एक बड़ी चिंता व्यंग्यकारों की बिरादरी में उभरकर आई है. मल्लब...ये भी कोई बात हुई कि साल भर स्साला रंग ई खेलते रहो, होली सरीखे सालाना मिलावटी फेस्टिवल के लिए कुछ छोड़ो ही न? मुओं ने पूरे साल होली जैसी किचाहिन किए रखी. एक के बाद एक, उन्नत किस्म के चेहरों ने बढ़-चढ़कर कोयले से मुखौटे प्रेपेयर करवाए और धारण करने के लिए शुभ-अशुभ वार-त्यौहारों तक की परवाह न की. सर्जन और घुटे व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी तो कहते हैं, 'कालिख इतनी जगह निकली कि उसे ह्वाइट वाश करते-करते सफेद रंग भी नहीं बचा.' चुटकी काटने वाले सुशील सिद्धार्थ इस बात से भन्नाए हैं कि नेता लोग विधानसभा में बैठकर रंगारंग कार्यक्रमों के सांस्कृतिक दृश्यों का नेत्रलाभ प्राप्त कर रहे हैं. लेकिन बुजुर्ग पत्रकार-व्यंग्यकार राजकिशोर इस उत्तेजक ऊलालामय माहौल में भी रौ में नहीं बहे, खुद को संभाले रखा और अपनी ही तारीफ में कुछ लिखने पर उतरे तो देखिए कि क्या-क्या न लिक्खा. तो प्यारे बांचको, शुरू कीजिए बांचना...
रंग की जंग से किचाहिन: सुशील सिद्धार्थ (व्यंग्यकार, समीक्षक)
यह कितने आनंद की बात है कि अब किसी खास दिन वाली होली का इंतजार नहीं रहता. बोली, ठिठोली, हुड़दंग, रंग, कीचड़ और बड़बड़ की शानदार खासियतें पूरे साल हर दिन सराबोर करती रहती हैं. जनता कितनी खुश है कि वाह, बौछारें रुकने का नाम ही नहीं ले रहीं. 'गरीब की लुगाई गांव भर की भौजाई' वाली कहावत तो सुनी थी, इस पब्लिक के लिए कौन-सी कहावत सुनाऊं, जिसे बहुत सारे अपनी-अपनी तरह से भिगो रहे हैं. यह दल हो या वह दल, जिसका दिल आता है ठिठोली कर लेता है. कपड़े जरा-सा सूखे नहीं कि फिर लो चार बाल्टी महंगाई का रंग. हालत ऐसी है कि पकवानों के फोटो देखकर दिल बहलाने का मन करता है. गुझिया बनी भी है तो खाते-खिलाते डर लगता है. चलिए महंगाई से रो-धोकर निपट भी लें तो मैदान में एक और पार्टी उतर आती है. भारत वह देश है जहां होली जैसा त्यौहार आते ही मिलावट-शिल्पी अपना कौशल दिखाने के लिए मचल उठते हैं. पेंट से दूध और कूड़े से खोया तैयार करने के वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशालाएं खोल देते हैं. हिम्मत हो तो बनाइए और खाइए! कायदन, ऐसे उच्चकोटि के मिलावटश्री को होली पर सम्मानित करना चाहिए.होली में मुंह काला नहीं किया या करवाया तो क्या खाक होली मनी! अहा, याद करिए बीते महीने! तमाम राजनीतिक पार्टियां इस काम को अपने राष्ट्रीय कार्यक्रम में शामिल कर चुकी हैं. अब ऐसा मुंह मुश्किल से मिलता है, जिस पर रंग मला जा सके. रंगों की ऐसी दास्तान सुननी हो तो किसी चैनल पर आने वाली बहस सुनिए. आपको होली के मौके पर बनारस में होने वाले हाहाकारी कवि सम्मेलन की याद आ जाएगी. तू मुझ पर इतने करोड़ के भ्रष्टाचार का आरोप लगा रहा है, तेरी सरकार थी तो इतने करोड़. येल्ले...