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दास्‍तान भटनेर दुर्ग की: धरोहर से बड़ा धोखा

एक नगर की पहचान बने भटनेर दुर्ग की सार-संभाल पर 88 लाख रु. खर्च, पर हालत बद से बदतर होती जा रही है. सामाजिक कार्यकर्ता प्रवीण मेहन के अनुसार आरटीआइ के तहत पता चला कि किले में बागवानी पर ही 25 लाख रु. खर्च हुए हैं लेकिन मौके पर न तो कोई बाग है और न पौधे.

टूटी दीवारें दिखाते सामाजिक कार्यकर्ता प्रवीण मेहन
टूटी दीवारें दिखाते सामाजिक कार्यकर्ता प्रवीण मेहन
अपडेटेड 28 फ़रवरी , 2012

हमारे अतीत को सहेजा जाना है, पर लगता है कि अतीत की जगह वर्तमान को भी नष्ट किया जा रहा है.’ यह कहते हुए हनुमानगढ़ के साहित्यकार ओम पुरोहित 'कागद' भटनेर दुर्ग की ओर इशारा करते हैं, जो धीरे-धीरे खंडहर में तब्दील होता जा रहा है. भटनेर ने अपने शुरुआती काल में अनेक आक्रमण झेले. वक्त के थपेड़ों का मजबूती से मुकाबला किया, लेकिन समय की मार और शासन की अनदेखी ने जैसे बुढ़ा रहे भटनेर पर चार लट्ठ और जड़ दिए हैं. यह तब है जब केंद्र सरकार उसकी मरम्मत और सार-संभाल के लिए हर साल लाखों रुपए का बजट मंजूर करती है और यह पैसा कागजों में खर्च भी होता है.

हनुमानगढ़ के सामाजिक कार्यकर्ता प्रवीण मेहन एक दिन किले में टहलने पहुंचे तो भीतर की हालत देखकर दंग रह गए. आए दिन वहां चलने वाला मरम्मत का काम बाहर से भी देखा जा सकता है. पर अंदर जाने पर पता चला कि मरम्मत के इस काम के बावजूद किले की हालत सुधरना तो दूर, उससे भी बदतर हो रही है. सूचना का अधिकार के तहत भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के जयपुर मंडल कार्यालय से हासिल सूचना तो एक तरह से होश उड़ाने वाली है.

साल 2005 से 2010 के दौरान किले में रखरखाव, विशेष मरम्मत, बड़े बरसाती नाले, चारदीवारी, बुर्ज, मुख्य प्रवेश द्वार और संपर्क मार्ग वगैरह के काम पर 88 लाख रु. खर्च किए जा चुके हैं. किले में अकेले बागवानी पर ही 25 लाख रु. का बजट खपाने की बात सामने आई है. लेकिन मौके पर न तो बाग है और न ही पौधे. बुर्ज ढहते लगते हैं, बरसाती नाला मिट्टी से अटा पड़ा है, तो जगह-जगह लगी ईंटें उखड़कर नीचे गिर रही हैं. सार-संभाल के लिए आया बजट किस मद में खर्च हुआ? अब जवाब ढूंढ़ने की कसरत शुरू हुई है.

शुरुआत मेहन ने ही की. वे कहते हैं, ‘मैंने सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी तो जवाब देखकर दंग रह गया. यह तो खुला खेल फर्रुखाबादी लगता है. पैसे उठा लिए गए लेकिन धरातल पर कुछ नहीं हुआ. भटनेर अपनी हालत को देखकर खुद ही रो रहा होगा.’ मेहन ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) को चिट्ठी लिख मारी. सीबीआइ का एक दल पिछले दिनों किले का जायजा लेने पहुंचा और सारे हालात को देखा. सीबीआइ के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक एस.क्यू. अली बताते हैं, ‘एजेंसी जांच कर रही है कि सरकारी पैसे के दुरुपयोग का कोई मामला बनता है क्या? छानबीन में ऐसा पाया जाता है तो हम आपराधिक मामला दर्ज करेंगे.’ अली के मुताबिक, जांच रिपोर्ट अभी नहीं आई है.

पर जांच एजेंसी के दूसरे सूत्रों की बात मानें तो सरकारी पैसे के दुरुपयोग को लेकर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) के दसेक अफसर जांच के दायरे में हैं. ये इन कामों के टेंडरों के लिए बनाई गई कमेटियों में शामिल थे और काम की गुणवत्ता से लेकर भुगतान तक की जिम्मेदारी उनकी थी. एएसआइ के जयपुर मंडल के अधीक्षण पुरातत्वविद् सैयद जमाल 'सैन को लगता नहीं कि मरम्मत के काम में कोई धांधली हुई. ‘शिकायत कोई भी कर सकता है. हमने विभागीय स्तर पर कोई जांच नहीं कराई. काम कराया है और कई अफसरों ने उसकी मॉनिटरिंग की है. सीबीआइ जांच कर रही है, नतीजा देखेंगे.’ पड़ताल के दायरे में खुद जमाल भी हैं.

मामले का दूसरा पहलू भी है. एक बार मान भी लें कि एएसआइ वालों ने पूरा पैसा सही जगह खर्च किया, कोई गड़बड़ी नहीं हुई. पर इतना पैसा खर्च होने के बाद तस्वीर कुछ तो बदलनी चाहिए थी. अफसोस कि तस्वीर बदलना तो दूर, पहले से भी बदसूरत होती जा रही है. एक बार पैसा आने के बाद दीवार का काम कुछ होता है, दूसरी बार थोड़ा-बहुत बुर्ज का, तीसरी बार कोई और काम. कागद पूछते हैं, ‘किले का पुराना नक्शा क्यों नहीं सार्वजनिक किया जाता. टुकड़ों में छोटे-छोटे काम कराना पैसे खाने के तरीके हैं.’

बताते हैं, मुगल साम्राज्‍य की एकमात्र महिला शासक रजिया सुल्तान को कुछ समय तक भटनेर में कैद रखा गया था. इस तरह की कई और भी कहानियां हैं. बीकानेर रियासत के सूरत सिंह ने 1805 में अपने बेटों पदम सिंह और केसरी सिंह को साथ लेकर भटनेर को जीता, उस दिन मंगलवार था. हनुमान का वार माने जाने के कारण उन्होंने इस शहर का नाम हनुमानगढ़ रख दिया. इस तरह भटनेर इस इलाके की पहचान बना हुआ है. हनुमानगढ़ में किसी भी दिशा से दाखिल हों, सबसे पहले यह किला मुकुट की तरह दिखता है. अपनी इस विरासत से हो रहा मजाक यहां के लोग बर्दाश्त कर रहे हैं, अच्छा नहीं लग रहा.

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