायिक हैं और उन्हें तबलीगी जमात जैसे कट्टरपंथी गुटों का समर्थन प्राप्त है. उनमें हिंदू और मुसलमान दोनों नेता हैं जो गोपालगढ़ संकट की जड़ में थे.'' पुलिस ने सद्भावना मंच के दो नेताओं-पीपुल्स यूनियन ऑव सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) के उपाध्यक्ष मौलाना हनीफ और दलित कार्यकर्ता सूरजमल कर्दम-के खिलाफ धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने, विद्वेष और दंगों को बढ़ावा देने जैसे गैर-जमानती अपराधों के लिए प्राथमिकी दर्ज की है.
हनीफ ने अपने छिपे होने की जगह से 15 जुलाई को इंडिया टुडे को बतायाः ''हम 12 जून को परिसर में मूर्तियां स्थापित किए जाने का विरोध करने के लिए 11 जुलाई को परिसर के पास एक विशाल बैठक करने जा रहे थे. इसके लिए प्रशासन से अनुमति मांगी गई थी. स्वामी अग्निवेश, रामविलास पासवान और उदित राज जैसे नेताओं ने वहां आने को मंजूरी दी थी. हम हिंदुओं और मुसलमानों का शांतिपूर्ण सहअस्तित्व चाहते हैं, जिसमें मुसलमानों को वहां नमाज पढ़ने की अनुमति हो.''
स्थानीय प्रशासन के मुताबिक, सारे ऐतिहासिक रिकॉर्ड यही बताते हैं कि वहां कभी नमाज नहीं पढ़ी गई. लिहाजा मंच की मांग सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने जैसी है. 15 जुलाई को इंडिया टुडे को वहां हिंदू देवताओं की कोई मूर्ति नहीं मिली. राजस्थान पीयूसीएल की महासचिव कविता श्रीवास्तव ने 15 जुलाई की देर शाम को जारी की गई एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि लालदास धर्मस्थल पर विवाद केवल इस बैठक को रद्द करने की एक सरकारी चाल थी, जिसमें गोपालगढ़ नरसंहार पर चर्चा होनी थी, इससे सरकार को शर्मिंदगी का सामना करना पड़ता. इदरीस कहते हैं कि ''पूरा विवाद सरकारी चाल है, जिसका मकसद मेवों में से कट्टरपंथियों को खुश करने के लिए धर्मस्थल को अपने नियंत्रण के तहत लाना है.''
मजार पर जिस तरह सारे भक्त चादर, तेल, अगरबत्ती, चीनी और चावल चढ़ाते हैं, उससे धर्मस्थल का खास चरित्र साफ नजर आता है, लेकिन हिंदू माथा टेकते हैं और परिक्रमा करते हैं, जो मुसलमान नहीं करते. अब तक किसी ने इस पर आपत्ति नहीं की कि वहां कोई किस तरह पूजा करता है. बाबा लालदास मंदिर विकास समिति के अध्यक्ष रवि कपूर जोर देकर कहते हैं कि सद्भावना मंच गोपालगढ़ में मुसलमानों पर हुए अत्याचार का इस्तेमाल करके उनकी भावनाएं भड़काने की चाल चल रहा है.
इरादा इस धर्मस्थल को अपने कब्जे में लेने का है, क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में यहां दान और चढ़ावे की रकम बढ़कर 15 लाख रु. सालाना हो चुकी है. इदरीस कहते हैं कि एक समय उन्हें दीपक जलाने के लिए तेल की भीख मांगनी पड़ती थी.
वे कहते हैं, ''श्रद्धालु आते थे, लेकिन उन दिनों वे चढ़ावा नहीं चढ़ाते थे. अब हमें कई ड्रम तेल मिल रहा है इसीलिए कई दावेदार हो गए हैं.'' इंडिया टुडे की टीम ने पाया कि शेरपुर में और उसके आसपास के इलाके में लोगों ने धर्मस्थल को अलग-अलग नामों से पुकारना शुरू कर दिया है, जो उनके निहित स्वार्थों के लिहाज से हैं. जैसे समाधि, मंदिर, ईदगाह, मजार या दरगाह. उन्होंने संत का नाम भी विवादित कर दिया हैः लालदास या लाल खान?
मुस्लिम गुटों ने अतीत में भी इस पर कब्जा करने की कोशिश की थी. 1945 में कुछ मुसलमानों ने अदालत में यह कहते हुए एक मामला दायर किया था कि उन्हें परिसर में नमाज और मुस्लिम संस्कारों की अनुमति दी जानी चाहिए. लेकिन अक्तूबर 1947 में उनके मामले को अलवर के मुंसिफ मजिस्ट्रेट ने यह कहकर खारिज कर दिया था कि कबीर पंथ की तरह लालदासी न हिंदू थे, न ही मुसलमान. वे वैष्णवों के करीबी थे. उन्होंने आदेश दिया कि वहां किसी इस्लामी चिन्ह की या नमाज अता करने की अनुमति नहीं दी जाएगी.
1966 में इस स्थान की देखभाल करने के लिए एक ट्रस्ट बना था, जिसमें ज्यादातर हिंदू थे. ट्रस्ट में स्थानीय मेव का सहयोग लिया जाता था. 1986 में मेव मुसलमानों के एक समूह ने परिसर में स्थित ईदगाह जैसे नजर आने वाले एक मंच पर एक निकाह के बाद नमाज अता की. उसके बाद उस समय के पुजारी को निकाल दिया गया था. उसकी जगह इदरीस को रखा गया.
हिंदू भक्तों की संख्या बढ़ती गई. 2001 में सिर्फ दो किमी दूर स्थित गांव नौगांव के हिंदुओं के कट्टरपंथी समूह ने ट्रस्ट का प्रबंधन अपने हाथों में ले लिया.
उन्होंने परिसर के अंदर टूटी-फूटी झेपड़ियों में रहने वाले आठ मेव और दो हिंदू परिवारों से बातचीत की कि वे पैसे और जमीन ले लें और परिसर के ठीक बाहर पक्के मकान बनवा लें, ताकि श्रद्धालुओं के लिए जगह निकाली जा सके. उन्होंने श्रद्धालुओं के लिए रसोई, कैंटीन और ठहरने की सुविधाएं विकसित कीं. अब तीन प्रमुख मेलों में भक्तों की संख्या हर बार दो लाख से अधिक हो जाती है. इससे पैसे तो ज्यादा आने लगे, लेकिन स्थानीय मेव इससे अलग-थलग पड़ गए जो इसके आर्थिक विकास से खुद को कटा हुआ महसूस करने लगे.
89 वर्ष के सल्लू, जो 2008 में इस परिसर से बाहर शिफ्ट हो गए थे और जिन्होंने बाहर एक विशाल मकान बनवा लिया है, यहां पूजा करने का अधिकार अपने भतीजे इदरीस को दे देने को लेकर परेशान हैं. पूजा करने के अधिकार को लेकर एक बार एक प्रतिद्वंद्वी मेव के खिलाफ अदालत में चले एक मामले में, सल्लू ने दावा किया था कि वह लालदास के वंशज और गैर-मुसलमान हैं और पूजा करने के उनके तरीके में विश्वास करते हैं. अब उनका सारा गुस्सा हिंदू वर्चस्व वाले प्रबंधन पर है. उनकी मांग है, ''यहां नमाज होती थी और पहली मंजिल पर होनी चाहिए.'' इस धर्मस्थल की खासियत ही अब खतरे में आ गई है.