येल्ले...देश की सभी दिशाओं में बिखरे भ्रष्टाचार के रंगों पर बलिहारी जाने का मन करता है. इनके बीच तिरंगे की उदासी की परवाह कौन करता है. ऐसा नहीं कि नए होरिहार सामने नहीं आ रहे. बीते दिनों अण्णा हजारे ने एक खास पिचकारी में खास रंग भर कर फेंकने शुरू किए. मगर लीजिए, चंद दिनों में ऐसे 'ऑफ कलर' हुए कि टीम की थीम ही बदल गई. लोगों ने मना किया था कि बाएं नथुने से सांस घसीटकर दाएं से छोड़ना आसान है, करते रहो...मगर बाएं और दाएं की सियासत को समझना बच्चों का खेल नहीं. निकल गया तेल. दिल्ली के रामलीला मैदान में ग्वाल बालों ने वह हल्ला बोला कि बाबा गोपी के वस्त्र पहनकर तिड़ी हो लिए. कपालभाति की जगह कपालभंजन की नौबत आ गई थी. ऐसी लीलाओं के कारण ही यह गाना पूरे साल बजता रहा-गोविंदा आला रे!
हम इस खुशफहमी में भी रहते हैं कि पूरे साल के गिले-शिकवे गले मिलकर दूर हो जाते हैं. पिछड़ी मानसिकता की यह खुशफहमी हमारे प्रयत्नों से दूर हो रही है. गले मिलते और गला काटते लोग ही समाज की शोभा हैं. यह परंपरा जितनी बढ़ेगी, देश उतनी ही तरक्की करेगा. यह भी देखकर तबीयत खुरमा-पापड़ हो जाती है कि अब परंपरा के नाम पर चंद फिल्मी गाने हमारी लोक संस्कृति हैं. तमाम लोकगीतों पर कूड़ा डालिए. संस्कृति की रक्षा का जिम्मा फिल्मों पर डालकर हम चैन की सांस ले सकते हैं.
होली का महत्व तब तक पूरा नहीं होता जब तक कीचड़ का वर्णन शामिल न हो. कीचड़ उछालने और कीचड़ में घसीटने का काम पूरे साल चलता रहता है. कई बार तो जिस पर नहीं उछाला जाता वह खुद कीचड़ में कूद पड़ता है. ऐसे ही साहसी लोग कल्चर को बचाते हैं. मैं सोच रहा हूं कि इस काम को पेटेंट करा लूं. इसका संरक्षण जरूरी है. होली रंगों का त्यौहार है. रंग की यह जंग बिना रुके चलती रहती है. इतनी कि तमाम क्षेत्रों में रंगे सियारों की टोलियां टहल रही हैं. रंगे हाथों पकड़े जाने वालों की पूरी डायरेक्टरी जारी की जा सकती है. रंग बदलते गिरगिटों ने 'कलर कांबीनेशन को नई परिभाषा दी है. रंगदारी एक खास सूखे से निकलकर सब ओर फैल गई है. रंगारंग कार्यक्रमों के सांस्कृतिक दृश्य अपने मोबाइल पर नेता लोग विधानसभा में देख रहे हैं. सारा माहौल ऊ लालामय है. इसलिए अपने देश में हर दिन होली है. बस इंतजार है उस दिन का जब अनीति की पिचकारियों के सामने लट्ठमार होली खेलने के लिए जनता खड़ी हो जाएगी.
