उत्तराखंडः खर्च करने की नई ताकत
उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था किसी जमाने में सैनिकों और इस पहाड़ी राज्य के बाहर काम कर रहे कर्मचारियों के भेजे मनीऑर्डरों से संचालित होती थी.
लेकिन यह राज्य अब आखिरकार उन रियायतों का स्वाद चख रहा है, जो केंद्र सरकार ने 2003 के बाद से यहां उद्योगों को कायम होने के लिए दी थीं.
ये रियायतें वैसे तो 2010 में वापस ले ली गई थीं, लेकिन इन सात सालों में राज्य के उधम सिंह नगर, हरिद्वार और देहरादून जैसे इलाकों की विशाल मैदानी भूमि पर कई औद्योगिक इकाइयां कायम हो गई हैं.
इससे समृद्धि आई और उससे संपदा विकसित होती गई. 77 वर्षीय मुख्यमंत्री भुवनचंद्र खंडूरी कहते हैं, ''चूंकि 70 फीसदी स्थानीय लोगों को रोजगार देने का सरकारी आदेश है, इस वजह से रोजगार पैदा हुआ है और पलायन कम हुआ है.'
राज्य की राजधानी देहरादून शिक्षा के एक बड़े केंद्र के तौर पर उभरी है और इससे यहां हाउसिंग की मांग पैदा हो गई है जिसमें पिछले कुछ सालों में बड़ी तादाद में लोगों ने घर और फ्लैट खरीदे हैं. राज्य में अब निजी क्षेत्र में 96 इंजीनियरिंग कॉलेज हैं.
बिहार और उत्तर प्रदेश के पड़ोस के सहारनपुर, मुजफ्फरनगर और नैनीताल जिलों के कई लोग अपने बच्चों को देहरादून और नैनीताल के स्कू लों में दाखिला दिलाते हैं.
9 नवंबर, 2000 को उत्तराखंड की स्थापना से शुरू हुआ कंस्ट्रक्शन का चढ़ाव, अभी तक उतरा नहीं है. उधम सिंह नगर जिले के रहने वाले और मंत्री पुष्कर सिंह धामी कहते हैं, ''देहरादून और दूसरे शहरों के बाजार उपभोक्ताओं से पटे पड़े हैं. लोग अपना जीवनस्तर सुधारना चाहते हैं.''
कुमाऊं विश्वविद्यालय के उपकु लपति वी.पी.एस. अरोड़ा इससे सहमति जताते हैं, ''उत्तराखंडियों की खानपान की आदतें बदल गई हैं. जिन घरों में पहले सिर्फ परंपरागत स्थानीय भोजन पकता था, अब वहां बाहर से आई खाने की चीजें देखी जा सकती हैं.''
उत्तराखंड की स्थापना ने कई लोगों को अमीरी का मौका दे दिया है. यहां तक कि छोटे किसानों ने भी हॉर्टिकल्चर की तरफ रुख कर लिया है और वे फल और सब्जियां उगाने लगे हैं. नई नवेली अमीरी ने मकानों और कारों के लिए बाजार खोल दिया है.
उत्तराखंड की जनसंख्या, जो 2011 की जनगणना के हिसाब से 1.01 करोड़ है, का रोजगार वहां की जमीन के हिसाब से तय होता है. जहां उधम सिंह नगर, हरिद्वार और देहरादून जैसे मैदानी इलाकों के लोग खेती और उद्योगों से अपनी गुजर-बसर करते हैं, वहीं पहाड़ी जिलों के लोगों को रोजगार की तलाश बाहर जाकर करनी पड़ती है.
सशस्त्र बलों में पहाड़ी इलाकों के लोगों की भारी तादाद स्थानीय संपदा के सृजन में एक अहम योगदान देती है. यही काम वे लोग करते हैं, जो अपनी रिटायरमेंट के बाद यहां बसना चाहते हैं. और उनके बीच देहरादून बहुत लोकप्रिय है.
