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आखिर कानून के फंदे में आए राठौड़

कथित हत्या के मामले में पूर्व मंत्री गिरफ्तार. सीबीआइ अफसरों के एक तबके को दोष साबित होने में संदेह.

अपडेटेड 14 अप्रैल , 2012

वसुंधरा राजे सरकार में लोक निर्माण मंत्री रहे भाजपा के वरिष्ठ नेता राजेंद्र राठौड़ को पिछले हफ्ते 5 अप्रैल को सीबीआइ ने जयपुर में गिरफ्तार कर लिया. उन्हें 2006 में एक अपराधी दारा सिंह की हिरासत में हुई कथित मौत के मामले में अभियुक्त बनाया गया है. सीबीआइ ने उन्हें रिमांड पर लेने की मांग नहीं की बल्कि मामले की चार्जशीट दायर की और अदालत ने उन्हें जेल भेज दिया. पूर्व अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक ए.के. जैन और पूर्व आइजी पुन्नुचोमी समेत कई पुलिस अधिकारी इस मामले में पहले से ही जेल में हैं. सीबीआइ का तर्क है कि चूंकि दारा ने राठौड़ को धमकी दी थी, इसलिए पुलिस ने दारा को पहले हिरासत में लिया और फिर एक फर्जी मुठभेड़ में मार दिया.

सीबीआइ निदेशक ए.पी. सिंह ने सॉलिसिटर जनरल की सलाह पर माना था कि राठौड़ के खिलाफ सबूत नहीं हैं. लेकिन ताजा चार्जशीट में सीबीआइ को एक तारतम्य और पैटर्न नजर आया है. इसमें जैन, पुन्नूचोमी और एक अन्य आरोपी अफसर अरशद अली की बातचीत को जोड़ा गया है. जैन उस समय अपराध शाखा के प्रमुख थे और पुन्नूचोमी स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप (एसओजी) के प्रमुख. सीबीआइ के मुताबिक, घटनाक्रम से साफ है कि राठौड़ के जैन को फोन करने और फिर जैन के पुन्नुचोमी को निर्देश देने के बाद ही एसओजी सक्रिय हुई.

सीबीआइ का कहना है कि राठौड़ एक राजपूत वीरेंद्र सिंह न्यांगली के गिरोह का समर्थन करते थे, जिसकी दुश्मनी विजेंद्र सिंह उर्फ तिलिया और उसके ड्राइवर दारा सिंह से थी. आरोप है कि दारा के साथ कोई देबू था. राठौड़ ने उलट कर देबू के फोन पर कॉल किया तो दारा ने राठौड़ को धमकाया था. राठौड़ का कहना है कि इस तरह की बातचीत का कोई रिकॉर्ड नहीं है. हालांकि देबू के फोन से दो बार 16 सेकंड और 28 सेकंड की संक्षिप्त कॉल राठौड़ के नंबर पर की गई थीं. कथित तौर पर राठौड़ को और भी धमकियां दी गईं लेकिन राठौड़ ने इंडिया टुडे से कहा कि ऐसी किसी कॉल डीटेल का साक्ष्य नहीं है.

नौ सितंबर, 2006 को तिलिया ने आत्मसमर्पण कर दिया. बताते हैं तब अरशद अली ने तिलिया से फोन पर राठौड़ से माफी मंगवाई थी. बाद में तिलिया ने आरोप लगाया कि राठौड़ ने उससे कहा था कि आत्मसमर्पण करके तिलिया तो बच सकता है पर दारा नहीं. राठौड़ की मानें तो झूठे गवाहों के सिवा इसका कोई सबूत नहीं.

गिरफ्तारी के दो दिन पहले राठौड़ ने इंडिया टुडे से कहा कि दारा की पत्नी सुशीला या उसके भाई शीशराम की किसी शिकायत में उनका नाम नहीं है. चार साल बाद शीशराम ने पहली बार कहा कि दारा को राठौड़ से धमकी मिलने का डर था. राठौड़ के शब्दों में, 'हैरानी की बात है, अचानक इतने सारे लोगों ने दावा करना शुरू कर दिया कि उन्हें पता था, मैंने दारा को धमकी दी है, पर इतने वर्षों तक उनमें से किसी ने भी शुरुआती शिकायतों तक में इसका जिक्र नहीं किया. यह बाद में सोच-समझकर रची गई साजिश का साफ मामला नहीं?' तिलिया और दारा का सरदार फगेरिया था. जब न्यांगली फगेरिया की हत्या से बरी हुआ तो भाजपा सरकार ने इसके खिलाफ अपील भी की थी. फरवरी 2009 में न्यांगली की हत्या हो गई थी. 2008 में वह भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ चुका था. उसके गिरोह के सदस्य सुखदेव सिंह की पत्नी ने 2008 में राठौड़ के खिलाफ चुनाव लड़ा था. उसे 12,000 वोट मिले थे.