सखी, मैं कैसे खेलूं होली? : ज्ञान चतुर्वेदी (व्यंग्यकार) इस बार होली कैसे मन पाएगी री सखी? किस विध मने होली कि रंग कहीं बचे ही नहीं. काले रंग का तो एक छींटा भी नहीं बचा कहीं. काला रंग तो पूरा का पूरा ही उठ गया दुकानों से. सारा खप गया. साल भर ही मुंह काले होते रहे. बड़ों-बड़ों के मुंह काले हो गए. बिरज में कलमुंहे होने से ही पहिचान होने लगी कि यह अवश्य ही कंस के दरबार का कोई श्रेष्ठिजन या उसका लग्गू-भग्गू होगा. तो काला रंग तो कहीं शेष ही नहीं रहा सखि.और सफेद रंग का भी यही हुआ. कालिख इतनी जगह निकली कि उसे 'व्हाइट वाश' करते-करते सफेद रंग भी नहीं बचा. घपलों और अपराधों की कालिख को वर्ष भर लोग बयानों और बहानों की सफेदी से दबाते रहे. तो न तो काला रंग बचा, न सफेद. और दूसरे रंगों का क्या? वे तो हैं न? उनसे ही होली खेल न? मूरख सखि पूछ रही है...अरी सखी, वे रंग भी हमारे कने कहां बचे? वर्ष भर पुरस्कारों, समारोहों और नाचगाने का ऐसा रंगीन खेला चला है देश के बाजार, मीडिया, सिनेमा, राजनीति और धनपतियों के घर-आंगन में कि इन सबने मिलकर बेचारे आमजन के जीवन के सारे रंग खींचकर, खर्च कर डाले. सखी, हम जैसों के लिए कोई रंग छोड़े ही नहीं गए हैं. तू ही बता कि फिर इस बरस कैसे मने होली बिरज में?
बिरज में जल भी शेष नहीं रहा. कलकल बहने वाला पानी अब कहां बचा? अब जहां भी जल है, वह बोतलबंद हो गया. जमुना बची ही नहीं. जमुना तीरे गू-मूत बह रहा है सखी. झरने रुक गए. बावड़ियां पुर गईं. कुएं में घड़ा उतारो और रस्सी को पाताल तक भी उतार दो तो भी पानी नहीं है. खींच लिया सारा भूमिजल और जीवन जल आबादी ने, कॉलोनाइजर्स ने और बोतलबंद पेयों के कंसों ने. सूखा पड़ा है बिरज धाम. ऐसी बिपदा में किसन कन्हैया का कहीं अता-पता ही नहीं. कन्हैया आजकल दिखते ही नहीं बिरज में. अंखियां तरस गईं. लीलाधर दिखते ही नहीं. पांच बरस हो चले. चुनाव बेला में दिखे थे और खूब दिखे थे. खूब रास रचाया हम वोटरन के संग. फिर वोटन का माखन चुरा के वे जो निकले तो आज तक दिखे ही नहीं. लौटे ही नहीं. कुंज गलियां वीरान हैं. श्याम हैं नहीं. थल वीरान है और जल बचा नहीं. रंग नहीं. जल भी शेष नहीं. रंग होते ही तो उन्हें घोलते काहे में? सखी, होली आ गई पर मैं भयाकुल हूं कि कहीं, किसी ने मुझे रंग पोत ही डाला तो फिर मैं बाद में रंग छुड़ा कैसे पाऊंगी? आजकल बिरज में नल सप्ताह में दो बार ही आते हैं. सखी, तू ही बता कि जब नलों में इतने कम प्रेशर से जल आएगा तो कौन होली मनाने का साहस कर सकेगा? टैंकर का जुगाड़ हुआ, तब ही मन सकेगी होली. वरना इस बार कैसे मने होली री सखी?
