अब दुनिया गोल नहीं
थॉमस एल. फ्रेडमैन
पेंगुइन बुक्स,
नई दिल्ली-17,
कीमतः 350 रु.
प्रसिद्ध पत्रकार/लेखक थॉमस एल. फ्रेडमैन की विश्वप्रसिद्ध कृति 'द वर्ल्ड इ.ज फ्लैट' का यह हिंदी अनुवाद इक्कीसवीं सदी की वैश्वीकृत दुनियां का एक जीवंत विवरण है, जिसमें बदलती वैश्विक व्यवस्था का चित्रण है. इस पुस्तक को पढ़कर समझ्ने के लिए थोड़ा इतिहास में पीछे जाना होगा, जब सोवियत रूस बाजार की ताकतों की आंधी में बिखर गया था. उस वक्त के युग पुरुष मिखाइल गोर्वाचेव शायद दुनिया में सत्ता के संतुलन को बदलने वाले सबसे बड़े किरदार थे.
उस वक्त की सचाई यह मानी जा रही थी कि दुनियां एक ध्रुवीय हो गई है और वह एकमात्र ध्रुव था अमेरिका. अमेरिका के वैश्विक एकाधिकार और प्रभुत्व पर कोई प्रश्नचिक्क नहीं लगा सकता था. यह सब दो दशक तक चला भी. लेकिन अब इतिहास में अगला पन्ना पलटकर सामने आ रहा है. यह पुस्तक उसी अगले पन्ने का ब्यौरा है. दुनिया अब समतल है और समतल दुनिया में कई नए और प्रभावी खिलाड़ी अमेरिकी आर्थिक प्रभुत्व को चुनौती दे रहे हैं.
प्रमुख रूप से दो एशियाई महाशक्तियां भारत और चीन. शायद इसी चुनौती के आलोक में फ्रेडमैन अमेरिका को स्वयं को पुनर्स्थापित करने के लिए प्रेरित करना चाह रहे हैं और सुझाव भी दे रहे हैं कि अमेरिका को अपनी जीवनशैली में कैसे बदलाव लाने होंगे. वर्ष 2008 की विश्वव्यापी मंदी और आर्थिक संकट ने दो अलग-अलग तरह के नजारे प्रस्तुत किए.
एक तरफ इसने जहां अमेरिकी नेतृत्व वाले खुले बाजार और वैश्वीकरण पर आधारित पूंजीवाद की पश्चिमी अवधारणा पर सवालिया निशान खड़ा किया वहीं दूसरी ओर चीन और भारत के रूप में दुनिया को ऐसी आर्थिक ताकतों का उदाहरण प्रस्तुत किया जो विश्वव्यापी मंदी के प्रभाव से लगभग अछूते रहे. इस मंदी ने ही यह अवधारणा पुष्ट की कि दुनिया तेजी से समतल हो रही है. और इस समतल दुनिया का एक नया लेकिन प्रभावशाली खिलाड़ी भारत होगा.
लेखक का यह कथन कि ''मैं भारत की सिलिकॉन वैली, बंगलुरू में कोलंबस की सी खोज पर आया था'' एक रोमांच की अनुभूति देता है. यह ठीक ही है कि जब कोलंबस भारत की खोज में आया था तो उसे जिस संपदा की तलाश थी वह धातु, रेशम और समाले जैसी चीजें थीं, जिसे लेखक ने हार्डवेयर माना है. उन दिनों इन्हीं चीजों से अमीर हुआ जाता था.
लेकिन इक्कीसवीं सदी के धनार्जन के स्त्रोत हैं सॉफ्टवेयर, कंप्यूटर प्रोग्राम, कॉलसेंटर इत्यादि. पुस्तक में जो बुनियादी मुद्दे उठाए गए हैं, वे उसी सॉफ्टवेयर की शक्ति से जुड़े हैं. आखिर क्या वजह है कि अमेरिका और अन्य औद्योगिक देशों में सूचना ह्ढौद्योगिकी और सेवाओं के आउटसोर्सिंग के लिए भारत महत्वपूर्ण हो गया है? लेखक के उस कथन की बड़ी सार्थकता है कि कोलंबस भारत के भ्रम में अमेरिका पहुंच गया और उसने सोचा कि वह भारत का ही एक हिस्सा है. लेकिन लेखक सचमुच भारत आया और उसे यह अमेरिका जैसा ही लगा.
इस पुस्तक में भारत की सॉफ्टवेयर उद्योग की क्षमता और संभावनाओं की काफी सारगर्भित व्याख्या की गई है. यह सही है कि आज अपने सॉफ्टवेयर उद्योग की क्षमता के कारण भारत एक विश्वस्तरीय खिलाड़ी है और उससे अमेरिका भी आशंकित है. यही ज्ञान युग की देन है. भले ही अमेरिकी दार्शनिक बेंजामिन फ्रैंकलिन ने कहा था कि ज्ञान ही सत्ता है. आज इसे साबित तो भारत ने ही किया. और इसी ज्ञान सत्ता ने दुनिया को समतल बनाया.
लेखक ने वैश्वीकरण को तीन युगों में बांटा है. पहला दौर 1492 से 1800 तक का, जब कोलंबस ने अपनी यात्रा के जरिए नई और पुरानी दुनिया के बीच परस्पर व्यापार का रास्ता खोला. दूसरा दौर लेखक ने 1800 से 2000 तक को माना है, जिसमें दुनिया को एकीकृत करने वाली शक्तियां मुख्य रूप से बहुराष्ट्रीय कंपनियां रहीं. वैश्वीकरण का तीसरा दौर वर्तमान दौर है, जिसमें सॉफ्टवेयर और डिजिटल तकनीक ने बहुत-से नए खिलाड़ियों को विश्व स्तर पर प्रभावशाली बना दिया.
लेखक ने अमेरिका के लिए कई युक्तियां बताई हैं ताकि उसका वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिके रहना संभव हो सके. मुख्य रूप में क्रियाशीलता और कल्पनाशीलता बढ़ाने पर बल देने की बात करते हुए लेखक ने अमेरिका को एक बार फिर से अपने सोच में बदलाव लाने और इस सचाई को स्वीकारने की हिदायत दी है कि दुनिया अब गोल नहीं. रोचक और बेहद तथ्यपरक पुस्तक. आज के युग की एक आंखों देखी दास्तान. पर इसके कृत्रिम अनुवाद ने पूरी किताब का मजा किरकिरा करके रख दिया है.