देश के सबसे छोटे राज्यों में से एक उत्तराखंड ने दिखा दिया है कि जब मामला उपभोक्ताओं के किए जाने वाले खर्च का हो, तो उसे छोटा-मोटा नहीं माना जा सकता.
गोवाः बारह महीने का त्यौहार
पणजी के रहने वाले व्यावसायी संदेश सढाले कहते हैं, ''2010 तक गोवा में एक भी ऑडी नहीं थी. आज राज्य की सड़कों पर कम-से-कम 50 ऑडी और 100 से ज्यादा मर्सिडीज हैं.''
जहां तक उपभोक्ता बाजार का ताल्लुक है, महंगी कारों की तादाद में यह आंखें खोल देने वाली बढ़ोतरी, गोवा को सबसे ज्यादा विकसित छोटा राज्य करार दिए जाने के सबूतों में से महज एक है.
गोवा के लोगों की बढ़ती क्रय क्षमता तीन उद्योगों पर टिकी हुई है-खनन, पर्यटन और गैंबलिंग. ये उद्योग राज्य में लगभग 60 फीसदी रोजगार पैदा करते हैं.
राज्य के 16,000 करोड़ रु. के खनन उद्योग में लगे लगभग 15,000 लोग रोजाना 1,800 रु. प्रति व्यक्ति की दर से कमाते हैं.
नतीजा यह है कि गांववाले भी मोटरसाइकिलें खरीदने और अपने घरों की मरम्मत करवाने का खर्च उठा सकते हैं. गोवा चेंबर ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री के एक पदाधिकारी किरीट मगनलाल कहते हैं, ''खनन घोटालों के विवादों में फंसा हुआ है, लेकिन इस उद्योग का सकारात्मक पहलू यह है कि इसने संपत्ति पैदा कर दी है.''
राज्य को दुनिया के छुट्टी मनाने के ठिकाने के तौर पर पेश करने के गोवा टूरिज्म के निदेशक स्वप्निल नाईक की कोशिशें कामयाब रही हैं.
2010 में 26.42 लाख से ज्यादा घरेलू और विदेशी पर्यटक गोवा आए, जो 2009 के आंकड़े के लिहाज से 5.6 फीसदी की बढ़त है. पर्यटन आधारित लघु उद्योगों में कर्मचारियों की औसत दैनिक आमदनी 1,500 रु. है.
राज्य में 22 कैसिनो को इजाजत देने के सरकार के फैसले से लगभग 5,000 लोगों को रोजगार मिला है. 1,000 लोगों के स्टाफ को कैसिनो 25,000 रु. की मासिक तनख्वाह देते हैं.
गोवा की सबसे बड़ी कैसिनो कंपनी सीपी ग्रुप के प्रवक्ता श्रीनिवास नाईक कहते हैं, ''12वीं क्लास के पहले ही पढ़ाई छोड़ देने वाला भी कैसिनो में आसानी से 25,000 महीने कमा सकता है.''
अप्रैल, 2010 से फरवरी, 2011 तक 40 से 50,000 रु. के बीच की कीमत वाले 18,555 और 50,000 रु. से ज्यादा कीमत वाले 6,217 दोपहिया वाहन राज्य में बिके हैं.
इसके अलावा, इसी दरम्यान 3 से 5 लाख रु. के बीच की कीमत वाली 7,222 और 5 लाख रु. से अधिक की कीमत वाली 4,907 कारें भी इसी दौरान बिकी हैं.
राज्य के आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक 50,000 से ज्यादा वाहन हर साल पंजीकृत होते हैं. 30 नवंबर, 2010 को पंजीकृत वाहनों की संख्या 7,65,588 थी.
बढ़ी हुई आमदनी सिर्फ बढ़े हुए खर्चों में नहीं, बल्कि बढ़ी हुई बचत में भी नजर आती है. इसलिए अचंभा नहीं कि 30 सितंबर, 2010 को गोवा में बैंकों के 556 कार्यालय थे. 14,000 लोगों पर एक बैंक शाखा के राष्ट्रीय औसत के उलट यहां हरेक 4,000 लोगों के बीच में एक बैंक शाखा है.

