वित्तीय सेवाएं देने वाली कंपनी मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस ने सोमवार को भारत की आर्थिक विकास दर के अनुमान को घटा दिया. वित्त वर्ष 2020 में मूडीज को भारत की आर्थिक विकास दर 4.9 फीसदी रहने का अनुमान है, जो पहले 5.8 फीसदी थी. इस गिरावट की मुख्य वजह भारतीयों की ओर से गिरती खपत (हाउसहोल्ड कंजम्पशन) को माना गया है. भारतीयों की खपत, सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में बड़ी हिस्सेदारी रखती है. वित्त वर्ष 2018-19 में जीडीपी में 57 फीसदी हिस्सेदारी खपत की थी.
मूडीज की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब केंद्रीय बैंक की ओर से कर्ज की में बड़ी कटौती की जा चुकी है, जिससे उपभोक्ता नई खरीद के लिए और उद्योग नए निवेश के लिए प्रेरित हों. सरकार अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए कई कदम उठा चुकी है. यानी मांग बढ़े इसके लिए कई प्रयास पहले ही किए जा चुके हैं. लेकिन इसके बाद भी खपत सुधरने का नाम क्यों नहीं ले रही? मसलन, सस्ता कर्ज भी घर या कारों की खरीद के उत्तसाहजनक आंकड़े त्यौहारी सीजन में भी नहीं बटोर सका. लोन मेलों के बाद भी बैंकों की क्रेडिट ग्रोथ निचले स्तर पर ही है. बचत लगातार टूट रही है और आय बढ़ने का संकेत गांव से शहर तक कहीं नहीं है. रही बची कसर मंदी के इस माहौल में बढ़ती महंगाई ने पूरी कर दी.
यानी यह तो तय है कि लोग खरीदारी कर्ज के महंगा होने के कारण नहीं रोके थे. असल संकट रोजगार का है. नोटबंदी के बाद असंगठित क्षेत्र में मची खलबली ने बड़े स्तर पर रोजगार लील लिए. संगठित क्षेत्र की दिक्कतें जीएसटी के साथ शुरू हुईं, जहां बड़े और बड़े हो गए और मझौले व छोटे अस्तित्व की लड़ाई लड़ने लगे. एमएसएमई पर की गई खबर छोटे उद्योग बड़े संकट में विस्तार से पढ़ें. मंदी के माहौल में बातें इंक्रीमेंट और बोनस की जगह नौकरी बचाने की होने लगीं. खपत टूटने की वजह शायद इसी डर में छुपी है, जो ज्यादातर लोगों को किसी बड़ी खरीद से परहेज करने पर मजबूर कर रही है.
घर खरीदने के लिए 20 साल का कर्ज लेने से पहले भविष्य के लिए आश्वस्त होना जरूरी है. कार खरीदने से पहले नियमित आय बनेगी रहेगी इसकी गारंटी जरूरी है. मोबाइल, लैपटॉप, शॉपिंग मॉल में भीड़ हो इसके लिए रोजमर्रा और जरूरत पर होने वाले खर्च का निचले स्तर पर रहना जरूरी है. अगर दूध तीन रुपए लीटर महंगा होगा, पेट्रोल 75 रुपए लीटर न्यू नॉर्मल बन जाएगा, ज्यादातर फल सब्जियों के दाम पिछली सर्दियों की तुलना में 50 फीसदी बढ़ जाएंगे? तो बिग टिकट शॉपिंग या छुट्टियों में घूमने के बजट का घटना स्वाभाविक है. बचतों के घटने की वजह भी यहीं टटोलनी होगी.
इस वक्त जरूरत अर्थव्यवस्था में नए रोजगार, मौजूदा रोजगार में आय बढ़ाने और गांव में लोगों के हाथों में ज्यादा पैसा पहुंचाने की है. लोगों की क्रय क्षमता बढ़ाकर ही आर्थिक विकास के सुस्त पहिए को रफ्तार दी जा सकती है. मुफ्त में बिजली, सिलेंडर या नकदी बांटकर सरकार स्थायी समाधान नहीं कर सकती. स्थायी समाधान के लिए हमें नए मनरेगा ढूंढने होंगे.
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