सखी, वैसे भी बिरज में कहीं भी होली जैसा उत्साह ही नहीं बचा. हर शख्स व्यस्त. हर नागरिक जीवनयापन की दौड़ में भागता. टाइम ही नहीं गोप-गोपियों के पास. कैसे हो होली कि कन्हैया की सीएल ही स्वीकृत नहीं हुई. कैसे हो होली कि बॉस ने कन्हैया को टुअर पर भेज दिया है. कैसे हो होली कि सगरे गोप, सगरे लोग लुगाई पैसा कमाबे में ऐसे मगन हैं कि उन्हें न रंगों की याद है, न गोपियों की, न रास की, न ही कुंज गलियों की. न होली की याद रह गई है, न मेरी. सैंया का अता-पता ही नहीं. घोटाला करके फरार हैं या अंदर बंद हैं. सैंयाओं का आजकल यही हाल चल रहा है. गोपियां ब्यूटी पार्लर में हैं. सैंया इधर-उधर और बांसुरी के बोल सिंथेसाइज़र ने हर लिए. पिचकारी आउट ऑव फैशन हो गई. सैंया के गाल ओवरटाइम कर-करके इत्ते पिचक गए कि उधर रंग लगाने को ठौर ही नहीं बचा. सखी, कल ही सैंया को वीआरएस पकड़ा दिया गया और आज होली है. रस ही सारे खैंच लिए. जीवन जल सूख गया. होली पर भी कंप्यूटर पर बैठे हैं कन्हैया. भर रहे हैं. भर रहे हैं बिजनेस की डाटाशीट मुकुटबिहारी. किशनजी के पास टाइम ही नहीं कि जिसे गोपियों के संग होली खेलने में भेष्ट कर सकें. होली, दीवाली, परिवार के साथ समय बिताना टाइम भेष्ट करना मानते हैं आजकल सखी. पिया इन्वेस्टमेंट में व्यस्त हैं. पिचकारी, रंग और फाग में समय नष्ट करना सुहाता नहीं उनको. ऐसे में किसके संग और कैसे मनाऊं होली, सखी?
कैसे मने होली कि पिया के घर की गली ही संकरी हो गई. पिया ने अपनी बाउंड्री वाल बढ़ाकर गली की जमीन पर अतिक्रमण कर डाला है. इधर खाप पंचायतों ने पहले से ही संकरी प्रेमगली को ऐसा और संकरा बना डाला कि जा में एक भी न समा पाए. समाज में मन संकरे हो गए. परिवार तो न्यूक्लियर होते-होते इतने संकरे हो चले हैं कि मां-बाप की छोड़ो, किसी भी आत्मीय संबंध के लिए भी ठीक से जगह नहीं बची. रिश्ते संकरे हो गए. नजरें संकरी. जब सब तरफ संकरापन ही काबिज है तो फिर होली मने कैसे? होली तो खुले मन और खुले समाज का निर्मल उत्सव होता है न सखी? बिरज में जब दूसरे के विचार, दूसरे के धर्म, दूसरे के अस्तित्व के लिए जगह ही नहीं बची तो होली मने कैसे? अपना बिरज इतना संकरा तो कभी रहा ही नहीं सखी. ऐसे संकरे-संकुचित बिरज में होली हो भी तो कैसे?
सखी, कब लौटेंगे श्याम अपने सहज चोले में?
सखी, कब लौटेगा बिरज अपने ही बिरज में?
सखी, कब वापस आएंगे कन्हैया बाजारवाद, टार्गेट, डील, दौरों, लोन की किस्तों आदि कंसों को पराजित करके? कब लौटेंगे गोप-गोपी, राजनीति और संप्रदाय के बीहड़ से भटककर, वापस उस ब्रजभूमि पर जहां बस प्रेम की नागरिकता चलती है? कब मेरे कपोलों पर वह गुलाल भरी हथेली स्पर्श करेगी जो होली की भांति ही निश्छल, निष्कपट और भोली होगी? सखी, जब यह सब मिल जाए तभी तो मैं होली खेल पाऊंगी. अभी मैं कैसे खेलूं होली, सखी?
