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निराशाजनक: जीडीपी दर इस साल -8% रहने का अनुमान

कोविड-19 के मामले लगातार बढ़ रहे हैं और लगातार बिगड़ती अर्थव्यवस्था के बीच सरकार ने कोई नया आर्थिक सहायता पैकेज अभी तक घोषित नहीं किया है

इलस्ट्रेशन: तन्मय चक्रवर्ती
इलस्ट्रेशन: तन्मय चक्रवर्ती
अपडेटेड 22 सितंबर , 2020

देश की अर्थव्यवस्था को अनलॉक करने के प्रयास चरणबद्ध तरीके से देशभर में चल रहे हैं, इसके बावजूद रेटिंग एजेंसियां वित्त वर्ष 2020-21 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में भारी गिरावट की आशंका व्यक्त कर रही हैं. क्रिसिल ने मई में जीडीपी ग्रोथ रेट -5 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया था लेकिन अब उसने इसे और घटाकर -9 प्रतिशत कर दिया है. केयर रेटिंग्स ने इस साल के लिए जीडीपी ग्रोथ रेट -6.4 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया था, पर अब उसने इसे और घटाकर -8 से -8.2 प्रतिशत कर दिया है. अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने चालू वित्त वर्ष के लिए -4.5 जीडीपी विकास दर का अनुमान जाहिर किया है लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि इसमें आगे और बदलाव की गुंजाइश है.  

इन निराशाजनक अनुमानों की पृष्ठभूमि में एक वजह दरअसल 31 अगस्त को सरकार की तरफ से घोषित -23.9 प्रतिशत जीडीपी ग्रोथ रेट है. एक कारक कोविड-19 मरीजों का देश में लगातार बढ़ते जाना है जो कि 13 सितंबर को 94,372 की बढ़ोतरी के साथ 47.5 लाख पार कर गया. महामारी का चरम (इसके बाद नए केसों में बढ़ोतरी की दर गिरेगी या थमेगी) जिसके भारत में अब तक दिख जाने का अनुमान था लेकिन दूर तक अभी नजर नहीं आ रहा है. अर्थव्यवस्था की हालत और खराब इसलिए हो रही है क्योंकि कोरोना के मामले उन राज्यों में ज्यादा बढ़ रहे हैं जो जीडीपी में बड़ी हिस्सेदारी रखते हैं. महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश का देश की जीडीपी में कुल 36 प्रतिशत का योगदान है और इनमें 7 सितंबर तक देश के आधे से ज्यादा कोविड मरीज थे. महामारी देश के गांवों में भी पहुंच गई है-31 अगस्त तक ऐसे जिले जिनमें 1,000 से ज्यादा मरीज हैं, आधे मरीज ग्रामीण इलाकों में हैं जो कि जून के 20 प्रतिशत से ज्यादा है.

नई राहत नहीं 

जीडीपी के निराशाजनक अनुमानों के पीछे केंद्र सरकार के अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए एक और बड़े आर्थिक पैकेज का इंतजार है जो कि मई में घोषित किए गए 20 लाख करोड़ के पैकेज से अलग होगा (मई के पैकेज में रिजर्व बैंक की तरफ से घोषित उपायों की रकम भी शामिल कर ली गई थी). कई विशेषज्ञों ने कहा भी कि जो आर्थिक पैकेज घोषित किया गया उसका आकार अर्थव्यवस्था के सभी सेक्टरों को पहुंची गहरी चोट के लिहाज से अपर्याप्त है. कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए जितने भी लॉकडाउन लगे उन सबसे उद्योगों में सेवा क्षेत्र को गहरा झटका लगा है. साल 2019-20 में भारत के ग्रॉस वैल्यू एडेड (जीवीए, अर्थव्यवस्था के किसी सेक्टर में सेवा और माल के उत्पादन को नापने का एक पैमाना) में सेवा क्षेत्र का योगदान 55 प्रतिशत रहा और इस क्षेत्र ने देश के 31.5 फीसद कामगारों को रोजगार दिया था.  

सुस्त खपत 

आर्थिक पटल पर केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था ही कुछ उम्मीद बंधाती है. क्रिसिल को अनुमान है कि देश की कृषि जीडीपी इस वर्ष साल-दर-साल के हिसाब से 2.5 फीसद की दर से बढ़ेगी. इसके बावजूद खासकर ट्रैवल, खेल और मनोरंजन के क्षेत्रों में खपत के सुस्त रहने का अनुमान है. खुदरा महंगाई के ऊंचा रहने (अगस्त में यह 7 फीसद की ओर बढ़ रही थी) के कारण लोगों की डिस्पोजेबल इनकम घटने का अनुमान है. क्रिसिल की रिपोर्ट कहती है, “अनिश्चित (आर्थिक) वातावरण, क्षमता का कम उपयोग (आने वाले समय में और गिरने की आशंका), और कम मुनाफे का शिकार कॉर्पोरेट्स निजी कॉर्पोरेट निवेश घटाएंगे.” 

हालांकि केयर रेटिंग्स का कहना है कि कृषि और इससे जुड़ी गतिविधियों में इस साल 3.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी दिख सकती है, खरीफ और रबी दोनों ही फसलों का उत्पादन सामान्य रहेगा. इंडस्ट्रियल ग्रोथ मोटे तौर पर नकारात्मक रहेगी, माइनिंग में -9.4 प्रतिशत, मैन्युफैक्चरिंग में -11.7 प्रतिशत और इलेक्ट्रिसिटी में -1.3 फीसद की दर से वृद्धि होने का अनुमान है. मैन्युफैक्चरिंग की ग्रोथ चौथी तिमाही तक सकारात्मक हो सकती है क्योंकि तब तक अनलॉक का पूरा असर दिख चुका होगा.  

ये सभी संकेतक अर्थव्यवस्था में गिरावट के संकेत देते हैं. लिहाजा यह आवश्यक हो जाता है कि सरकार सभी आर्थिक गतिविधियों को सक्रिय करने की इजाजत दे और इसके साथ कोविड-19 की वैक्सीन लाने के अथक प्रयास भी सुनिश्चित करे.

अनुवादः मनीष दीक्षित

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