हरियाणाः कोई छोरी छूट न जाए
हरियाणा के स्कूल जाने वाले 46.28 लाख बच्चों में से किसी को भी कक्षा तक पहुंचने के लिए एक किमी से ज्यादा का सफर तय नहीं करना पड़ता.
सबकी पहुंच तक शिक्षा के लिए राज्य शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 में बताए गए मानदंडों से आगे निकल चुका है और लड़कियों के लिए मुफ्त शिक्षा, मुफ्त साइकिलें, पाठ्य-पुस्तकें, यूनिफॉर्म और कमजोर वर्गों के बच्चों के लिए उदार वजीफों के बूते भर्ती होने वाले बच्चों की संख्या में अच्छा-खासा सुधार हुआ है.
राज्य को शीर्ष स्थिति में लाकर खड़ा कर देने वाली योजनाओं में से कई का खाका बनाने वाले उच्चतर माध्यमिक शिक्षा के महानिदेशक विजयेंद्र कुमार, एक गैर-सरकारी संगठन, प्रथम की वार्षिक शिक्षा की स्थिति रिपोर्ट 2010 का हवाला देते हुए कहते हैं, ''विचार यह था कि ज्यादातर बच्चों को स्कूलों में भर्ती कराया जाए. और अब दुनिया बदलाव देख रही है.''
देशभर में शिक्षा की स्थिति पर काम करने वाले इस स्वयंसेवी संगठन की रिपोर्ट में ''स्कूल से बाहर'' लड़कियों का अनुपात 2006 की तुलना में आधे से भी कम बताया गया है. राज्य में लड़कों ने भी ऐसी ही बढ़ोतरी दर्ज कराई है.
मूलतः ''बच्चों को फायदे'' पर केंद्रित इन नए उपायों का खर्च 2010-11 के 5,741.97 करोड़ रु. के भारी-भरकम ढंग से बढ़ाए गए शिक्षा बजट से उठाया जाता है, जो 2005-06 के बजट के मुकाबले लगभग तीन गुना है.
इसके दस फीसदी से ज्यादा, 603.2 करोड़ रु. बच्चों को फायदे पर खर्च किए जाते हैं, जिनमें मासिक वजीफे शामिल हैं, जो अनुसूचित जातियों के बच्चों के लिए 740 रु. से लेकर 1,250 रु. तक होते हैं.
विजयेंद्र कुमार कहते हैं, ''2005 से कमजोर वर्गों के बच्चों को नकद प्रोत्साहन देने के कदम लड़कियों को कक्षा तक ले आए.''
पिछड़े जिलों में लड़कियों के लिए विशेष बस सेवा शुरू करने से उनकी शिक्षा का स्तर बढ़ाने की कोशिश में मदद मिली. इसके अलावा 17,000 से ज्यादा शिशुओं के लिए 649 बचपनशालाएं खोली गईं, ताकि बड़ी बच्चियों को जिम्मेदारियों से मुक्त किया जाए और उन्हें स्कूल जाने के लिए तैयार किया जा सके.
प्रवासी मजदूरों के 30,000 से अधिक बच्चों का 'कार्यस्थल पर स्कूल' में दाखिला करवाया गया.
लेकिन मानव संसाधनों की गुणवत्ता में सुधार करने के हरियाणा की कोशिशों के आलोचक भी हैं. बरवाला में गवर्नमेंट कॉलेज के ह्ढिंसिपल आर.सी. गोयल कहते हैं, ''सरकार ने संख्या पर जोर लगा रखा है, गुणवत्ता पर नहीं.''
वे कहते हैं कि दाखिले की संख्या में इजाफे की इकलौती वजह यह है कि ''गरीब परिवारों को आमदनी का एक आकर्षक वैकल्पिक स्त्रोत मिल जाता है.'' वे जोर देकर कहते हैं कि शिक्षा के स्तरों में कोई बदलाव नहीं आया है.
विजयेंद्र कुमार कहते हैं कि शिक्षकों का स्तर सुधारने की कोशिशें जारी हैं. हरियाणा जल्दी ही समेकित शिक्षक प्रशिक्षण कोर्स शुरू करने जा रहा है. वे कहते हैं, ''हमने प्रोत्साहनों और जवाबदेही के साथ शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया और सेवा नियमों की भी पूरी तरह मरम्मत की है.''
