इंसेफेलाइटिस के चलते इस साल के पहले दस महीनों में 423 से ज्यादा मौतों के मूक गवाह बने गोरखपुर के बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज में इन दिनों कष्ट के साथ कलह के कांटे भी उग आए हैं. बीमारी से दो-दो हाथ करने की बजाए चिकित्सक अंदरूनी जंग में उलझे हैं. जिस शख्स पर चिकित्सा केंद्र की प्राथमिकताएं तय करने का जिम्मा है, उसके खिलाफ इल्जामों की लंबी फेहरिस्त है.
पिछले दिनों इंसेफेलाइटिस के मरीजों के लिए प्रस्तावित नए चिकित्सा केंद्र के स्थान को लेकर मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ आर. के. सिंह एक बार फिर अप्रिय विवादों में घिर गए. दरअसल इस साल इंसेफेलाइटिस के चलते हो रही ताबड़तोड़ मौतों पर आधी नींद से जागी प्रदेश सरकार ने सितंबर में घोषणा की कि इस रोग के लिए अलग से 400 बेड का अस्पताल बनाया जाएगा. प्रथम चरण में 100 बेड की एक इकाई स्थापित होनी है.
इसी बीच 29 सितंबर को प्राचार्य द्वारा बुलाई गई विभागाध्यक्षों की बैठक में एक प्रस्ताव पारित कर महानिदेशक चिकित्सा शिक्षा एवं प्रशिक्षण को भेजा गया, जिसमें कहा गया था कि 'मस्तिष्क ज्वर की वर्षों से जिम्मेदारी निभाते रहने के कारण मेडिकल कॉलेज में शिक्षा व शोध प्रभावित हो रहे हैं, लिहाजा प्रस्तावित अस्पताल का निर्माण मेडिकल कॉलेज में न करके अन्यत्र कहीं किया जाए.' यह खबर सार्वजनिक होने के बाद इंसेफेलाइटिस को लेकर चिंतित संगठनों से लेकर प्रशासन तक में तीखी प्रतिक्रिया हुई.
उसी दिन मंडलायुक्त के.रवींद्र नायक ने बाकायदा विज्ञप्ति जारी कर प्राचार्य के प्रस्ताव को 'गुमराह करने वाला' बताते हुए कहा कि 'प्राचार्य अपना मानसिक संतुलन खो बैठे हैं. 'और' उनके विरुद्ध कार्रवाई प्रस्तावित की जाएगी.' इसके तुरंत बाद प्राचार्य ने इसे 'विभागाध्यक्षों की राय' बताते हुए अपना पल्ला झाड़ लिया. प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने वाले एक विभागाध्यक्ष नाम जाहिर न किए जाने की शर्त पर कहते हैं, ''यह प्रस्ताव उन्हीं का था. मगर बाद में वे मुकर कर हम लोगों की स्थिति खराब कर रहे हैं.'' वैसे आयुक्त ने उनके विरुद्ध तीखी टिप्पणी पहली बार नहीं की है.
इस वर्ष एक अगस्त को प्रमुख सचिव चिकित्सा शिक्षा को भेजे गए पत्र में रवींद्र नायक ने डॉ. आर.के. सिंह की कथित अनियमितताओं की बाबत लंबा ब्यौरा पेश किया था. प्राचार्य के खिलाफ हफ्तों तक धरना-प्रदर्शन करने वाले सपा नेता राधेश्याम सिंह का आरोप है कि ''प्राचार्य ने परिसर में डॉक्टरों तथा कर्मचारियों को भी कई गुटों में बांट दिया है ताकि उनकी कुर्सी बची रही.''
बहरहाल, आरोपों और सफाइयों के बीच अदालती दौर जारी है जहां 12 अक्तूबर को उन्होंने थोड़ी मोहलत और हासिल कर ली है मगर इस अवधि में परिसर की कलह थमेगी, इसके संकेत फिलहाल नहीं दिखते जिसका खामियाजा अंततः यहां की सांस्थानिक सेहत को ही भुगतना पड़ेगा.