असल में मामले की निगरानी कर रहे सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआइ को मामला 6 अप्रैल तक निपटाने का निर्देश दिया था, तभी से राठौड़ की गिरफ्तारी का अंदेशा बना हुआ था. राठौड़ को हत्या का अभियुक्त बनाए जाने पर सीबीआइ में दो राय थी. आला अफसरों को संदेह था कि जाटों के एक छोटे से वर्ग में राजा राम मील के नेतृत्व वाला गुट राठौड़ को इस मामले में फंसाना चाहता था. इस गुट को मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का समर्थन प्राप्त है. यह गुट सीबीआइ के कुछ अधिकारियों के साथ सांठगांठ करने में सफल रहा. सीबीआइ के जांचकर्ता जातिगत आधार पर बुरी तरह बंटे हुए थे. हालांकि संदिग्ध माने गए जाट पुलिस अधीक्षक आर.एस. पूनिया को अदालत के आदेश पर जांच से हटा दिया गया था, लेकिन पहली चार्जशीट तभी दर्ज की गई थी, जब मुख्य प्रभार उन्हीं के पास था.

सीबीआइ के मुताबिक, 'राठौड़ एक राजपूत थे और जाटों का एक छोटा-सा वर्ग उन्हें निशाना बना रहा था, इस तथ्य ने कुछ जाट अफसरों को राठौड़ के खिलाफ कर दिया था.' राठौड़ के खिलाफ सक्रिय गुट ने सबूत गढ़ने में सारी हदें पार कर दीं. इन सबूतों की विश्वसनीयता की परख सुनवाई के दौरान ही हो सकेगी. हैरत की बात है कि राजस्थान के कुछ जाट पुलिस अफसरों ने खुद पुलिस अधिकारियों समेत कुछ अभियुक्तों के खिलाफ सबूत दिए. सीबीआइ के आला अफसर कुछ गवाहों के उन बयानों से नाखुश थे, जो हू-ब-हू एक जैसे हैं, जिनसे साफ लगता है कि गवाहों को सिखाया-रटाया गया है. यहां सीबीआइ एक साल से ज्‍यादा पुराने कॉल डीटेल्स जुटाने में सफल रही. मोबाइल कंपनियां अमूमन एक साल से ज्‍यादा के पुराने डीटेल्स नष्ट कर देने की बात कहती हैं.

कांग्रेस ने जाट लॉबी को खुश करने के लिए यह कोशिश की हो सकती है. भंवरी देवी प्रकरण में महिपाल मदेरणा की गिरफ्तारी के बाद से गहलोत जाटों का गुस्सा झेल रहे हैं. गिरफ्तारी के बाद भाजपा नेता वसुंधरा राजे ने कहा कि ''गहलोत सारी जातियों को निशाना बना रहे हैं, वे उन्हें धमकाकर काबू में लाना चाहते हैं.' पर गहलोत ने स्पष्ट किया कि 'मैं हमेशा कानून को अपना काम करने देने के पक्ष में रहा हूं.' कांग्रेस मामले को जाट बनाम राठौड़ बनाने के लिए बेचैन है. पर ऐसा होने वाला नहीं. जाटों, बिश्नोइयों और गुर्जरों के बाद अब राजपूत भी पूरी तरह कांग्रेस के खिलाफ हो जाएंगे.

मामले का राजनीतिकरण करने की भाजपा की कोशिश से मतदाताओं पर असर पड़ेगा, लेकिन इसका अदालत पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा. अब राठौड़ को लंबी लड़ाई लड़नी होगी. पर यह भी तय है कि आने वाले वर्षों में गहलोत के लिए जाटों की चुनौती भी बढ़ती जाएगी.

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