अभी पिछले 26 सितंबर को भारत सरकार के राजभाषा विभाग की सचिव महोदया का एक पत्र जारी हुआ, जो कि केंद्र सरकार के मंत्रालयों और विभागों के सचिवों को संबोधित है. इसका विषय हैः सरकारी कामकाज में सरल और सहज हिंदी के प्रयोग के लिए नीति-निर्देश. यह सही दिशा में जारी किया गया नीति-निर्देश है. राजभाषा विभाग पहले से ही ऐसे दिशा-निर्देश जारी करता रहा है कि सरकारी कामकाज की भाषा आसान होनी चाहिए. इस पत्र में उनके हवाले देते हुए उन्हें दोहराया भी गया है.
04 जनवरी 2012: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
पर इस बार के पत्र के छठे पैरे में राजभाषा विभाग ने अपनी मंशा और ज्यादा खुलकर जाहिर कर दी है. मकसद साफ है कि राजभाषा विभाग आधुनिक हिंदी के अनुरूप रहना चाहता है. यदि ऐसा नहीं हुआ तो शासकीय भाषा आम जनता की भाषा से पिछड़ जाएगी या कट जाएगी. फिर, राजभाषा अलग तरह की हिंदी हो जाएगी और वह आम लोगों के काम की नहीं रह जाएगी. वह समाज के वर्चस्ववादी और स्वार्थी लोगों का हित साधन करने लगेगी जबकि हिंदी को राजभाषा का दर्जा देने में हमारे संविधान निर्माताओं का यह आशय कतई नहीं था. इसीलिए, सही उद्देश्य की पूर्ति के लिए जरूरी है कि राजभाषा हिंदी भाषियों को अपनी भाषा लगनी चाहिए. जिन की वजह से और जिन के लिए हिंदी राजभाषा बनी है, जब उन्हीं की समझ में यह नहीं आएगी तो समझे कि उनके साथ भारी धोखा हो गया है.
28 दिसम्बर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
इस पत्र में एक जगह मुझे जरूर लगा है कि राजभाषा विभाग अपनी सीमाओं से आगे बढ़ गया है. उन्हें अपनी बात कहनी थी, सो कह देनी चाहिए थी. जो कही गई है, वह बात गलत भी नहीं है. मुझे केवल यह कहना है कि कहने का ढंग उचित नहीं है. उन्होंने राजभाषा की साहित्यिक भाषा से तुलना कर दी है जिसकी आवश्यकता नहीं थी. यह उन का विषय नहीं होना चाहिए था. सचिव ने अपने पत्र के दूसरे पैरे को शुरू करते हुए लिखा है-''किसी भी भाषा के दो रूप होते हैं-साहित्यिक और कामकाज की भाषा. कामकाज की भाषा में साहित्यिक भाषा के शब्दों के इस्तेमाल से उस भाषा विशेष की ओर आम आदमी का रुझान कम हो जाता है और उसके प्रति मानसिक विरोध बढ़ता है.'' उन्होंने तीसरे पैरे का अंतिम वाक्य लिखा है-''भाषा का विशुद्ध रूप साहित्य जगत के लिए है; भाषा का लोकप्रिय और मिश्रित रूप बोलचाल और कामकाज के लिए है.''
21 दिसम्बर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
गलत, बिलकुल गलत. जहां तक मैं समझता हूं, यह राजभाषा विभाग का कार्यक्षेत्र नहीं था कि साहित्य के बारे में तुलना करके बोला जाए. मसलन, दलित साहित्य हिंदी में अपने परिवेश की विशिष्ट भाषा ला रहा है. अब तक उनकी यह भाषा हिंदी साहित्य के लिए अनजान थी. तब राजभाषा विभाग यह कैसे कह सकता है कि ''भाषा का विशुद्ध रूप साहित्य जगत के लिए है?''
साहित्य में अप्रत्यक्ष रूप से किसे विशुद्ध भाषा मान लिया गया है? इस से साहित्यकारों के बीच एक गलत संदेश जाता है कि संस्कृत के ढर्रे के साहित्यकार असली साहित्यकार हैं. सही बात यह है कि जिस संस्कृतनिष्ठ बोझिल भाषा से राजभाषा विभाग दुखी होकर अपना पत्र जारी कर रहा है, उसी संस्कृतनिष्ठ बोझिल भाषा से साहित्य के क्षेत्र में दलित साहित्य भी लड़ रहा है.
14 दिसंबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
यह कहना एकदम अनुचित है कि भाषा का विशुद्ध रूप साहित्य जगत के लिए है. संस्कृत की वजह से जिस बनावटी भाषा को सरकारी कामकाज में इस्तेमाल करने से रोका जा रहा है, साहित्य में भी वैसी कठिन शब्दावली और दुरूह शैली की संस्कृतनिष्ठ भाषा का बहिष्कार किया जा रहा है. दोनों जगह एक ही लड़ाई चल रही है, चाहे वह राजभाषा विभाग हो या साहित्य जगत् हो. यदि राजभाषा को जनता से जोड़ा जाना है तो साहित्य को भी आम आदमी से दूर नहीं जाना है.
07 दिसंबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
जैसे राजभाषा को कुछ लोग अपनी वजह से मुश्किल बनाते हैं, वैसे ही साहित्यिक भाषा को भी कुछ लोग न समझ में आने वाली बनाने के लिए कसम खाए बैठे हैं. इसलिए, लोगों के लिए कृत्रिम भाषा का इस्तेमाल अनुपयुक्त ही है, चाहे वह राजभाषा के क्षेत्र में हो या साहित्य के क्षेत्र में. सच यही है कि संस्कृतनिष्ठता को लेकर जिस परेशानी से भारत सरकार का राजभाषा विभाग जूझ रहा है, उसी परेशानी से हिंदी साहित्य के विद्यार्थी और शोध-छात्र भी गुजर रहे हैं.30 नवंबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
इसलिए, अपनी बला दूसरे के सिर पर डालने की जरूरत नहीं है. कम से कम, राजभाषा विभाग इतना तो बचा हुआ है, नहीं तो साहित्य में तो हिंदी के नाम पर ब्रजभाषा, अवधी, भोजपुरी और छह सौ वर्ष पुराने विद्यापति की मैथिली तक पढ़ाई जा रही है जो संविधान की आठवीं अनुसूची में 10वें नंबर पर हिंदी से अलग और स्वतंत्र भाषा के रूप में दर्ज है.
लेखक रिटायर्ड आइएएस अफसर और प्रमुख लेखक-चिंतक हैं