अब सभी नए शिक्षकों को स्थायी नियुक्ति पाने की पात्रता के लिए तीन साल से ज्यादा का करार करना होता है. हालांकि राज्य अपने बच्चों को स्कूल तक आने में राजी करने में कामयाब रहा है, लेकिन शिक्षकों की हाजिरी गंभीर समस्या बनी हुई है.
गोयल कहते हैं, ''ज्यादातर शिक्षक स्थानीय नहीं होते और आम तौर पर आसपास के शहरों में रहते हैं, जहां उनके अपने बच्चों के लिए अच्छे स्कूल होते हैं.''
मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह 'ड्डा के समर्थन से, विजयेंद्र कुमार शिक्षा प्रणाली को सुधारने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं. उन्होंने 2010 में अमेरिका स्थित मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी की जमील पॉवर्टी एक्शन लैब के साथ एक सहमति पत्र पर दस्तखत किए हैं, ताकि, उनके शब्दों में, ''स्कूल नीति का बुनियादी परीक्षण'' किया जा सके.
पुड्डुचेरी: पढ़ाई पूरी कराने का लक्ष्य
यह संघ शासित प्रदेश बड़े सपनों वाला छोटा राज्य है. इसका लक्ष्य 2016 तक पूरी तरह साक्षर बनने का है. पुड्डुचेरी के मुख्यमंत्री एन. रंगास्वामी कहते हैं, ''हमारा लक्ष्य 2016 तक शिक्षा के क्षेत्र में उम्दा हासिल कर लेने का है. हमने स्कूली शिक्षा को बीच में छोड़ने वालों की तादाद कम करने के लिए योजनाएं शुरू की हैं.''
चुनौती मुश्किल हो सकती है, लेकिन रंगास्वामी को उम्मीद है कि वे अपना वादा पूरा कर सकेंगे. वे कहते हैं, ''हम सभी स्कूलों में शिक्षकों के खाली पड़े पदों पर भर्ती कर रहे हैं. शिक्षा में गुणवत्ता सिर्फ शिक्षकों के जरिए ही लाई जा सकती है. हम यह तय करेंगे कि कोई पद खाली न पड़ा रहे.'
प्राइमरी स्कूलों में शिक्षक-छात्र अनुपात 1:20 का है, मिडल स्कूलों में 1:21 का और हायर सेकेंडरी स्कूलों में 1:24 का है. खाली पदों को भरने के बाद से 12वीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा में कुल मिलाकर पास होने वालों का प्रतिशत लगभग 9 फीसदी बढ़ गया है, और 2010 में 74.63 फीसदी से बढ़कर 83.54 फीसदी हो गया है.
स्कूली शिक्षा के निदेशक जी. पनीरसेल्वम कहते हैं कि चाहे उनका प्रदर्शन जैसा भी रहे, सभी छात्रों को 11वीं कक्षा में पहुंचा देने की परंपरा बंद कर दी गई है, जिससे पास होने वालों का प्रतिशत बढ़ाने में मदद मिली है.
इस संघ शासित प्रदेश में साक्षरता की दर 86.55 फीसदी है जो राष्ट्रीय औसत 74 फीसदी की तुलना में कहीं अधिक है.
स्कूली शिक्षा बीच में छोड़ने वाले छात्र-छात्राओं की दर 2005-06 में 13.69 फीसदी के मुकाबले 2010-11 में 6.1 फीसदी रह गई है.
मुख्यमंत्री स्कूली शिक्षा को बीच में छोड़ने वालों की दर में गिरावट का श्रेय दोपहर के भोजन की योजना, दूध ब्रेड योजना और छात्र विशेष बस योजना को देते हैं.
सरकार बच्चों को उनके घर से स्कूल तक लाने-ले जाने के लिए छात्र विशेष बस योजना के तहत पीली बसें चलाती है.
शिक्षा विभाग के एक अधिकारी कहते हैं, ''हम हरेक छात्र से हर बार आने-जाने के लिए एक रु. शुल्क लेते हैं.'' 2011-12 के 2,750 करोड़ रु. के वार्षिक बजट में से 228 करोड़ रु. स्कूली शिक्षा के लिए हैं और 123 करोड़ रु. उच्च शिक्षा के लिए. पुड्डुचेरी का अगला लक्ष्य-स्कूली शिक्षा के लिए उसका अपना बोर्ड.
पुड्डुचेरी कॉलेज और उच्च शिक्षा में भी चमत्कार कर रहा है. पुड्डुचेरी के आठ मेडिकल कॉलेजों की तरह देशभर में कहीं भी चिकित्सा शिक्षा मुफ्त नहीं दी जाती.

