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सरकारी नियुक्तियां: छिपाने का छल-छद्म

सरकार नियुक्तियों संबंधी कैबिनेट समिति (एसीसी) की फाइलों पर दर्ज  टिप्पणियों को जाहिर होने से रोकने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है और इस कोशिश में उसने केंद्रीय सूचना आयोग (सीआइसी) के आदेश एवं खुद हाइकोर्ट के निर्देश के खिलाफ दिल्ली हाइकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है.

अपडेटेड 21 जून , 2011

सरकार नियुक्तियों संबंधी कैबिनेट समिति (एसीसी) की फाइलों पर दर्ज  टिप्पणियों को जाहिर होने से रोकने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है और इस कोशिश में उसने केंद्रीय सूचना आयोग (सीआइसी) के आदेश एवं खुद हाइकोर्ट के निर्देश के खिलाफ दिल्ली हाइकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है.

भारतीय राजस्व सेवा के एक अवकाशप्राप्त अधिकारी पी.डी. खंडेलवाल ने 26 अप्रैल, 2007 को कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) को सूचनाधिकार कानून के तहत उस फाइल के निरीक्षण का अनुरोध किया था ''जिसके तहत 1999 में एसीसी का एक आदेश जारी किया गया था.''

डीओपीटी के जन सूचना अधिकारी ने उनका अनुरोध ठुकरा दिया. उनका कहना था कि वह फाइल सूचना के अधिकार कानून (आरटीआइ) से मुक्त है. खंडेलवाल का अनुरोध इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि ''कैबिनेट के दस्तावेज आरटीआइ कानून की परिधि से बाहर हैं.''

उन्होंने जब सीआइसी के समक्ष अपील की तो तत्कालीन मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्ला ने अक्तूबर 2008 में आदेश दिया कि उन्हें मांगी गई फाइल देखने की अनुमति दे दी जाए. लेकिन डीओपीटी ने उस आदेश का पालन नहीं किया. उलटे उसने इस आदेश को दिल्ली हाइकोर्ट में चुनौती दे दी. 30 नवंबर, 2009 को अदालत ने फैसला सुनाया कि डीओपीटी को सीआइसी के आदेश का पालन करना होगा.

लेकिन सरकार ने इस फैसले को भी चुनौती दे दी. हाइकोर्ट की दो जजों की पीठ ने 12 जुलाई, 2010 को इस फैसले पर स्थगनादेश दे दिया. खंडेलवाल कहते हैं, ''सरकार गलत ढंग से इस कार्रवाई का बचाव कर रही है. एसीसी की फाइलों पर की गईं टिप्पणियां सामने आ जाएंगी तो कई गलत काम उजागर हो जाएंगे. इसीलिए सरकार उन्हें सामने लाने से डर रही है.''

आरटीआइ कानून 'कैबिनेट के दस्तावेज,' जिनमें मंत्रि परिषद, सचिवों और अन्य अधिकारियों की चर्चाओं के रिकॉर्ड शामिल हैं, का खुलासा न करने की छूट देता है, बशर्ते मंत्रियों की परिषद के फैसले, उनके कारण और वह सामग्री जिसके आधार पर फैसले लिये गए, फैसला लेने और मामला पूरा हो जाने के बाद सार्वजनिक कर दिए जाएं,'' इसके बावजूद एसीसी की फाइलों के बारे में सूचनाओं के अनुरोध को ठुकरा दिया जाता है.

एसीसी केंद्र के संयुक्त सचिव और उससे ऊपर, सेंट्रल स्टाफिंग स्कीम के तहत उप-सचिव और उससे ऊपर, बैंकों के अध्यक्ष व प्रबंध निदेशक (सीएमडी), सार्वजनिक क्षेत्र के विभागों के निदेशक व सीएमडी, केंद्रीय सरकार के स्वायत्तशासी निकायों के प्रमुखों, पंचाटों, परिषदों, समितियों और आयोगों के सदस्यों व प्रमुखों, केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों के मुख्य सतर्कता अधिकारियों (सीवीओ), रेलवे बोर्ड के सचिवों, अध्यक्ष, सदस्यों और महाप्रबंधकों आदि की नियुक्तियों को मंजूरी देता है.

एसीसी द्वारा हर साल करीब 2,500 अधिकारियों की नियुक्तियों को मंजूरी दी जाती है. इसमें गृह मंत्री, संबंधित विभाग का मंत्री और प्रधानमंत्री शामिल होते हैं. एसीसी नियुक्ति को मंजूरी देने के लिए कोई बैठक नहीं करती है. फाइल एक विभाग से दूसरे विभाग में होते हुए बढ़ती रहती है और एसीसी के सदस्यों के पास पहुंचने से पहले वह आठ से नौ अधिकारियों के पास जा चुकी होती है.

मुख्य सतर्कता आयुक्त पद से हाल ही में हटे पी.जे. थॉमस की नियुक्ति के मामले में फाइल की टिप्पणियों को अनदेखा कर दिया गया था. हालांकि वह नियुक्ति उच्चाधिकार प्राप्त समिति (एचपीसी), जिसमें विपक्ष के नेता शामिल होते हैं, द्वारा की जाती है, न कि एसीसी द्वारा.

सुप्रीम कोर्ट ने उनकी नियुक्ति को रद्द करते हुए लिखा कि ''यदि एचपीसी जैसी वैधानिक संस्था संबंधित मामले में मिलीभगत को देखने में विफल रहती है...तो आधिकारिक मनमानेपन के आधार पर यह निर्णय रद्द हो जाता है.. जून 2000 से नवंबर 2004 के बीच डीओपीटी की कम से कम छह टिप्पणियों में थॉमस के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की गई थी.

इसके बावजूद अक्तूबर 2008 में केंद्रीय सतर्कता आयोग की ओर से दी गई हरी झंडी और सितंबर 2010 में तैयार डीओपीटी की सूचना में इन टिप्पणियों का कोई उल्लेख नहीं था.

जाहिर है, एसीसी की फाइलें खुल गईं तो कई मनमाने फैसलों की कलई खुल जाएगी. लेकिन इस समय सरकार कोई गलती नहीं करना चाहती और वह फाइलों को दबाए रखने की हरसंभव कोशिश कर रही है.

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