मैं...मैं...और सिर्फ मैं! : राजकिशोर (पत्रकार, व्यंग्यकार) सच कहता हूं, मुझसे अपनी तारीफ की नहीं जाती. पहले, दोस्तों के बीच, कर लेता था. पर जिस दिन यह पढ़ा कि महापुरुष अपनी तारीफ नहीं करते, तभी से छोड़ दिया. मैं बचपन से ही महापुरुष बनना चाहता था. कारण यह था कि स्कूल में उन्हीं के बारे में पढ़ाया जाता था. जैसे बाकी लोगों की जिंदगी का कोई मोल न हो. इसलिए मैंने ठान लिया कि महापुरुष तो बनना ही है.यह तो बाद में मालूम हुआ कि मैं जिस युग में रह रहा हूं वहां अपनी तारीफ खुद ही करनी पड़ती है. इस मामले में आप दूसरों पर निर्भर नहीं रह सकते. जो निर्भर रह जाते हैं, उनके लिए साहित्य या समाज का 'मूक सेवक' मुहावरे का इस्तेमाल किया जाता है. मौन में मेरा विश्वास है, मूकता में नहीं. दूसरी बात यह है कि मैंने बहुत इंतजार कर लिया है. लेकिन मेरी लालसा पूरी नहीं हुई. इसलिए अगर मैंने अपनी तारीफ खुद करना शुरू नहीं किया, तो हिंदी के इतिहास का एक पन्ना कोरा ही रह जाएगा. यह इतिहास के साथ विश्वासघात होगा. जब मैंने अपनी पत्नी को छोड़कर किसी और के साथ विश्वासघात नहीं किया, तो इतिहास के साथ कैसे कर सकता हूं? उसी के बल पर तो रोजी-रोटी कमाता रहा हूं. इतिहास बना कर नहीं, उसे दर्ज कर.
मेरा परिवार बहुत गरीब था. मेरे माता-पिता गरीबी में पैदा हुए और गरीबी में ही मर गए. मैं भी गरीबी में पैदा हुआ, पर गरीबी में मरना नहीं चाहता था. इसलिए जैसे ही अपने-पराए की चेतना पैदा हुई, मैंने गरीबी से कन्नी काटना शुरू कर दिया. यह तो संभव नहीं था कि पूरे परिवार को गरीबी रेखा से ऊपर ले जा सकूं, सो मैंने सिर्फ अपने स्तर पर यह कोशिश शुरू कर दी. कई तरह के छोटे-छोटे काम करने लगा. ट्यूशन भी पढ़ाता. इस सबसे जो पैसा मिलता था, वह मेरा अपना होता था. एकाध अपवाद को छोड़कर उसका उपयोग मैं इसलिए करता था कि बहुत गरीब न दिखूं. कुछ वर्षों के बाद अचानक एक दिन मैं मध्य वर्ग में आ गया. तब से यहीं जमा हुआ हूं. मेरा नैतिक साहस देखिए कि इसके बावजूद भारत के मध्य वर्ग की तीखी आलोचना करने में मैं किसी से पीछे न रहा. आज भी कोई मुझसे पूछे कि भारत के पतन का प्रधान कारण क्या है, तो मैं जवाब दूंगा-यहां का पतित मध्य वर्ग.
हाइस्कूल की पढ़ाई के दौरान ही अंग्रेजी ने मुझे आकर्षित किया. तब तक मैं राममनोहर लोहिया के एक भक्त के जरिए उनके बारे में जान चुका था. वे भारत के सार्वजनिक जीवन में अंग्रेजी के बिलकुल खिलाफ थे. मेरे मन में अंग्रेजी से तीव्र घृणा उन्हीं दिनों की देन है. लेकिन महापुरुष बनने की दिशा में अग्रसर व्यक्ति अंतर्विरोधों से घबराते नहीं हैं. सो मैंने हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी पढ़ने की ओर भी ध्यान दिया. अंग्रेजी में लिखे लोहिया के सारे लेख मैंने मूल अंग्रेजी में ही पढ़े हैं. आज भी अंग्रेजी का कोई अखबार मुझसे लिखवाने लगे, तो मैं चूकूंगा नहीं-बशर्ते पारिश्रामिक तगड़ा हो. यह सच है कि मुझे थोड़ी-बहुत अंग्रेजी न आती, तो मैं पत्रकारिता में आगे नहीं बढ़ सकता था. अंग्रेजी का पहले जैसा ही उग्र विरोधी होने के बावजूद मैं अपने संपर्क में आने वाले सभी युवाओं को यही सलाह देता हूं कि अंग्रेजी पढ़ो, नहीं तो मारे जाओगे. 'दोनों हाथों में लड्डू' मेरी पीढ़ी का मुख्य सिद्धांत है.
