डियर डॉक्टर दुबईः
आप बेहद मसरूफ इंसान हैं, डॉक्टर साहब. पाकिस्तान के सदर के इकलौते विश्वासपात्र को इतना ही मसरूफ होना चाहिए, लिहाजा एक शक को लेकर आपका वक्त जाया करने में मुझे हिचकिचाहट हो रही है.
लेकिन यह शक यूं ही खत्म नहीं होगा. सदर आसिफ अली जरदारी 6 दिसंबर को जाहिरी तौर पर आपसे इलाज कराने की फिराक में अचानक अपना मुल्क छोड़कर दुबई परवाज कर गए थे.
जरदारी जबरदस्त कयासों के बीच 19 दिसंबर को पाकिस्तान लौट आए कि वे एक बार फिर लापता हो जाएंगे, और इस बार जरा ज्यादा ही दिल खोलकर गैर-हाजिर रहेंगे. ऐसे में लगता है कि एक कौम का मुस्तकबिल एक शक पर ही टिका रहेगा.
डॉक्टर साहब, आपने हमें सिर्फ यह बताया है कि जरदारी को ''स्ट्रोक जैसे लक्षण'' थे. बेहद करीने से रहस्यपूर्ण बनाई गई इस जानकारी ने हमें थोड़ा-सा भ्रमित और ज्यादा जानकारी हासिल करने के लिए थोड़ा उत्सुक बना दिया है. स्ट्रोक जैसे लक्षण हर स्ट्रोक में हो सकते हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि हर लक्षण स्ट्रोक से ही पैदा नहीं होता.
डॉक्टर साहब, लिहाजा वह स्ट्रोक था या नहीं था? अगर वह स्ट्रोक ही था, तो हुआ कहां था? अगर वह सिर्फ ''स्ट्रोक जैसा'' था, तो आप शायद हमें बता सकते हैं कि वह किसके जैसा था.
डॉक्टर साहब, आप मेहरबानी करके बुरा न मानें, लेकिन क्या इन ''लक्षणों'' में ऐसा कुछ खास था कि उनके लिए दुबई में इलाज की और आपके 'नरमंद हाथों की और बेशक आपके शानदार दिमाग की जरूरत पड़ गई?
क्या इस्लामाबाद, या लाहौर, या कराची में ऐसे काबिल डॉक्टर नहीं हैं, जो इन नामरदूद लक्षणों का इलाज कर सकते? सवाल इसलिए पैदा होता है क्योंकि पाकिस्तान के बेअदब मसखरे और भारत के नीच अफवाह-फरोश ये बात फैला रहे हैं कि पाकिस्तान के सदर को अपने मुल्क के किसी अस्पताल पर भरोसा नहीं है, और वे डरते हैं कि उन्हें जहर दिया जा सकता है या ऐसा कि कुछ हो सकता है.
बेशक, यह सही नहीं हो सकता, क्योंकि अगर कोई सदर अपने ही लोगों पर भरोसा नहीं कर सकता, तो उसे ओहदे पर बने रहने का कोई हक नहीं है. लेकिन जाहिरी तौर पर जब आपने उन बुरे लक्षणों के बारे में बता दिया तो पश्चिम के नालायक पत्रकारों ने यह खबर फैला दी कि जरदारी ''दुबई में अपने घर पर सेहत सुधारने के लिए आराम कर रहे हैं.'' अगर इस्लामाबाद अपने सदर के लिए बेहद जरूरी आराम करने लायक भी महफूज नहीं है, तो फिर तो हालात बहुत ही खराब हैं. है ना?
डॉक्टर साहब, आपको बीमारियों की काफी जानकारी है, लिहाजा मुझे उम्मीद है कि आप बोक़रात (हिपोक्रेट) की हलफ तोड़े बगैर इसके बारे में कुछ बता सकते हैं. क्या किसी सदर को किसी मेमोरेंडम से स्ट्रोक पड़ना मुमकिन है?
जाहिरी तौर पर, मैं उस मेमोरेंडम की बात कर रहा हूं, जिसे कथित तौर पर वाशिंगटन में जरदारी के राजदूत हुसैन हक्कानी की तरफ से पाकिस्तानी-अमेरिकी व्यापारी मंजूर एजाज ने पेंटागन तक पहुंचाया था. उसमें अमेरिकी जनरलों से गुजारिश की गई थी कि वे इस्लामाबाद में मुमकिन तख्तापलट को रोकें.
