उन्होंने 10 जनवरी, 2011 को देश के सबसे महत्वपूर्ण मदरसों में से एक दारुल उलूम देवबंद का मोहतमिम बनने के तुरंत बाद अंग्रेजी के एक अखबार से बातचीत में कहा कि नरेंद्र मोदी के गुजरात में मुसलमानों के लिए आर्थिक अवसर हैं.
61 वर्षीय गुलाम मोहम्मद वस्तानवी के हवाले से कहा गयाः आइए हम आगे बढ़ें, दंगे आठ साल पहले हुए थे और आज मुसलमान गुजरात में विकास के लाभभोगी हैं.
अखबार में छपे उनके इस बयान को मोदी की तारीफ मान लिया गया और सहारनपुर में स्थित जिस मदरसे के संस्थापकों ने 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ बगावत की थी वहां के तुलबा (छात्र) और उस्तादों ने अपने ही मोहतमिम के खिलाफ बगावत का बिगुल बजा दिया.
मोहतमिम को हटाने की मांग करते हुए मदरसे के 40 तुलबा 24 जनवरी को भूख हड़ताल पर बैठ गए. मोहतमिम को लेकर हंगामे में समाचार माध्यमों ने आग में घी का काम किया.
उर्दू टाइम्स ने लिखा, ''मौलाना वस्तानवी के बयानों ने न सिर्फ मुसलमानों को चौंका दिया, उनसे मोदी भी हैरत में रह गए होंगे.'' आग के संपादकीय में कहा गयाः ''मौलाना को बताना चाहिए कि जघन्य अपराध अंजाम देने वाले को माफ करने का अधिकार उन्हें किसने दिया है.''
लेकिन वस्तानवी के समर्थकों की भी कमी नहीं थी. इस्लामी विद्वान मौलाना वहीदुद्दीन खान ने कहा, ''उनका बयान मुस्लिम समुदाय में सकारात्मक सोच लाने की दिशा में एक कदम था.'' वस्तानवी विरोधी और समर्थक बयानों से दारुल उलूम विवाद का केंद्र बन गया, जो आम मुसलमानों के साथ ही खुद वस्तानवी को भी नागवार था.
वस्तानवी ने 23 फरवरी को मजलिस-ए-शूरा की बैठक में तीन मामलों की जांच के लिए कमेटी बनाई. जांच के तीन मुद्दे थेः मोदी को क्लीन चिट देने संबंधी मीडिया में छपे कथित बयान और मूर्तियां बांटने के इल्जाम की हकीकत मालूम करना; मोहतमिम को हटाने के लिए तुलबा की मुहिम और उन्हें भड़काने वाले उस्तादों का पता लगाना.
लेकिन इस जांच कमेटी की 23 जुलाई को शूरा में पेश की गई रिपोर्ट अधूरी थी. उसमें वस्तानवी से जुड़े मुद्दे की जांच की गई और बाकी मुद्दों को छोड़ दिया गया.
संस्थान के संविधान को ताक पर रखकर वोटिंग कराई गई और चार सदस्यों को छोड़कर बाकी ने उनके खिलाफ वोट दिया. पहले इस्तीफा न देने पर आमादा वस्तानवी ने ''दारुल उलूम की गरिमा और प्रतिष्ठा बनाए रखने की खातिर शूरा के फैसले को कबूल कर लिया.''
हमेशा आगे की सोचने वाले वस्तानवी कहते हैं, '' मुझे वहां से हटाया जाना गैर-आईनी (असंवैधानिक) और गैर-दस्तूरी था. लेकिन मैं इसे कोर्ट में चुनौती नहीं दूंगा. उसे मैंने भुला दिया है.''
दरअसल, वस्तानवी की अग्निपरीक्षा 10 जनवरी से ही शुरू हो गई थी, जब मोहतमिम के रूप में उनका चयन हुआ था. 21 सदस्यीय शूरा के मौजूद 14 सदस्यों में उन्होंने जमीयतुल उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख मौलाना अरशद मदनी और नायब मोहतमिम खालिक मद्रासी को हराया था. मजेदार बात यह है कि वस्तानवी की बेटी की शादी मदनी के बेटे से हुई है और मदनी ही उनके सबसे ताकवतर प्रतिद्वंद्वी थे.
मदनी परिवार का दारुल उलूम के साथ लंबा रिश्ता रहा है, जो 1930 के दशक में मौलाना 'सैन अहमद मदनी के देवबंद का मोहतमिम बनने के समय से है. मदनी के लिए चुनाव जीतना परंपरा को कायम रखने की तरह था, पर वे एक ऐसे बाहरी व्यक्ति से हार गए, जिसका बदलाव का एजेंडा था.
दक्षिण गुजरात के वस्तान गांव में जन्मे और सूरत के पास ताड़केश्वर मदरसे में शिक्षित वस्तानवी महाराष्ट्र के नंदूरबार जिले के अक्कलकुआं स्थित जामिया इस्लामिया इशाअतुल उलूम में एक सुधारवादी और शिक्षाविद् के तौर पर फले-फूले. बीती को बिसार दीजिए. एमबीए डिग्रीधारी मौलाना ने इस संस्था को 1982 में स्थापित किया था. वस्तानवी अब फिर जामिया अक्कलकुआं में पहुंच गए हैं.
वे कहते हैं, ''अब आप जामिया अक्कलकुआं के बारे में बात कीजिए. जामिया के कैंपस में 15,000 बच्चे हैं. इसके 10 डिग्री कॉलेज और सात डिप्लोमा कॉलेज हैं. देश भर में इसकी विभिन्न शाखाओं में दो लाख बच्चे पढ़ रहे हैं.'' वस्तानवी ने उस विवाद को भी बिसरा दिया जो 2011 के शुरुआती सात महीनों में सुर्खियों में छाया रहा.