महापुरुष का एक लक्षण यह होता है कि वह समय को नहीं चुनता, समय उसे चुन लेता है. पत्रकारिता में आने के पहले मैं राजनीति में आ चुका था. लोहिया के निधन के बाद कोई समाजवादी पार्टी नहीं रह गई. मैंने भी राजनीति छोड़ दी. बाद में लगातार लिखता रहा कि लोहिया के उत्तराधिकारियों को एक सच्ची सोशलिस्ट पार्टी बनानी चाहिए, लेकिन विचारों से सोशलिस्ट होने के बावजूद इस दिशा में मैंने कुछ भी नहीं किया. कारण, मैं फिर से गरीब बनने के लिए तैयार नहीं था. बड़ी मुश्किल से मैं गरीबी के कीचड़ से निकला था. दुबारा वहां कैसे लौट सकता था? कथनी और करनी, दोनों से सोशलिस्ट बने रहने से बेहतर है, सिर्फ कथनी से सोशलिस्ट बने रहना. देश का भविष्य बनाने के नाम पर अपना भविष्य दांव पर लगा देना मूर्खता है. इसी तर्क से मैंने अपने को कई और अच्छी चीजों से रोका, जिनसे मुझे भौतिक नुकसान हो सकता था.
मैंने राजनीति जारी नहीं रखी, पत्रकारिता को अपना लिया. अपने को दिलासा देने के लिए कहता रहा कि पत्रकारिता के माध्यम से राजनीति ही कर रहा हूं. सचाई यह थी कि मैं ठंड में कोट पहन कर टहल रहा था. पत्रकारिता ने मुझे दो बार मौका दिया कि मैं अपने मूल काम में लगूं-जब रविवार बंद हुआ और जब दिल्ली के एक अखबार से हटाया गया, पर मैंने होशियारी से काम लिया. आज भी अपनी इसी होशियारी के बल पर मैं महीने में डेढ़ हजार की सिगरेट फूंक लेता हूं.
मेरे दोनों बच्चे अंग्रेजी माध्यम से पढ़े हैं. बेटे को अंग्रेजी स्कूल में भेजते समय मेरी आत्मा बहुत कलपी थी. अभी तक मैं यही बहाना देता रहा हूं कि अगर मैं अपनी जिद पर अड़ा रहता, तो मेरे दांपत्य जीवन में एक दरार आ जाती. यह बात सौ फीसदी सच नहीं है. मेरे आत्मसमर्पण के पीछे मेरी नैतिक कमजोरी थी. लेकिन निर्णय मेरी पत्नी का ही ठीक निकला. आज बेटा हिंदी की पत्रकारिता में होता, तो उसे दो कौड़ी के लोगों की जी-हुजूरी करनी पड़ती.
बेटी को स्कूल भेजने का समय आया, तो पति होने के नाते मैंने वीटो लगा दिया. उसका नाम अपने मुहल्ले के नगर निगम स्कूल में लिखवाया. वहां न पढ़ाई होती थी न खेलना सिखाया जाता था. अगर हम कोलकाता ही रह जाते, तो हमारी बेटी का पता नहीं क्या बनता. रविवार बंद हो जाने के बाद हमें दिल्ली आना पड़ा. यहां उसने अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई पूरी की. इस पर मुझे कोई पछतावा नहीं है. दूसरों की तरह मैंने भी अपनी दोनों संतानें अंग्रेजी को दे दीं. इसे मैं निंदा की बात मानता हूं, पर भीतर-भीतर खुश भी हूं.