उम्मीद के मुताबिक, हक्कानी ने साफ इनकार कर दिया कि उन्होंने ही वह चिट्ठी लिखी थी, लेकिन लिखी गई बातें इतनी जहरीली थीं कि हक्कानी के होश फाख्ता हो गए. 22 नवंबर को उनके इस्तीफे का उस इंफेक्शन पर जरा भी असर नहीं पड़ा जो चिट्ठी की वजह से बेपनाह फैलता जा रहा था.
हक्कानी न तो पेशे और न ही मिजाज से कोई डिप्लोमैट हैं; वे जरदारी के दरबार के स्टार यस-मैन थे और हैं. वाशिंगटन में उनकी नियुक्ति जरदारी की तरफ से एक तोहफा था. दोनों बातों को जोड़ लीजिए और आपको पाकिस्तान का मौजूदा संकट समझ आ जाएगा.
जरदारी फरार हुए लेकिन छिप न सके. उनकी 'कूमत ने यह कहते हुए घुड़कियां दीं कि पार्लियामेंट, प्रेस, और लाहौर तथा दुनिया भर में उसके दोस्त एक और तख्तापलट बर्दाश्त नहीं करेंगे. खास तौर पर जनरल परवेज़ अशफाक कयानी पर इन बंदर घुड़कियों का कोई असर नहीं हुआ.
फौज ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दायर कर यह जांच कराने की मांग की वह चिट्ठी कहां से शुरू हुई, जिसने ''पाकिस्तानी फौज का हौसला कम करने की बेजा कोशिश की है.'' क्या बात हैः चिट्ठी तो नाकाम रही, फिर भी उसकी नीयत बगावत की थी.
अगर सुप्रीम कोर्ट सारी प्रक्रिया पूरी करने के बाद 'कूमत में किसी ऊंचे ओहदेदार को मुजरिम पाता है, तो चिमटी जरदारी को चुभेगी. ऐसे में यह पाकिस्तान के इतिहास का कानूनन सबसे जायज तख्तापलट होगा. कयानी इसके नतीजे में खाली होने वाली कुर्सी पर बैठने से इनकार करके अपनी, और फौज की शोहरत, मकबूलियत फिर हासिल कर लेंगे और एक आम चुनाव करवा कर अगले वजीरे आजम और सदर का चुनाव करवा देंगे.
जरदारी को फैसले की घड़ी का एहसास खुद-ब-खुद हो जाता है. 16 तारीख को जुमे की रात कयानी की वजीरे आजम गिलानी के साथ तीन घंटे तक बैठक चली, शांति काल की गप्पबाजी के लिहाज से यह गैर-मामूली तौर पर लंबी बात थी.
इसके 48 घंटे की भीतर जरदारी दुबई में अपने आशियाने से इस्लामाबाद में अपने कयाम पर आ गए. यह नहीं मानना चाहिए कि बलि का कोई बकरा छुरी पर धार देने की आवाज नहीं सुन सकता; असल में उसकी कल्पना आवाज को बहुत तेज कर देती है.
जब लेफ्टिनेंट जनरल (रिटा.) तलत मसूद जैसा फौजी-सियासी टिप्पणीकार बेलाग होकर कहता है कि फौजी और नागरिक नेतृत्व टकराव की राह पर हैं, तो जरदारी को यह जानने के लिए किसी सलाह की जरूरत नहीं है कि इस टकराव में बीच में कौन रहेगा.
56 साल की उम्र में दुबई में अस्पताल का एक बिस्तर अटक की सीलन भरी जेल में कई बरस काटने से कहीं ज्यादा बेहतर होने चाहिए, भले ही वह जेल सिंधु नदी के तट पर हो और वहां से हिमालय के मदहोश कर देने वाले नजारे दिखते हों.
तो डॉक्टर साहब, आपने देखा कि ये ''स्ट्रोक जैसे लक्षण'' कितने अहम हैं? जब आपको मौका मिले, तो जवाब जरूर दीजिएगा.

