स्वभावतः शाकाहारी डॉ. मनमोहन सिंह हिलसा मछली का स्वाद लेने ढाका गए थे. पर हाय! लौटे तो हारा हुआ-सा मुखड़ा लिए. लेकिन तीस्ता के जल को लेकर समझैते पर दस्तखत न कर पाने की इस नाकामी के पीछे की जो कहानी है, उसका कोई मतलब नहीं है.
नाकामियों का भी भला कोई वारिस होता है. कौन है जो किसी हरामजादे का बाप कहलाना चाहेगा? तीस्ता कांड पर आरोपों-प्रत्यारोपों का सिलसिला खासी तेज रफ्तार से चल पड़ा है. इससे जुड़ा हर पक्षकार अपनी नाक ऊंची रखने के हिसाब से नियमों-कानूनों को परिभाषित कर रहा है. ममता बनर्जी जब इस ओर संकेत करती हैं तो सिर्फ एक उंगली नहीं बल्कि पूरा हाथ लहराती हैं. उनके साथी-सहयोगी मीडिया से बात करते वक्त खुसुर-फुसुर नहीं करते; खबर अच्छी होने पर वे दहाड़ते हैं और बुरी हो तो चीखते हैं.
इस मामले में सच आधिकारिक रूप से गोपनीय है या कि होना चाहिए पर इसे अपने-अपने मिजाज के मिसरों में गढ़कर भूखे मीडिया को परोसा जा रहा है. कलकत्ता का संदेश सीधा और साफ था; दिल्ली ने उसे दगा दिया है. तीस्ता का 25,000 क्यूसेक पानी देने को ममता राजी हो गई थीं लेकिन तभी दिल्ली ने उसे बढ़ाकर 33,000 क्यूसेक कर दिया. तृणमूल कांग्रेस के मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने कैबिनेट में जब इस पर ऐतराज उठाया तो प्रणब मुखर्जी ने उन्हें वस्तुतः डपट दिया. इस सबका और भी कोई मायने नहीं.
अंतरराष्ट्रीय संधियों वगैरह का ज्ञान रखने वाले जानते हैं कि बारीक नुक्तों वाली चीजें बड़ा सिरदर्द होती हैं. छपाई हमेशा दुरुस्त होती है. राजनयिक जैसे प्लास्टिक सर्जनों से मुस्कानें उधार लेकर आते हैं और एक-एक अर्धविराम पर नितांत स्लो मोशन में पेशेवर सांड़ों की तरह लड़ते हैं. अस्पष्ट क्षेत्रों में हर बिंदु पर एक पैटर्न-सा रच दिया जाता है. ऐन वक्त तक सौदेबाजी चलती है.
तीस्ता का पानी तीस्ता की उत्पत्ति या कम-से-कम बांग्लादेश के उद्भव के समय से ही भारत-बांग्लादेश संवाद पर बह रहा है. चौथाई सदी तक बात-विमर्श के बाद 1996 में जाकर गंगा नदी संधि हो पाई थी; लेकिन ज्योति बसु और इंदर कुमार गुजराल की पीढ़ी एक साफ-सुथरी सोच के साथ ढाका गए थे क्योंकि तब दिल्ली और कलकत्ता में निरंतर संवाद चलता था.
डॉ. मनमोहन सिंह और सुश्री बनर्जी उसी तरह की पारदर्शिता क्यों नहीं कायम कर सके?
इस संधि का मसौदा विदेश मंत्रालय ने नहीं तैयार किया था; सारी प्रक्रिया पर प्रधानमंत्री कार्यालय की पकड़ थी. ब्यौरों की जिम्मेदारी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन की थी. तीस्ता जल के बंटवारे पर ममता को ताजा ब्यौरों से वाकिफ कराने के लिए वे पिछले दो महीने में दो बार कलकत्ता गए. समस्या की जड़ बिल्कुल यहीं है.
यहां बात असल में दो बराबर लोगों के बीच बातचीत की थी ही नहीं. समझैता होता तो मेनन उस मौके के लिए सक्षम थे; लेकिन जब बांग्लादेश की मांग बढ़ गई तो इस मौके पर पता नहीं क्यों कलकत्ता को भरोसे में लिया ही नहीं गया. मेनन ने सोचा होगा कि ऊंचे दांव वाली कूटनीति में समय सीमाओं के दबाव को समझ्कर ममता अपना रवैया नरम कर लेंगी. यह हमेशा से एक जोखिम भरा दांव रहा है. लेकिन अप्रत्याशित स्वभाव वाली मुख्यमंत्री से मोलभाव करना मेनन के बस से बाहर की बात थी. एक नौकरशाह ब्यौरा दे सकता है, राजी तो कोई बराबर वाला ही कर सकता है.
ऐसा लगता है, इस प्रसंग में देखी-सुनी गई बातों के अलावा और भी बहुत कुछ था. नाकामी से पहले ही असहज स्थितियां बननी शुरू हो गई थीं, जब ममता ने कहा कि वे स्वतंत्र रूप से ढाका जाएंगी. इस तरह का सियासी शोर आप तभी मचाएंगे जब कलकत्ता और दिल्ली के बीच एक दूरी पैदा करने के लिए आपका दिल मचल रहा हो.
डॉ. सिंह की हताशा-निराशा को पढ़ना हमेशा एक मुश्किल काम रहा है. उनका सिर कभी हिलता ही नहीं. आप कैसे जानेंगे कि वह झुका या नहीं? वे बोलें तो भी आप ज्यादा कुछ नहीं पकड़ सकते. पर घुमड़ते अवसाद को पढ़ने के लिए मनोवैज्ञानिक होना जरूरी नहीं. उनके चारों ओर अनुत्तरित सवाल बिखरे पड़े हैं. हर हादसे से उपजता जहरीला मलबा इस प्रशासन की सांसें सोखे ले रहा है.
7 सितंबर को दिल्ली में हुआ विस्फोट डॉ. सिंह के कार्यकाल में कोई पहला आतंकवादी हमला नहीं था; लेकिन ऐसा पहली दफा हुआ कि पीड़ितों को देखने अस्पताल पहुंचे राहुल गांधी को विरोध का सामना करना पड़ा. दिल्ली का सवाल नितांत बुनियादी हैः मई में हाइकोर्ट में एक आतंकवादी बम फटने से रह गया था; इसके बावजूद गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने सुरक्षा बेहतर करने के लिए रत्ती भर भी कुछ क्यों नहीं किया? जनाक्रोश की आंच में बहानों की तो हवा निकली जा रही है.
सारा गणित गड़बड़ा गया हैः तीन साल पहले लोकसभा में एटमी समझैते के मसले पर विश्वास मत जीतने के बाद से ही यूपीए सरकार, तमाम नाटकीय टीवी फुटेज के बावजूद कहती आई है कि पाला बदलने के लिए किसी भी सांसद को पैसा नहीं दिया गया. तो फिर अमर सिंह जेल में क्यों हैं? चिदंबरम की मातहत दिल्ली पुलिस मानती है कि अमर सिंह ने सांसदों को पैसा दिया. किसकी बिना पर किया उन्होंने यह सब? अमर सिंह परोपकारी पुरुष नहीं हैं. वे अकेले दोषी नहीं हो सकते. क्या वे लंबी होती कतार के एक और बलि के बकरे हैं?
चुप्पी किसी दाग को ढक तो सकती है, मिटा नहीं सकती.

